करुणानिधिः छह दशकों में पांच बार मुख्यमंत्री रहने वाला राजनेता

  • 8 अगस्त 2018
करुणानिधि

डीएमके यानी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के पितृपुरुष करुणानिधि के लिए राजनीति का उतार-चढ़ाव छह दशकों में बच्चों का खेल बन चुका था.

यहां तक कि 90 साल की उम्र में भी पार्टी कामकाज के लिए उनमें जितना जोश दिखा, वैसा भारत के राजनीतिक आकाश में किसी और में नहीं दिखता.

सत्ता के लिए गणित बैठाने की रणनीति का लोहा तो उनसे आधी उम्र के लोग भी मानते थे.

जीवन के नौ दशक बिताने के बाद साल 2016 में जब उन्होंने तमिलनाडु विधानसभा के चुनाव प्रचार की कमान संभाली तो उनके विरोधी दंग रह गए.

पेरियार के समर्थक

करुणानिधि जातिवाद और सामाजिक भेदभाव के ख़िलाफ़ संघर्ष करने वाले सामाजिक सुधारवादी पेरियार के पक्के समर्थक थे.

वो सामाजिक बदलाव को बढ़ावा देने वाली ऐतिहासिक और सामाजिक कथाएं लिखने के लिए लोकप्रिय हो रहे थे.

और अपनी इसी कहानी कथन प्रतिभा का इस्तेमाल उन्होंने तमिल सिनेमा में किया.

तमिल फ़िल्म 'पराशक्ति'

साल 1952 में तमिल फ़िल्म 'पराशक्ति' आई. इस फ़िल्म में शिवाजी गणेशन पर्दे पर पहली बार उतरे और ये बेहद कामयाब रही.

इस फ़िल्म का एक सीन मिसाल बन गया जिसके जरिए वो समाज में फैले अंधविश्वास को चुनौती दे रहे थे.

'पराशक्ति' तमिल सिनेमा के साथ-साथ करुणानिधि की ज़िंदगी का भी एक अहम मोड़ साबित हुई.

इस फ़िल्म ने द्रविड़ आंदोलन की विचारधारा का समर्थन किया और तमिल सिनेमा के दो प्रमुख अभिनेताओं शिवाजी गणेशन और एसएस राजेंद्रन से दुनिया को परिचित करवाया.

तमिल फ़िल्मों में काम करने की वजह से ही वो एमजी रामचंद्रन के नज़दीक आए जिन्हें एमजीआर के नाम से जाना जाता था.

तो तमिल सिनेमा के सफल पटकथा लेखक करुणानिधि के राजनीति में आने की कहानी क्या है?

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राजनीति में आने की कहानी

इंडिया टुडे की पूर्व पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक वासंती कहती हैं, "वे फ़िल्मों के माध्यम से डीएमके की फिलॉसफ़ी लोगों तक पहुंचाते थे. डीएमके की लोकप्रियता भी बढ़ी. पराशक्ति के साथ बतौर पटकथा लेखक करुणानिधि को भी शोहरत मिली.

करुणानिधि की फ़िल्मों में एमजी रामचंद्रन ने काफी काम किया था. ये दोनों एक साथ काम करते थे लेकिन अन्नादुरैई के मरने के बाद करुणानिधि मुख्यमंत्री बन गए. उन्हें मुख्यमंत्री बनाने में एमजीआर ने भी मदद की थी. लेकिन बाद में दोनों के बीच कुछ मतभेद पैदा हो गए.

एमजीआर और करुणानिधि के बीच सियासी तल्खियां बढ़ी. एमजीआर ने करुणानिधि पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया और सवाल उठाए जिससे करुणानिधि नाराज़ हो गए और उन्हें पार्टी से निकाल दिया. उस ज़माने में एमजीआर एक बेहद लोकप्रिय अभिनेता थे.

उन्होंने अन्नाद्रमुक नाम से दूसरी पार्टी बना ली. इसके बाद हुए चुनाव में एमजीआर ने जीत हासिल की. एमजीआर की लोकप्रियता कुछ ऐसी थी कि करुणानिधि अगले 13 साल तक दोबारा मुख्यमंत्री नहीं बन सके. एमजीआर की मौत के बाद ही करुणानिधि फिर सत्ता में आ पाए."

एलटीटीई से नज़दीकी

पेरियार के समाज सुधार आंदोलन का समर्थन, हिंदी विरोध का झंडा और श्रीलंकाई तमिलों के मुद्दे को लेकर चले करुणानिधि तमिलनाडु की राजनीति करते रहे.

तमिलनाडु की राजनीति पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार एमआर नारायणस्वामी कहते हैं, "एक ज़माना था जब वे तमिलनाडु के अलगाववादी गुटों से संबंध बनाने की कोशिश कर रहे थे लेकिन एमजीआर से प्रभावित प्रभाकरण उनके क़रीब आने के लिए तैयार नहीं हुए. करुणानिधि इससे नाराज़ भी हुए लेकिन वे कुछ कर नहीं पाए."

"एक समय ऐसा भी आया जब प्रभाकरण ने बाक़ी सभी तमिल गुटों को खत्म कर डाला जिनमें करुणानिधि के क़रीबी गुट के लोग भी शामिल थे. लेकिन करुणानिधि ने इस ख़ूनख़राबे का कभी कोई खंडन नहीं किया. उसके बाद जब एमजीआर का निधन हो गया और श्रीलंका में लिट्टे और भारत की शांति सेना के बीच लड़ाई शुरू होने के बाद करुणानिधि का प्रभाकरण की तरफ़ झुकाव हुआ. ये वो वक्त था जब हिंदुस्तान प्रभाकरण के ख़िलाफ़ हो चुका था."

"एमजीआर प्रभाकरण के साथ उस समय खड़े थे जब ऐसा लगता था कि पूरा भारत प्रभाकरण के पक्ष में है. ये एमजीआर और करुणानिधि के बीच भारी फर्क था. इसी वजह से जब करुणानिधि की सरकार जनवरी, 1991 में बर्खास्त की गई तो यही दलील दी गई थी कि द्रमुक सरकार में एलटीटीई के लोग तमिलनाडु में बहुत सक्रिय हो गए थे. ये बात काफी हद तक सही भी निकली क्योंकि इसी दौरान राजीव गांधी की तमिलनाडु में हत्या हो गई."

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राजीव गांधी की हत्या

मई, 1991 में तमिलनाडु के पेरंबदूर में राजीव गांधी की हत्या के बाद करुणानिधि के तमिल प्रेम पर सवाल उठे कि वो चरमपंथी संगठन एलटीटीई का समर्थन कर रहे हैं.

राजीव गांधी के हत्यारों को तमिलनाडु से ही गिरफ़्तार किया गया.

करुणानिधि साल 2009 में उस समय एक बार फिर चर्चा में आए जब उन्होंने एनडीटीवी को दिए एक इंटरव्यू में एलटीटीई के चीफ़ प्रभाकरण को अपना दोस्त बताया.

हालांकि बाद में उन्होंने सफाई दी कि उनकी बात को सही परिप्रेक्ष्य में नहीं रखा गया.

करुणानिधि तमिलनाडु की राजनीति का चमकदार चेहरा बने रहे लेकिन राज्य में वर्चस्व को लेकर उनकी लड़ाई अन्नाद्रमुक की प्रमुख जयललिता से थी.

इस वर्चस्व की लड़ाई में शह और मात का खेल लगातार चलता रहा.

जयललिता से दुश्मनी

राजनीतिक विश्लेषक वासंती कहती हैं, "ये लड़ाई मर्द-औरत के झगड़े में बदल गई. करुणानिधि की सरकार के समय जयललिता राज्य विधानसभा में विपक्ष की नेता बनकर आईं. करुणानिधि जब बजट पेश कर रहे थे तो जयललिता ने उनके इस्तीफे की मांग की. विधानसभा में भारी बहस छिड़ गई. सदन के भीतर किसी ने जयललिता के ऊपर चप्पल फेंका, किसी ने उनका पल्लू खींचने की कोशिश की. तब जयललिता ने नाराज़ होकर कहा था कि सदन में मेरे साथ द्रौपदी जैसा व्यवहार किया गया. उनका गुस्सा कभी कम नहीं हुआ. इसी गुस्से से जयललिता करुणानिधि को अपने दुश्मन की तरह देखती थीं."

दो चतुर राजनीतिक प्रतिद्वंदियों के बीच की लड़ाई ख़तरनाक़ हो गई लेकिन दक्षिण की राजनीति में ये हमेशा से होता रहा है. जैसे को तैसा का पुराना प्रचलन है.

जब करुणानिधि सत्ता में थे तो उन्होंने जयललिता को भ्रष्टाचार के मामलों में जेल भिजवाया और जब जयललिता की सत्ता में वापसी हुई तो साल 2015 की जनवरी महीने में आधी रात के वक्त कैमरे की चकाचौंध के बीच करुणानिधि को भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया गया.

करुणानिधि की राजनीतिक चतुराई

राज्य की राजनीति में तो क्षेत्रीय दलों के बीच उठापटक चलती रहती है. लेकिन कोई भी करुणानिधि की राजनीतिक चतुराई पर संदेह नहीं कर सकता था.

वो करुणानिधि ही थे जिन्होंने डीएमके जैसी क्षेत्रीय पार्टी को केंद्र की सरकारों में कांग्रेस और बीजेपी दोनों के साथ गठबंधन का हिस्सा बनाया.

ऐसे में ये सवाल उठता है कि केंद्र की सत्ता की राजनीति में करुणानिधि का क्या योगदान माना जाए?

एमआर नारायणस्वामी कहते हैं, "भारतीय राजनीति के हिसाब से उनकी अहमियत इस बात को लेकर है कि वीपी सिंह की गठबंधन सरकार के वक्त से देश की राजनीति में क्षेत्रीय पार्टियों का वजन बढ़ा और तब से राष्ट्रीय राजनीति में करुणानिधि एक रोल निभाने लगे."

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कला का विद्वान

करुणानिधि का जीवन भी एक फ़िल्मी पटकथा जैसा ही रहा.

लगा कि जिस तरह से उन्होंने अपने करियर की शुरुआत तमिल फिल्मों के पटकथा लेखक के रूप में शुरू की थी, उसी तरह उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन का स्क्रीन प्ले को भी लिख डाला.

भारतीय राजनेताओं में ऐसे उदाहरण कम मिलते हैं जो बहुआयामी प्रतिभा के मालिक रहे हों.

वासंती कहती हैं, "वे एक काबिल प्रशासक थे. लेकिन राजनीति में परिवार को बढ़ावा देकर उन्होंने गलती की थी. इससे उनकी पार्टी भी कमजोर हुई. वे प्रभावशाली और तेजतर्रार नेता थे. मीडिया के प्रति उनका रुख भी बेहद दोस्ताना था. वे खूब पढ़ते थे और अपनी पत्रिका के लिए भी रोज लिखते थे."

करुणानिधि का कद भारतीय राजनीति में बेहद अलग रहा है. छह दशक की राजनीति में वे पांच बार मुख्यमंत्री रहे और करुणानिधि के समर्थक उन्हें कलाईनार कहते थे. इसका मतलब होता है कला का विद्वान.

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