ब्लॉग: कैसे लोग चलाते हैं बालिका गृह?

  • 8 अगस्त 2018
मुज़फ़्फ़रपुर, देवरिया, बालिका गृह, रेप, यौन शोषण इमेज कॉपीरइट Getty Images

बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर से 46 और उत्तर प्रदेश के देवरिया से 24 लड़कियां. इतनी बड़ी तादाद में, एक ही इमारत में रह रहीं लड़कियों के साथ, लंबे समय तक, चुपचाप, यौन हिंसा कैसे की जा सकती है?

ये लड़कियां कुछ बोली क्यों नहीं? विरोध क्यों नहीं किया? एक साथ रहती थीं तो एक-दूसरे से हिम्मत नहीं जुटा पाईं?

जो घरवालों की मारपीट से भागकर यहां आई हैं. उन तस्करों से बचकर आई हैं जिनके चंगुल में शायद उनके परिवारवालों ने ही फंसाया था.

देह व्यापार से बचकर आई हैं या बाल-मज़दूरी से छुड़ाया गया तो आई हैं.

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पति के बलात्कार से भागकर आई हैं या उसने छोड़ दिया तो सिर पर छत ढूंढती आई हैं.

बलात्कार के बाद समाज ने बहिष्कार कर दिया, परिवार 'शर्मसार' हो गया तो सबकी इज़्ज़त बचाने के लिए और अपना मुंह छुपाने के लिए यहां आई हैं.

किसी बीमारी ने शरीर या दिमाग़ को अपंग बना दिया और घरवालों ने 'बोझ' समझकर सड़क पर लाकर रख दिया तो पुलिस की मदद से यहां आई हैं.

और अगर मां-बाप की पसंद के ख़िलाफ़ प्यार कर लिया तो जान बचाने के लिए यहां आई हैं.

यहां यानी उस जगह जिसे सरकार ने ऐसी बेघर और लाचार समझी जानेवाली औरतों और बच्चों की सुरक्षा और देखरेख के लिए बनाया.

लेकिन वही उन्हें किसी 'फेंकी' हुई चीज़ जैसा माना जाने लगा. जिसकी कोई कीमत नहीं, कोई इज़्ज़त नहीं, कोई वजूद ही नहीं.

इन बेघरों के साथ हुई यौन हिंसा से कोई गुरेज़ नहीं. ना ऐसे 'होम्सट चलानेवालों को, ना उनसे देह व्यापार करवाने वाले और मर्दों को.

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'नर्क के गड्ढे'

साल 1969 में भारत सरकार के सामाजिक कल्याण विभाग ने ''शॉर्ट स्टे होम' बनाए ताकि ऐसी औरतें और बच्चे किसी 'ग़लत काम में ना फंस जाएं' या 'मुसीबत में ना पड़ जाएं'.

फिर कई योजनाएं बनीं, कई क़ानून आए. पर मुसीबत से बचाने की जगह, ग़लत काम में फंसाते चले गए.

साल 2013 में 'एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स' ने ऐसे 'शेल्टर होम्स' पर एक शोध किया और उन्हें 'इंडियाज़ हेल होल्स' यानी भारत के 'नर्क के गड्ढों' की संज्ञा दी.

रिपोर्ट ने कहा कि भारत में बच्चों से बलात्कार के कुल मामलों में से कई ऐसे होम्स में ही हो रहे हैं और इनमें निशाने पर ज़्यादातर बच्चियां हैं.

ऐसे मामले छोटे शहरों में ही नहीं, दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों में भी हो रहे हैं.

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बच्चों के लिए बनाए गए किसी भी 'होम' का जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत पंजीकृत होना ज़रूरी है लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक ज़्यादातर गृह पंजीकृत नहीं हैं.

तो हल क्या है? बिहार और उत्तर प्रदेश के मामलों के बाद महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने सुझाव दिया है कि हर राज्य में एक बड़ी जगह होनी चाहिए जहां ऐसी औरतों और बच्चों को रखा जाए और जिसे सरकार चलाए.

लेकिन 'एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स' की रिपोर्ट के मुताबिक यौन हिंसा सरकारी और ग़ैर-सरकारी सभी तरह के 'शेल्टर होम्स' में हो रही है.

सरकारी मुलाज़िम भी अगर इन होम्स में रहनेवालों की कोई कीमत ना समझें तो उनमें और निजी या ग़ैर-सरकारी होम्स को चलानेवालों में कोई फ़र्क़ नहीं है.

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बेकार, बेघर

बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के बालिका गृह में रह रहीं लड़कियां भी या तो 'रेड लाइट' इलाकों यानी 'बदनाम' बस्तियों से लाई गई थीं या किसी आपदा में अपने परिवार को खोने के बाद बेसहारा होकर यहां पहुंची थीं.

ये गृह ग़ैर-सरकारी था और पिछले पांच सालों से बाल संरक्षण विभाग इसे चलानेवाले शख़्स को बार-बार इसका टेंडर देता रहा.

नियम है कि तीन साल बाद उस एनजीओ की पूरी पड़ताल की जाए, तभी आगे का टेंडर दिया जाए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

इन लड़कियों से बलात्कार करनेवालों ने इन्हें उसी नज़र से देखा जैसे इनके परिवारवालों या क़रीबी लोगों ने समझा था - बेकार!

अख़बार में इनके बलात्कार की कई ख़बरें छपने के बाद भी इनके समर्थन में बहुत सारी रैलियां नहीं निकलीं.

कॉलेज के छात्र-छात्राएं ऐसी तख़्तियां लेकर सड़कों पर नहीं निकले जिनपर लिखा हो, 'मेरे कपड़ों से मेरे बलात्कार का कोई लेना-देना नहीं है'.

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जब हम ही नहीं बोले, तो ये क्या बोलतीं. घर और समाज से ठुकराईं गईं, किसी के रहम और ख़ैरात पर ज़िंदगी काटतीं इन लड़कियों को तो ये भी नहीं मालूम कि वो 'शेल्टर-होम' के ख़िलाफ़ किससे शिकायत कर सकती हैं.

शिकायत करेंगी तो उन्हें और हिंसा तो नहीं झेलनी पड़ेगी? और यहां से चलता कर दिया तो फिर जाएंगी कहां? किस पर भरोसा करेंगी?

पर ये बोलीं. उत्तर प्रदेश के देवरिया में एक लड़की भाग गई और पुलिस के पास पहुंच गई.

जब 'टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस' की टीम ने बिहार के बालिका गृहों के हालात की जानकारी इकट्ठा करनी चाही तो वहां हिंसा की शिकार हो रहीं लड़कियों ने ही हिम्मत की.

ये और बात है कि उस रिपोर्ट को राज्य के समाज कल्याण विभाग को फरवरी में सौंपा गया पर कार्रवाई जून में ही हुई.

दरअसल सवाल ये नहीं कि कैसी लड़कियां रहती हैं बालिका गृह में? बल्कि ये है कि कैसे लोग चलाते हैं ये बालिका गृह?

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