नज़रिया: पश्चिम बंगाल में बीजेपी ऐसे पसार रही है पांव

  • रजत रॉय
  • वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
बीजेपी

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साल 1947 में भारत के बँटवारे के बाद से ही पश्चिम बंगाल सांप्रदायिक राजनीति का आसान निशाना रहा है.

उदारवादी, धर्म निरपेक्ष और लोकतांत्रिक ताक़तें भले ही बंगाल को सांप्रदायिक सद्भाव की मिसाल बनाकर पेश क्यों न करती रही हों पर विभाजन के बाद कई बार होने वाले दंगों ने बंगाल के आधुनिक इतिहास पर अपने निशान छोड़े हैं और उदारवादियों के दावों पर सवाल भी उठाए हैं.

1950, 1963 और 1992 में हुए हिंदू-मुस्लिम दंगों में तो बहुत बड़े और व्यापक स्तर पर हिंसा हुई थी.

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इसके अलावा भी पिछले 70 सालों में पश्चिम बंगाल में स्थानीय स्तर पर हिंसा की अनगिनत घटनाएं हुई हैं.

हाल के वर्षों में उत्तर 24-परगना के बासिरहाट, हावड़ा के धूलागढ़ और मालदा के कालियाचाक में हुए दंगे, साप्रदायिक हिंसा की इसी परंपरा का विस्तार है.

हालांकि ख़ुद के सेक्युलर होने का दावा करने वाली पार्टियों ने भी इसे गंभीरता से नहीं लिया.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इस खाई को पकड़ा और हिंदू बहुल आबादी को अपने पक्ष में करने की कोशिश शुरू कर दी.

ये महज संयोग की बात नहीं है कि उस वक़्त बंगाल में बीजेपी के श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बढ़-चढ़कर काम किया और दक्षिणपंथी भारतीय जनसंघ पार्टी बनाई.

यही आगे चलकर बीजेपी यानी भारतीय जनता पार्टी कहलाई.

हालांकि नया क़ानून लाकर ग़रीब किसानों को ज़मीन देने की वजह से वामदलों ने उनका समर्थन हासिल कर लिया.

दंगों में हिस्सा लेने वाले आम तौर पर समाज के सबसे ग़रीब तबकों से ताल्लुक रखते हैं. इनमें भी ज़्यादातर पेशे से ग़रीब किसान और कामगार होते हैं.

देश की आज़ादी के तुरंत बाद सरकार ने ज़मींदारी प्रथा को ख़त्म कर दिया और इससे ग़रीबों के सपनों को पंख लग गए.

1950-1980 के दशक में राजनीतिक एजेंडा इन्हीं मुद्दों पर आधारित था. तब कांग्रेस और वामदलों के आंदोलनों के केंद्र में भी ग़रीब तबका ही था, फिर चाहे वो हिंदू हो या मुसलमान.

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यूँ भटक गए वामदल

बाद में आर्थिक उदारीकरण और सुधारों के दौर में जब कॉर्पोरेट घरानों को देने के लिए किसानों की ज़मीन का अधिग्रहण किया जाने लगा तो वाम पार्टियां अपने एजेंडे से भटक गईं.

इस समय उन्होंने कॉर्पोरेट घरानों और उद्यमियों को सस्ते दामों में ज़मीन और बाकी सुविधाएं देकर निवेश के लिए आकर्षित करने की कोशिश की.

इसका नतीजा यह हुआ कि वामदलों की रीढ़ माने जाने वाले किसान और ग़रीब कामगर उससे दूर हो गए.

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उन्होंने सिंगूर और नंदीग्राम में कॉर्पोरेट घरानों के ख़िलाफ़ ज़बर्दस्त आंदोलन किया और आख़िरकार सत्ता वामदलों के हाथों से निकल गई.

चुनावी आंकड़ों की नज़र से देखें तो राज्य में तक़रीबन 28% मुस्लिम आबादी है, जो काफ़ी अहम है.

पहले वाम पार्टियां ग्रामीण बंगाल में अपनी धर्मनिरपेक्ष विचारधारा से मुसलमान वोटरों को आकर्षित कर लेती थीं.

लेकिन बाद में सिंगूर और नंदीग्राम विरोधी आंदोलनों के बाद वामदलों के हाथों से उनके वोट निकल गए.

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ममता बनर्जी ने मुसलमानों को लुभाया

सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी ने इस वर्ग को लुभाना शुरू कर दिया. उन्होंने हाई कोर्ट के निर्देशों को नज़रअंदाज़ करते हुए 1,22,000 इमामों और कुछ हज़ार मुअज़्ज़िनों को मासिक भत्ता देना शुरू कर दिया.

कोलकाता हाई कोर्ट ने कहा था कि हिंदू पुजारियों की मांग ख़ारिज़ करते हुए सिर्फ़ इमामों को भत्ता देना धर्म के आधार पर भेदभाव करने जैसा है.

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बांग्लादेशी अवैध प्रवासियों पर राजनीति

इसके अलावा बंगाल में बांग्लादेश से आने वाले अवैध प्रवासियों का मामला भी है.

साल 1989 में सरकार ने संसद में एक रिपोर्ट पेश करते हुए कहा था कि राज्य के बांग्लादेश से सटे 11 ज़िलों में आबादी बढ़ने की दर देश की आबादी बढ़ने की दर से बहुत ज़्यादा है.

उसके बाद से पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा और मेघालय की राजनीति में अवैध प्रवासियों का मामला उभरकर सामने आने लगा.

अवैध प्रवासियों को लेकर बीजेपी शुरू से ही सांप्रदायिक रुख अपनाती आई है.

बीजेपी के मुताबिक़ बांग्लादेश से आने वाले हिंदू 'शरणार्थियों' का भारत में स्वागत है, लेकिन वहीं से आने वाले मुसलमान 'अवैध प्रवासी' हैं और उन्हें भारत में रहने का कोई हक़ नहीं है.

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साल 2014 के आम चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी ने बंगाल में बीजेपी के चुनावी अभियान का नेतृत्व किया था और उन्होंने अपने भाषणों में 'बांग्लादेशियों' को वापस भेजने की बात कही थी.

इन सब वजहों से मुस्लिम वोट ममता बनर्जी के पक्ष में चले गए और हिंदू वोट बीजेपी के पक्ष में. बीजेपी को पश्चिम बंगाल में लोकसभा दो सीटें मिलीं और 2016 के विधानसभा चुनाव में तीन सीटें.

वैसे तो हालिया पंचायत चुनाव में बीजेपी को ग्राम पंचायत के स्तर पर अच्छी खासी सीटें मिलीं लेकिन पंचायत समिति और जिला परिषद् में उसकी उपस्थिति न के बराबर ही है.

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कमज़ोर होती कांग्रेस और सीपीआईएम

दूसरी तरफ़ एक सच यह भी है कि राज्य में सीपीआईएम और कांग्रेस जैसी सेक्युलर पार्टियां लगातार कमज़ोर हो रही हैं.

यही वजह है कि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह समेत पार्टी के बड़े नेता बंगाल में तमाम राजनीतिक अभियानों में शामिल होते नज़र आ रहे हैं.

आरएसएस भी पश्चिम बंगाल में ज़मीनी काम में जुटी हुई है. राज्य में संघ की शाखाओं में लगातार बढ़त दर्ज की जा रही है.

साल 2013 में यहां संघ की 750 शाखाएं थीं जो 2018 में बढ़कर 1279 हो गईं. साल 2017 में रामनवमी के मौके पर बीजेपी और आरएसएस ने मिलकर राज्य के कई जिलों में भारी भीड़ जुटाई थी.

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एनआरसी से बीजेपी को फ़ायदा होगा या नुक़सान?

अब एनआरसी (नेशनल रजिस्ट्री ऑफ़ सिटिज़न्स) का आख़िरी ड्राफ़्ट जारी होने के बाद बंगाल और असम में अवैध प्रवासियों का मुद्दा एक बार फिर ज़ोर-शोर से राजनीतिक बहसों का हिस्सा बनकर सामने आया है. इसके दोनों राज्यों में अलग-अलग नतीजे हो सकते हैं.

असम में यह हिंदू वोटरों को बीजेपी के पक्ष में ले आएगा लेकिन बंगाल में मुसलमान मतदाता एक बार फिर तृणमूल कांग्रेस के समर्थन में चले जाएंगे और चुनावों में बीजेपी का इसका फ़ायदा न के बराबर ही होगा.

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