क्या कैशबैक करेगा अर्थव्यवस्था को कैशलैस?

  • आलोक पुराणिक
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रुपे कार्ड

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जीएसटी काउंसिल की हाल की बैठक में एक महत्वपूर्ण फ़ैसला हुआ है, जिसका ताल्लुक नकदहीन अर्थव्यवस्था की तरफ़ बढ़ने से है.

इसमें फ़ैसला लिया गया कि रुपे कार्ड और भीम एप के जरिये भुतान करनेवालों को कुल जीएसटी रकम का बीस प्रतिशत कैशबैक दिया जायेगा.

रुपे कार्ड और भीएम एप नकद न्यूनतम अर्थव्यवस्था की ओर उन्मुख करनेवाले सरकारी इंतजाम हैं. फ़ैसले के मुताबिक अधिकतम कैशबैक की सीमा 100 रुपये होगी.

अन्य शब्दों में इसका आशय यह हुआ कि रुपे कार्ड और भीम एप के जरिये जो ग्राहक ख़रीदारी करेंगे, उनकी ख़रीदारी की कीमत में जो रकम जीएसटी यानी माल और सेवा कर की होगी, उसका बीस प्रतिशत हिस्सा कैशबैक के तौर पर ग्राहक के खाते में आ जायेगा.

अधिकतम इस तरह से 100 रुपये का कैशबैक लिया जा सकेगा. चूंकि यह कैशबैक यानी नकद वापसी या रकम वापसी कीमत के जीएसटी हिस्से से ही होनी है इसलिए इसके चलते जीएसटी संग्रह पर करीब 1000 करोड़ रुपये का असर पड़ेगा यानी 1000 करोड़ रुपये कैशबैक में जाने की संभावना है यानी 1000 करोड़ रुपये का कर संग्रह कम रहेगा.

कैशबैक का अर्थशास्त्र

कैशबैक मूलत एक प्रोत्साहन योजना है, जिसमें किसी ग्राहक को किसी खास विधि से किसी खास आइटम या सेवा पर खर्च करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है.

फिर इसके बदले कुछ रकम उसके खाते में वापस कर दी जाती है. कैशबैक का भारत में व्यापक स्तर पर प्रयोग निजी वॉलेट सेवा-पेटीएम ने किया. कैशबैक का निजी क्षेत्र का अर्थशास्त्र यह है कि एक ही प्लेटफार्म पर किसी वस्तु या सेवा के बड़ी मात्रा में आर्डर आ जाते हैं, तो उस सेवा या वस्तु के सप्लायर से कुछ डिस्काऊंट की मांग की जा सकती है.

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इस डिस्काउंट को पूरा का पूरा या इसका एक हिस्सा उपभोक्ता के साथ शेयर किया जा सकता है. इस व्यवस्था में माल या सेवा बेचने वाले को लाभ यह है कि उसे एक ही जगह से कई ग्राहक मिल जाते हैं. जैसे पेटीएम या किसी और आनलाइन सिस्टम में एक ही जगह कई ग्राहकों के आर्डर इकठ्ठे होकर किसी सिनेमा हाल या मोबाइल निर्माता के पास चले गए, तो एक ही जगह से बड़े आर्डर मिलने का सीन बन जाता है.

अर्थशास्त्र के हिसाब से अगर बड़ा आर्डर होगा, ज्यादा मात्रा या संख्या में आर्डर में होगा, तो प्रति इकाई लागत कम हो जाती है. तो सप्लायर को एक जगह से कई आर्डर मिल जाते हैं, यह उसका फायदा है. उपभोक्ता को वही चीज दूसरे विकल्पों के मुकाबले सस्ती मिल जाती है औ पेटीएम या किसी भी निजी आनलाइन व्यवस्था के लिए फायदा यह है कि वह ख़ुद अपने आप में कई आइटमों का बाजार बन जाता है.

पिछले कुछ सालों में कैशबैक के जरिये कई ग्राहकों को आकर्षित करने की कोशिश की गयी है. पेटीएम के पास आज क़रीब तीन करोड़ प्रयोक्ता हैं. कैशबैक का इसमें गहरा योगदान है.

कैशबैक और नकद न्यूनतम अर्थव्यवस्था की ओर

सरकार नकदहीन अर्थव्यवस्था की ओर जाना चाहती है. नवंबर 2016 में किए गए विमुद्रीकरण उर्फ नोटबंदी का एक उद्देश्य यह भी बताया गया था कि ऐसा करने से अर्थव्यवस्था में नकद का चलन कम होगा. नकद का चलन कम होगा, तो कालेधन का प्रकोप भी कम होगा. ऐसी उम्मीद की गयी थी. काला धन नकद की शक्ल में भी बहुत मजबूती से मौजूद रहता है.

नकद को लेकर सवाल जवाब कम होते हैं जबकि आनलाइन लेनदेन का रिकार्ड रहता है. आनलाइन लेनदेन एक रुपये का भी हो तो उसका रिकार्ड बन जाता है. नकद तो पांच लाख रुपये भी खर्च दिये जायें, तो उसका रिकार्ड बनाना मुश्किल होता है.

नोटबंदी से बड़ी उम्मीद यह थी कि करीब तीन लाख करोड़ रुपये का कालाधन रद्द हो जायेगा. एक उद्देश्य यह बताया गया था कि अर्थव्यवस्था में नकद का चलन कम हो जायेगा.

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ऐसा नहीं हुआ. कई एक्सपर्ट कह रहे थे कि कालेधन वाले अपने बड़े नोटों को वापस बैंक में जमा नहीं करवायेंगे, इसलिए वो नोट रद्द हो जायेंगे यानी काला धन इन रद्द नोटों की शक्ल में रद्द हो जायेगा. पर ऐसा नहीं हुआ. यानी काले धन की वापसी के उद्देश्य पर अगर नोटबंदी की स्कीम का मूल्यांकन हो तो यही कहा जायेगा कि नोटबंदी कालेधन पर कड़ा प्रहार करने में कामयाब नहीं हुई है.

यह बात इस संदर्भ में और समझी जानी चाहिए कि कैश करेंसी में उपस्थित काला धन कुल काली संपदा एक छोटा हिस्सा भर होता है. यानी जो काला धन मकान, स्विस बैंकों के खातों, सोने आदि की शक्ल में बदल लिया गया था, पहले ही, वह कालाधन तो इस नोटबंदी से कतई अछूता रहा है.

अब जबकि आंकड़े सामने हैं कि प्रतिबंधित करेंसी का करीब 99 प्रतिशत सिस्टम में वापस आ गया, तो यह मान ही लिया जाना चाहिए नोटबंदी कालेधन पर निर्याणक प्रहार करने में कामयाब नहीं हुई. पर इसके दूसरे सकारात्मक परिणाम जरुर सामने आए.

नोटबंदी अपने मूल उद्देश्य यानी कालेधन पर प्रहार करने में भले ही कामयाब नहीं रही हो, पर सरकार की वित्तीय दिक्कतें इससे एक हद कम हुईं. 2012-13 में कुल चार करोड़ 72 लाख करदाता थे, 2016-17 में यह बढ़कर 6 करोड़ 26 लाख हो गए. नोटबंदी के बाद की गई कार्रवाईयों में 5,400 करोड़ रुपये की अघोषित आय पकड़ में आयी.

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2016-17 में करीब नब्बे लाख नए करदाता जुड़े कर व्यवस्था में. हर साल जितने करदाता आम तौर पर बढ़ते हैं, उसके मुकाबले यह करीब 80 प्रतिशत ज्यादा बढ़ोत्तरी है यह. तो करदाताओं की संख्या बढ़ाने में नोटबंदी एक हद तक कामयाब रही है, पर काले धन पर प्रहार और नकद के चलन के मामले में नोटबंदी का उपादेयता पर गंभीर सवाल खड़े हुए.

एक अध्ययन के मुताबिक फरवरी 2018 के अंत तक अर्थव्यवस्था में नकदी उसी स्तर पर आ गयी थी, जिस स्तर पर नोटबंदी के ठीक पहले थी. यानी नोटबंदी ने नकदहीनता की तरफ अर्थव्यवस्था को ले जाने में ज्यादा योगदान नहीं दिया.

अब कैशबैक के जरिये अर्थव्यवस्था किस हद तक नकद न्यूनतम की ओऱ आती है, इसका विश्लेषण भविष्य में करना होगा. मोटे तौर पर एक बात साफ समझी जानी चाहिए कि नकद न्यूनतम की ओर ले जाने के लिए ग्राहकों को कैशबैक प्रोत्साहन के अलावा कुछ बुनियादी शिक्षण प्रशिक्षण भी चाहिए होगा.

नौजवान तो आनलाइन खऱीदारी में रुपे कार्ड के जरिये या भीम एप के जरिये आसानी से कर सकते हैं. पर चालीस पचास साल से ऊपरवालों के लिए आनलाइन लेनदेन आज भी आसान नहीं है. दस बीस रुपये की छूट या डिस्काऊंट के लिए इन्हे आसानी से कैशलैस लेनदेन में तब प्रोत्साहित किया जा सकता है, जब इन्हे आनलाइन लेनदेन की कुछ बुनियादी ट्रेनिंग शिक्षण प्रशिक्षण दिया जाए. इस काम को सिर्फ़ कैशबैक के जरिये कर पाना संभव नहीं है.

कैशबैक के अलावा और संस्थागत इंतजामों को किए बगैर, भारतीय जनमानस के दिमाग से नकद का भूत उतारना आसान नहीं है. नोटबंदी के दिनों में जो नकदहीन लेनदेन की ओर उन्मुख हुए थे, उनमें से अधिकांश अब वापस पुरानी कैश के लेनदेन वाली आदतों पर लौट आये हैं. ये जीएसटी वाले कैशबैक से वापस नकदहीन लेनदेन की ओऱ लौटेंगे, यह फिलहाल संभव नहीं लगता.

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