RS उपसभापति चुनाव: इन चूकों के चलते हारा कांग्रेस उम्मीदवार

  • 10 अगस्त 2018
राहुल गांधी, कांग्रेस, इमेज कॉपीरइट @INC

एक साल पहले ठीक नौ अगस्त के दिन ही अहमद पटेल ने विपरीत परिस्थितियों में भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह को उनके घरेलू मैदान में मात देते हुए राज्यसभा की सीट जीत ली थी, लेकिन एक साल बाद राज्य सभा में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को उप सभापति के चुनाव में हार का सामना करना पड़ा.

सवाल यही है कि अगर अहमद पटेल सत्ताधारी बीजेपी के नाक के नीचे से राज्य सभा की सीट निकाल सकते हैं तो आंकड़ों में बेहतर स्थिति होने के बावजूद संयुक्त विपक्ष के उम्मीदवार को राज्य सभा के उपसभापति के चुनाव में हार का सामना कैसे करना पड़ा?

पटेल की जीत में दो अहम कारक रहे थे- एक पटेल की राजनीतिक सूझबूझ और दूसरी एनसीपी और जेडीयू जैसी छोटी पार्टियों का तमाम दबाव के बाद भी उनके साथ टिके रहना.

इमेज कॉपीरइट DD NEWS

राज्य सभा के उपसभापति के चुनाव में ऐसा देखने को नहीं मिला. टीडीपी, वायएसआर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के सांसद वोट देने के दौरान अनुपस्थित रहे. इतना ही नहीं एनडीए उम्मीदवार को बीजू जनता दल, अन्ना द्रमुक और टीआरएस का समर्थन भी मिल गया.

दरअसल कांग्रेस ओडिशा में खुद को बीजू जनता दल को चुनौती देने वाली पार्टी मानती है हालांकि हक़ीक़त ये है कि वहां बीजेपी-बीजेडी की टक्कर होने की संभावना ज़्यादा हो गई है.

ऐसी सूरत के बाद भी नरेंद्र मोदी और अमित शाह नवीन पटनायक तक पहुंच सकते हैं, ऐसे में सवाल यही उठता है कि वो बात क्या है जो राहुल और सोनिया गांधी को ऐसा करने से रोक रही है?

जुलाई, 2018 में लोकसभा के विश्वास मत में हार के बाद राज्य सभा के उपसभापति के चुनाव में कांग्रेस की हार से एक ओर कांग्रेस अध्यक्ष की अनुभवहीनता सामने आई है, उसके साथ ही ये भी ज़ाहिर हुआ है कि सबसे पुरानी पार्टी का राष्ट्रीय राजनीति में सुनहरा दौर बीत चुका है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

रणनीति में कहां कमी रही

अगर कांग्रेस मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मिजोरम में नवंबर-दिसंबर में होने वाले चुनाव में शानदार जीत हासिल नहीं कर पाती है तो विपक्षी एकता की बात परवान नहीं चढ़ पाएगी. विपक्षी एकता और महागठबंधन का दावा कमजोर हो सकता है.

इतना ही नहीं, राहुल को ऐसी रणनीति पर काम करना होगा जिसकी मदद से वे अपने संभावित साझेदारों को संसद के अंदर और बाहर साथ रख पाएं. ये पहले से मालूम था कि संसद के मानसून सत्र में राज्य सभा के उप सभापति का चुनाव होगा, लेकिन इसके बाद एकसमान सोच वाली पार्टी से बात करने के लिए राहुल गांधी ने कोई पैनल नहीं बनाया था.

ये भी अब तक स्पष्ट नहीं हो पाया है कि ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और शरद पवार की एनसीपी ने एनडीए के उम्मीदवार हरिवंश नारायण सिंह के सामने अपने उम्मीदवार खड़ा करने से इनकार क्यों कर दिया. शरद पवार को अहमद पटेल, दोनों राज्य सभा के सदस्य हैं, उन्होंने क्यों नहीं खुलकर रणनीति बनाने की छूट दी गई?

वास्तविकता में अभी जिस विपक्षी एकता की बात होती है, वह दिवास्वप्न जैसा ही है. मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में अभी तक चुनाव को लेकर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी- बहुजन समाज पार्टी के बीच कोई ठोस बातचीत नहीं हुई है. अभी तक नेतृत्व के मुद्दे पर या फिर एक दूसरे को नुकसान नहीं पहुंचाने को लेकर भी ठोस पहल नहीं दिखी है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

कांग्रेस की हिचक

उदाहरण के लिए मध्य प्रदेश में समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का कुछ हिस्सों में असर है. 2013 के विधानसभा चनाव में बीजेपी ने 165 सीटों पर जीत हासिल की थी, जबकि कांग्रेस को 58 सीटें मिली थी, बीएसपी को 4 सीटें मिली थीं.

समाजवादी पार्टी और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी को कोई सीट नहीं मिली थी, लेकिन इन दोनों पार्टियों ने मतों का विभाजन कराकर बीजेपी को 53 सीटों का फ़ायदा कराया था. यानी अगर इन पार्टियों का गठबंधन कांग्रेस के साथ होता है तो बुंदेलखंड और पूर्वी मध्य प्रदेश की 53 सीटें जीतना बीजेपी के लिए आसान नहीं रह जाएगा.

छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी मायावती के साथ बातचीत कर रहे हैं. इस राज्य में पांच से छह फ़ीसदी सतनामी दलित वोट जीत और हार में अहम भूमिका निभा सकते हं. ऐसे में कांग्रेस को हाईकमान स्तर पर मायावती से बातचीत करने की ज़रूरत है. सोनिया गांधी और मायावती के बीच बातचीत करके मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में स्थिति को स्पष्ट करने की ज़रूरत है.

कांग्रेस संभवत इसलिए हिचक रही है कि क्योंकि उसे विधानसभा सीटों के साथ साथ लोकसभा सीटों पर भी बातचीत करनी होगी. समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल के सामने कांग्रेस कम से कम उत्तर प्रदेश में बेहतर स्थिति में नहीं दिख रही है.

इसके अलावा एंटी बीजेपी फ्रंट का नेतृत्व कौन करेगा, इसको लेकर भी संशय की स्थिति है. कांग्रेस ने अभी तक राहुल गांधी को फ्रंट लीडर बनाए जाने का सपना त्यागा नहीं है, हालांकि मायावती और ममता बनर्जी भी दमदार दावेदार हो सकती हैं.

इमेज कॉपीरइट EPA

राहलु को सबक

कांग्रेस को उन दलों के साथ बीतचीत करने की ज़रूरत है जो एनडीए में शामिल नहीं हैं, इसका फ़ायदा चार राज्यों की विधानसभा चुनाव के दौरान भी उसे होगा. दुर्भाग्य ये है कि राहुल गांधी के पास सक्रिय नहीं होने का विकल्प नहीं है.

आंख बंद करके अरविंद केजरीवाल के विरोध के चलते राज्य सभा के उपसभापति चुनाव में कांग्रेस को आम आदमी पार्टी के सदस्यों का साथ नहीं मिल पाया.

राहुल गांधी को अपने पार्टी की हितों के साथ विपक्षी एकता में संतुलन साधने की ज़रूरत है. ये बात ठीक है कि दिल्ली की राजनीति में कांग्रेस अपने पांव जमाने की कोशिश कर रही है, इसके लिए पार्टी मुस्लिम और ग़रीब मतदाताओं की तरफ़ देख रही है, इस वर्ग ने 2015 में आम आदमी पार्टी को वोट दिया था.

दरअसल 24, अकबर रोड (कांग्रेस मुख्यालय) में बैठे कुछ लोग ना तो दिल्ली में शून्य तक सिमटने को भूल पाए हैं और ना ही शीला दीक्षित की ज़मानत के जब्त होने की बात को पचा पाए हैं. हालांकि दिल्ली में कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं की यही स्थिति हुई थी. दिल्ली की 70 में से केवल आठ सीटों पर- चांदनी चौक, माटिया महल, मुस्तफ़ाबाद, सीलमपुर, बादली, लक्ष्मीनगर, जंगपुरा और गांधीगनगर में कांग्रेस उम्मीदवार अपनी ज़मानत बचा पाए थे.

लेकिन राजनीति विरोधाभासों में संतुलन साधने का ही काम है, राहुल गांधी को ये सबक बहुत तेज़ी से सीखना होगा.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)