नज़रियाः मुज़फ़्फरपुर मामले में मंजू वर्मा के इस्तीफ़े का मतलब नीतीश का सरेंडर तो नहीं

  • 10 अगस्त 2018
नीतीश कुमार, मुज़फ़्फ़रपुर बालिका गृह मामला, बिहार इमेज कॉपीरइट Getty Images

बिहार सरकार द्वारा संचालित बालिका आश्रय गृह में यौन उत्पीड़न का मामला राज्य की नीतीश सरकार पर अबतक का सबसे बड़ा बदनुमा दाग़ बन कर उभरा है.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जितनी फ़ज़ीहत इस मामले में हो रही है, उतनी शायद ही पहले कभी हुई होगी. छवि ख़राब होना और किसे कहते हैं?

ये काण्ड है ही इतना जघन्य कि इसकी रोषपूर्ण चर्चा गाँव के चौपाल और निचली अदालत से लेकर सर्वोच्च अदालत तक हो रही है.

चोरी पकड़े जाने पर हड़बड़ी में गड़बड़ी करने वालों की तरह पेश आ रही इस सरकार पर विपक्ष को हमलावर होने का मनचाहा मौक़ा मिला है.

शेल्टर होम संचालन-व्यवस्था से सीधे तौर पर जुड़े समाज कल्याण विभाग की मंत्री मंजू वर्मा का पहले खुल कर बचाव करना और फिर दबाव बढ़ने पर उनसे इस्तीफ़ा लेना मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ ही गया.

सीबीआई जाँच में शुरुआती आनाकानी

बिना देर किए 'नैतिक ज़िम्मेदारी' के तहत मंत्री से त्यागपत्र ले लेने का अवसर भी वह अनिर्णय में फँस कर चूक गए.

मंजू वर्मा से जुड़े कुशवाहा समाज वाला वोट बैंक बिगड़ने का ख़ौफ़ मुख्यमंत्री को ऐसे गंभीर आपराधिक मामले में भी सताने लगा?

जब इस कांड के मुख्य अभियुक्त ब्रजेश ठाकुर के साथ मंजू वर्मा के पति चंद्रशेखर वर्मा की निकटता ज़ाहिर हो चुकी थी, तब सबूत मिलने तक इंतज़ार करने की बात कह कर मुख्यमंत्री ने अपने ही विरुद्ध एक और संदेह को जन्म दे दिया.

उधर, सोशल ऑडिट रिपोर्ट मिलने के बाद से लेकर एफ़आइआर दर्ज करने तक बरती गई शिथिलता और सीबीआई जाँच में शुरुआती आनाकानी ने लीपापोती की प्रबल आशंका पैदा कर ही दी थी.

कहा तो यही जा रहा है कि गृहमंत्री राजनाथ सिंह अगर इस कांड की जाँच सीबीआई से कराने के पक्ष में बयान नहीं दिए होते तो बिहार पुलिस से जाँच का अपना इरादा बदलने को मुख्यमंत्री क़तई तैयार नहीं होते.

Image caption मुज़फ़्फ़रपुर बालिका गृह कांड में मुख्य अभियुक्त हैं ब्रजेश ठाकुर

गठबंधन सरकार में अंदरूनी अविश्वास

इसी सिलसिले में बिहार के राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री को लिखे गए दो-दो पत्र, कथित बीजेपी समर्थक टेलीविज़न चैनलों पर भी नीतीश सरकार की खिंचाई और सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले का स्वत: संज्ञान- यह सब जेडीयू के लिए अप्रत्याशित था.

तभी तो दबी ज़ुबान से ही सही, नीतीश समर्थकों ने इसके राजनीतिक मायने-मतलब निकालने शुरू कर दिए.

यानी राज्य की गठबंधन सरकार के दोनों घटकों (जेडीयू-बीजेपी) के बीच अंदरूनी अविश्वास के तार झनझना उठे.

यह भी कहा जाने लगा है कि आगामी लोकसभा चुनाव में अपना सियासी वक़त (हैसियत) बढ़ाने के लिए पिछले दिनों बेताब दिखे नीतीश कुमार को बीजेपी इसी बहाने झटका खाने देना चाहती है.

कई प्रेक्षक इस ख़याल के भी हैं कि सीबीआई के ज़रिये नीतीश कुमार को अगले लोकसभा चुनाव तक क़ाबू में रखने का सुनहरा मौक़ा बीजेपी के हाथ लगा है.

इमेज कॉपीरइट NEERAJ PRIYADARSHI/BBC
Image caption मुज़फ़्फ़रपुर बालिका गृह कांड के मुख्य अभियुक्त ब्रजेश ठाकुर के हाथों में हथकड़ी और चेहरे पर हंसी लिए तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो चुकी है

मुज़फ़्फ़रपुर बालिका गृह कांड

जबकि मेरे ख़याल से यही कांड बीजेपी के विरोधियों का भी अगले चुनाव में एक बड़ा हथियार बन सकता है, जो केंद्र सरकार की 'बेटी बचाओ' मुहिम पर चोट करने की क्षमता रखता है.

जहाँ तक जेडीयू-बीजेपी के आपसी रिश्ते में इस कारण तनाव बढ़ने वाली बात है, तो फ़िलहाल दोनों पक्ष अपनी-अपनी रणनीति और पारस्परिक स्वार्थ के तहत संयम बरतने को विवश हैं.

लेकिन यह सच है कि मुज़फ़्फ़रपुर बालिका गृह कांड ने बीजेपी के बजाय जेडीयू की तरफ़ ज़्यादा जनाक्रोश बढ़ाया है. या कहें कि राज्य की गठबंधन सरकार को नहीं, ख़ास कर नीतीश कुमार को इस बाबत मुख्य निशाने पर लिया जा रहा है.

ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि जिन सरकारी विभागों से ब्रजेश ठाकुर की भरपूर कमाई होती रही है, वे विभाग जेडीयू कोटे के मंत्री और ख़ुद मुख्यमंत्री के पास रहे हैं.

Image caption मुज़फ़्फ़रपुर की घटना के ख़िलाफ़ जंतर मंतर पर 4 अगस्त को ग़ैर-भाजपाई दलों के नेता जुटे

महिलाओं की रक्षा का दावा करने वाली सरकार

इसके अलावा ब्रजेश ठाकुर के निजी निमंत्रण पर मुज़फ़्फ़रपुर जा कर उसका एक बार आतिथ्य स्वीकार कर चुके मुख्यमंत्री को विपक्ष ब्रजेश का बेहद क़रीबी क़रार दे रहा है.

यही सब कारण हैं, जिनके आधार पर नीतीश कुमार को घेरने और उनके इस्तीफ़े तक की माँग करने यहाँ विरोधी दल सड़कों पर उतरने लगे हैं.

दूसरी तरफ़ राज्य की आम जनता इस बात से परेशान है कि महिलाओं की रक्षक होने का दावा करने वाली सरकार के ही लोग भक्षक बन बैठे हैं.

जब भी ऐसा कोई प्रकरण आता है, तब नीतीश कुमार यह जुमला ज़रूर बोलते हैं कि "न हम किसी को फँसाते हैं और न ही किसी को बचाते हैं."

यहाँ सवाल उठता है कि सरकारी आश्रय गृह की 34 बेसहारा बालिकाओं के साथ वर्षों से दुष्कर्म करते आ रहे दरिंदों को अबतक बचाने का पाप किस सरकार के हाथों हुआ है?

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