आरक्षित पदों पर भर्ती का पेंच क्या? सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

  • 13 अगस्त 2018
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विश्वविद्यालयों में आरक्षित पदों पर शिक्षकों की भर्ती का तरीक़ा क्या हो, इस पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट सुनवाई करेगा.

पिछले महीने ही यूजीसी ने विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की भर्ती रोक देने का आदेश दिया था.

दरअसल, केंद्र ने ही सुप्रीम कोर्ट में भर्ती के तरीक़े को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फ़ैसले को चुनौती दी है.

क्या है विवाद

विश्वविद्यालयों में 2006 से आरक्षण का रोस्टर लागू है.

इसके तहत विश्वविद्यालय को इकाई मानकर ओबीसी और एससी-एसटी के लिए आरक्षण लागू किए जाता था.

नियम के हिसाब से भर्तियों में 15 फ़ीसदी आरक्षण अनुसूचित जाति, 7.5 फ़ीसदी अनुसूचित जनजाति और 27 फीसदी आरक्षण ओबीसी के लिए तय है.

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले विवेकानंद तिवारी ने इलाहाबाद कोर्ट में याचिका डाली कि विश्वविद्यालय को नहीं बल्कि इसके विभागों को इकाई मानकर आरक्षण दिया जाए.

हाई कोर्ट ने 7 अप्रैल 2017 को इस याचिका के पक्ष में फैसला दिया. केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय इसके ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट गया, पर राहत नहीं मिली.

यूजीसी ने 5 मार्च को इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फ़ैसले को लागू कर दिया और इसके बाद केंद्रीय और राज्यों के विश्वविद्यालयों में भर्ती शुरू भी हो गई.

भर्तियों के बाद सामने आया कि इस नए नियम की वजह से दो-तिहाई पद अनारक्षित वर्ग को चले गए.

ये मामला संसद में भी उठा और सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आने तक सरकार ने यूजीसी को भर्तियां रोक देने का आदेश दिया.

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क्यों है ये महत्वपूर्ण

इलाहाबाद हाई कोर्ट का कहना था कि अगर विश्वविद्यालय को इकाई मानकर आरक्षित पद भरे जाते हैं तो इसकी वजह से कुछ विभागों में शायद सभी आरक्षित उम्मीदवार होंगे और कुछ विभागों में एक भी नहीं होगा.

हाई कोर्ट के मुताबिक पुराना तरीक़ा पक्षपाती और अतार्किक है और संविधान के आर्टिकल 14 और 16 का उल्लंघन है.

वहीं जानकारों का मानना है कि इस नए नियम से आरक्षित वर्ग के लिए सीटें कम हो जाएंगी.

अगर किसी विभाग में एक ही सीट है तो फिर आरक्षण लागू नहीं किया जा सकता. मसलन, किसी विभाग में असिस्टेंट प्रोफ़ेसरों की तुलना में प्रोफेसरों की संख्या कम ही होती है.

लेकिन अगर सभी विभागों के प्रोफेसरों के पद मिलाकर आरक्षण लागू किया जाए तो आरक्षण को बेहतर ढंग से लागू किया जा सकता है और आरक्षित वर्ग के लोगों की संख्या भी कम नहीं होगी.

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केंद्र सरकार का पक्ष

जुलाई में मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावडेकर ने कहा था कि सरकार इलाहाबाद हाई कोर्ट के फ़ैसले से सहमत नहीं है और सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने स्पेशल लीव पिटीशन दाखिल की है.

राज्यसभा में उन्होंने कहा था कि आरक्षण एक संवैधानिक अधिकार है और वे एससी-एसटी और ओबीसी को 50 फीसदी आरक्षण देने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

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क्या है असमंजस

6 सितंबर 2017 में मानव संसाधन मंत्रालय ने ही यूजीसी को आदेश दिया था कि एक कमेटी बनाकर आदेश की समीक्षा करे और फिर यूजीसी ने पांच मार्च को इस इलाहाबाद कोर्ट के फ़ैसले को लागू कर दिया.

यूजीसी के निर्देश के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि आरक्षण के नए रोस्टर के तहत भर्ती होकर जॉइन करने वाले शिक्षकों का क्या होगा‌?

जो भर्तियां पूरी हो चुकी हैं और जो रोकी जा रही हैं, वह सब एक ही विज्ञापन व रोस्टर के अंतर्गत है.

इंडियन एक्सप्रेस अख़बार ने अधिकारिक डेटा देते हुए लिखा है कि 41 यूजीसी फ़ंडेड विश्वविद्यालयों में कुल 17,106 शिक्षकों के पद हैं.

इनमें से 5,997 पद अप्रैल 2017 तक उपलब्ध जानकारी के मुताबिक खाली पड़े हैं. इसका मतलब तक़रीबन 35 फ़ीसदी पद खाली हैं.

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