नज़रिया: करुणानिधि के नहीं रहने के मायने क्या क्या हैं?

  • 12 अगस्त 2018
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कलाइग्नर (करुणानिधि) के बिना तमिलनाडु ऐसा है जैसे तमिलनाडु की आत्मा ने उसका साथ छोड़ दिया हो.

कम से कम 50 से ज़्यादा साल तक करुणानिधि तमिलनाडु के लोगों, ख़ासकर ग़रीबों, वंचितों और शोषित वर्ग की आकांक्षाओं की आवाज़ बने रहे.

यक़ीनन द्रविड़ आंदोलन की शुरुआत का श्रेय टी पेरियार को दिया जाएगा. इसे राजनीतिक शक्ल और मूल तत्व 'अन्ना' ने मुहैया कराया लेकिन अन्ना की विदाई के बाद से आधी सदी तक द्रविड़ विचारधारा का झंडा थामे रहने वाले डॉक्टर कलाइग्नर इस आंदोलन के उद्देश्यों के सबसे प्रखर नेता थे.

वो सिर्फ एक उम्दा वक्ता और शब्दों के जादूगर ही नहीं थे, जो कि उन्होंने हर दिन प्रकाशित होने वाले लेखों, किताबों और कविताओं से साबित किया. ये तमाम नाटकों और फ़िल्मों के लिए लिखी गईं पटकथाएं और संवाद थे, जिन्होंने उन्हें जीवित रहते ही लीजेंड का दर्ज़ा दिलाया.

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वादों पर खरे उतरे

अहम ये भी है कि उनमें क्षमता थी कि मंच पर दिए जाने वाले भाषणों को विस्तृत कार्यक्रमों में बदल सकें. वो उनका ईमानदारी से कार्यान्वयन भी सुनिश्चित करते थे. ये बात उन्हें अतीत और मौजूदा दौर के ऐसे तमाम लोगों से अलग करती है जो भीड़ को तो बांधे रहते हैं लेकिन अपने वादों को ज़मीन पर उतारने में नाकाम रहते हैं.

पांच बार मुख्यमंत्री रहते हुए कलाइग्नर ने दिखाया कि वो राजनीतिक मंच से फ़ोर्ट सेंट जॉर्ज (तमिलनाडु विधानसभा) आसानी से जा सकते हैं.

राज्य के सबसे उम्दा अधिकारियों की प्रतिभा को द्रविड़ उद्देश्यों की पूर्ति के लिए लगा सकते हैं, जबकि इन अधिकारियों में से कई उन अलग-अलग जातियों और वर्गों से थे जिनके दबदबे को खत्म करने के लिए वो प्रतिबद्ध थे.

इन ऊंची जाति के अधिकारियों के प्रति उन्होंने इतना सद्भाव दिखाया कि वो तमिलनाडु ही नहीं बल्कि देश के सबसे बड़े सामाजिक बदलाव में स्वेच्छा से उनके साथ आ गए.

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बदल दिए विकास के सिद्धांत

अर्थशास्त्री मानते हैं कि वित्त पोषित सामाजिक न्याय की योजनाएं चलाने से पहले आर्थिक विकास होना चाहिए लेकिन कलाइग्नर और द्रविड़ आंदोलन ने ऐसे सिद्धातों को उलट दिया और पूरे भरोसे के साथ सामाजिक कल्याण, सामाजिक न्याय और सामाजिक सुधार के कार्यक्रम चलाए.

इनके जरिए भूमिहीन श्रमिकों से लेकर संपन्न उद्योगपतियों तक के लिए समावेशी आर्थिक विकास का आधार तैयार किया गया. ये पूरी तरह से शांतिपूर्ण क्रांति थी. बिना किसी तरह की हिंसा, बिना किसी तरह की गोलीबारी और किसी की जान लिए हुए.

इससे भी बढ़कर ये एक लोकतांत्रिक सामाजिक क्रांति थी जिसमें नाटकीय उपायों को आजमाने, उन्हें नैतिक वैधता देने और उनके पक्ष में जनसमर्थन दिखाने के लिए लोकतंत्र की चुनावी राजनीति के औजारों का इस्तेमाल किया गया.

कई पैमानों पर अव्वल

द्रविड़ आंदोलन ख़ासकर कलाइग्नर के शासन में तमिलनाडु न सिर्फ पोषण देने, स्कूलों में मिड डे मील उपलब्ध कराने, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण के पैमाने पर देश के दूसरे देशों से आगे निकल गया बल्कि उसी दौर में धान उगाकर हरित क्रांति की मिसाल बन गया.

सबसे तेज़ औद्योगिकीकरण के मामले में तमिलनाडु पहले पायदान पर पहुंच गया.

जिस बात पर अक्सर कम ज़ोर दिया जाता है वो ये है कि औद्योगिकीकरण मुख्य तौर पर सार्वजनिक क्षेत्र या फिर सरकार और निजी क्षेत्र की भागीदारी के ज़रिए किया गया. न सिर्फ़ भारी उद्योग का विकास हुआ, छोटे, मध्यम और सूक्ष्म उद्योगों ख़ासकर हैंडलूम और हैंडीक्रॉफ्ट का भी प्रसार हुआ.

इससे विकास जड़ तक पहुंचा और ग्रामीण इलाकों में शहरीकरण को प्रोत्साहन मिला. रोजगार के अवसर बढ़े.

अभिशाप से मुक्ति

कलाइग्नर के मुक़ाबले किसी और ने राज्य और समाज में ब्राह्मणवाद को परे धकेलने का काम नहीं किया जो कि शताब्दियों से तमिलनाडु के लिए अभिशाप बना हुआ था.

संस्कृत की जगह मंदिरों में तमिल का इस्तेमाल, तमिल संस्कृति को रेखांकित किया जाना और तमिल होने से जुड़े गर्व की घोषणा ने एक ऐसी प्राचीन सभ्यता को नई प्रेरणा दी, जिसके आगे आर्यों के साथ एकरूपता में अपनी पहचान गंवाने का ख़तरा था.

संघीय ढांचे पर ज़ोर देने के साथ, कम से कम साल 1962 के बाद से डॉक्टर कलाइग्नर ने राष्ट्रीय एकता की ज़रूरत पर भी बल दिया.

वो सिर्फ़ तमिल अधिकारों के जुझारू योद्धा नहीं थे. वो एक महान भारतीय नागरिक और एक महान भारतीय देशभक्त भी थे.

मौत के क्रूर हाथों ने उन्हें हमसे भले ही छीन लिया हो, करुणानिधि की विरासत को आगे बढ़ाना सबसे अहम कर्तव्य है, फिर चाहे आप तमिल हों या किसी भी राजनीतिक विचारधारा को मानते हों.

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