झारखंडः 600 किसान परिवारों पर बेघर होने का संकट

  • 17 अगस्त 2018
चतरा इमेज कॉपीरइट Asghar Khan/BBC

झारखंड के चतरा ज़िले के किसानों के सामने चिंता और चुनौती दोनों ही एक साथ आ पड़ी है.

चिंता इस बात की है कि अगर वे अपनी ज़मीन और घर से बेघर हो गए तो कहां जाएंगे, और चुनौती ज़मीन को कैसे बचाएंगे?

क्योंकि किसानों के अनुसार उनके पास जिस ज़मीन पर 'मालिकाना दावा' करने के कागज़ात हैं, वो वन विभाग की नज़र में मान्य नहीं हैं.

दरअसल, चतरा के कई गांवों के किसान और ग्रामीणों पर वन विभाग का दबाव है कि वो जल्द-जल्द से मकान और ज़मीन खाली करें, नहीं तो खाली करवाया जाएगा.

वन विभाग ने इस बाबत गांव वालों को नोटिस भी भेजा है. इसी वजह से 600 से भी अधिक किसान परिवारों पर बेघर होने का संकट मंडराने लगा है.

चतरा के ज़िला वन अधिकारी (डीएफओ) का कहना है कि वन भूमि को लेकर जो कार्रवाई हो रही है वो सरकार के निर्देश पर है.

इमेज कॉपीरइट Asghar Khan/BBC
Image caption तुलसीदास

गांव वालों की शिकायतें

इनकी 1400 एकड़ से भी अधिक ज़मीन को वन विभाग ने वन भूमि बताकर खाली करने का नोटिस भेजा है. जबकि किसान इन जमीनों पर पूर्वजों के समय से रहते आने की बात कह रहे हैं.

लावालौंग प्रखंड के पतरातू गांव के तुलसीदास कहते हैं, "एक साल पहले रेंजर ने आकर हमारी जमीन पर वन विभाग का पिलर गाड़ दिया. विरोध करने पर कहा कि इस पिलर को सिर्फ निशान के तौर पर गाड़ रहे हैं, इससे कोई दिक्कत नहीं होगी. इस साल जून में आकर अधिकारी कहते हैं कि ये वन भूमि है इसपर खेती नहीं करना है और घर भी खाली करो."

विनोद दास कहते हैं कि उनका परिवार तीन पीढ़ी से रहता आ रहा है. उनके पास जमीन का पर्चा, रसीद और नक्शा भी है, पर वन विभाग मानने को तैयार नहीं है.

60 वर्षीय गोपाल राम के मुताबिक वह बाप-दादा से इसी जमीन से गुजर-बसर करते आ रहे हैं. अगर उनसे उनकी ज़मीन छीन ली जाएगी, तो परिवार को लेकर वो कहां जाएंगे.

डीएफओ आरएन मिश्रा कहते हैं, "हमें सरकार की तरफ से निर्देश दिया गया है कि सभी वन भूमि चिन्हित कर उसे अतिक्रमण से मुक्त कराया जाए. जिन जगहों पर वन भूमि चिन्हित हुई, वहां के ग्रामीणों को समय दिया गया है कि वे ज़मीन के पेपर दिखाएं और अपना पक्ष रखें."

इमेज कॉपीरइट Asghar Khan/BBC

वन विभाग का नोटिस

गोपाल राम के गांव में लगभग 20 घरों को वन विभाग की तरफ से खाली करने की नोटिस मिला है.

इसी गांव की सुनती देवी बताती हैं कि अधिकारी केस करने की धमकी देते हैं. चार लोगों पर केस भी हो गया है. यहां के किसानों की करीब 50 एकड़ जमीन है, जिसे वन विभाग ने खाली करने को कहा है.

कान्हा चट्टी प्रखंड के छेवटा गांव के जुलाल दांगी, आगे जीवन कैसे यापन करेंगे, इसे लेकर चिंता में हैं.

वो कहते हैं, "हमारे पूर्वजों ने ज़मींदार से 44 हुकुमनामा पर ज़मीन लिया था. 1957 से लेकर 2012 तक रसीद भी कटी, लेकिन इसके बाद से रसीद कटनी बंद हो गई. अब वन विभाग कोई कागज़ को नहीं मान रहा. जबरन ज़मीन अपने कब्जा में ले रहा है."

जबकि ज़िला भू-अर्जन पदाधिकारी (एलआरडीसी) अनवर हुसैन इस बाबत बहुत ज़्यादा जानकारी नहीं होने की दलील देते हैं.

हालांकि वे ये भी मानते हैं, "कागज़ात को जांचने का काम तो भू-अर्जन पदाधिकारी का ही होता है, लेकिन गांव में अधिकतर लोगों ने फर्जी तरीके से कागज़ात बना रखा है."

इमेज कॉपीरइट Asghar Khan/BBC
Image caption गोपाल राम

सरकारी ज़मीन बताकर

छेवटा के ही कई आदिवासी परिवार इस मुसीबत का सामना कर रहे हैं. यहां के लोगों कहना है कि उनके एक घर पर वन विभाग ने पोकलेन तक चला दिया है.

शांता और बिछू देवी कहती हैं, "हमलोगों ने भी ठान लिया है कि ज़मीन किसी भी क़ीमत पर खाली नहीं करेंगे क्योंकि इसके सारे कागज़ात हमारे पास हैं."

वन क़ानून के जानकार और झारखंड जंगल बचाओ आंदोलन के संस्थापक संजय बासु मलिक कहते हैं, "वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत तीन पीढ़ी से रहते आ रहे लोंगों को काफ़ी अधिकार प्राप्त हैं. कोई पर्चा-रसीद धारक या जिनके पास कागज़ात नहीं भी है, वो भी ज़मीन पर दावा कर सकते हैं. इसके लिए लिए क़ानून में प्रावधान है. इसके लिए गांव सभा और आसपास के लोगों को स्वीकृति देनी पड़ती है कि ये यहां तीन पीढ़ी से रहते आ रहे हैं."

बासु ये भी कहते हैं कि ग्रामीणों के पास जो पर्चा है, वो गैरमजरुआ ख़ास ज़मीन का है और उसकी रसीद भी कटती थी, लेकिन राज्य में नई सरकार ने इसे साल 2015 के बाद से बंद कर दिया है.

वो कहते हैं, "अब ऐसा लगता है कि सरकार इसे जंगल और सरकारी ज़मीन बताकर अपने कब्जा में लेना चाह रही है."

इमेज कॉपीरइट Asghar Khan/BBC

सालों से खेती कर रहे हैं

पतरातू गांव में तकरीबन 55 एकड़ ऐसी ज़मीन है जिसे वन विभाग वन भूमि बता रहा है. चतरा प्रखंड के पकरिया और ढड़हा गांव में 100 से भी अधिक परिवार इसकी जद में है.

यहां के प्रदीप उरांव बताते हैं कि कई घरों को वन विभाग ने जमीन खाली करने का नोटिस दिया था, और उसी दौरान उनकी ज़मीनों पर पिलर गाड़ा गया था.

इस गांव में किसानों के पास ज़मीन का पर्चा भी है और रसीद भी. यहां हर परिवार के पास दो से तीन एकड़ ज़मीन है, जिसपर पर वो वर्षों से खेती करते आ रहे हैं.

हालांकि डीएफओ का ये कहना है कि जिन जगहों पर वन विभाग की तरफ से ग़लत पिलर गाड़ दिया गया, उसे हटा भी दे रहे हैं.

दस्तावेज़, रसीद के बावजूद जमीन को वन भूमि क्यों बताया जा रहा है के प्रश्न पर, डीएफ़ओ कहते हैं कि उनमें अधिकतर ग्रामीणों के पास फ़र्ज़ी कागज़ात हैं.

जबकि ज़िला भू-अर्जन पदाधिकारी (एलआरडीसी) अनवर हुसैन सलाह देते हैं, "वन अधिकारी और पीड़ित दोनों को ही इसे लेकर ज़िला भू-अर्जन पदाधिकारी के कार्यलाय में अपील करनी चाहिए."

गांव वालों के लिए ऐसी ही सलाह डीएफ़ओ आरएन मिश्रा की भी है, "अगर उन्हें लगता है कि ग़लत किया गया है तो वे डीसी और न्यायालय में अपील कर सकते हैं."

इमेज कॉपीरइट Asghar Khan/BBC

दलित और आदिवासी

पकरिया और ढड़हा गांव की अधिकांश आबादी और इससे पीड़ित परिवार दलित और आदिवासी है, जिनकी 250 से एकड़ से अधिक की ज़मीन को वन विभाग वन भूमि बता रहा है.

यहां के कई किसानों ने इसे लेकर न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है और कई अन्य इसकी तैयारी कर रहे हैं.

चतरा प्रखंड के ही गोडरा, लूपुंगा और लातबेर गांव में ये आंकड़ा तकरीबन 400 के करीब है, जहां के किसानों और ग्रामीणों को वन विभाग की तरफ से कोई नोटिस तो नहीं मिला है.

लेकिन सर्वेयर ने ये बताकर, उनकी ज़मीन का रजिस्ट्रेशन नहीं किया है कि ये वन भूमि की ज़मीन है और इसे लेकर किसी भी समय नोटिस या खाली करवाया जा सकता है.

लेकिन इस पूरे मामले पर चतरा के ज़िलाधिकारी जीतेंद्र कुमार सिंह सिर्फ ये कहते हुए अपनी बात खत्म कर देते हैं कि इस मामले वो देख रहे हैं.

चतरा के सांसद सुनील कुमार सिंह ने इस बारे में बीबीसी को बताया कि ये मामला उनके संज्ञान में है. वो इसे लेकर संबंधित अधिकारियों के संपर्क में हैं.

वो कहते हैं, "वन अधिकारियों को जो काम करना चाहिए, वो नहीं कर रहे हैं, बल्कि किसानों और ग्रामीणों को भयभीत कर रहे हैं. दुर्भाग्य ये है कि प्रभावित लोगों की न तो अपत्ति दर्ज की जा रही है और न उनका पक्ष सुना जा रहा है."

इमेज कॉपीरइट Asghar Khan/BBC

हार मानकर छोड़ दिया है...

कान्हा प्रखंड के भांग कुरकुट्टा गांव में 14 किसान परिवार हैं, जिनकी 40 एकड़ ज़मीन को वन विभाग वन भूमि बता रहा है.

वहीं, चतरा प्रखंड के पावो गांव के आदिवासी किसानों का कहना है कि उनकी ज़मीन पर 2005 में ही वन विभाग ने ट्रेंच (ज़मीन काट देना) कर वृक्षा रोपण शुरू कर दिया था.

इस बारे में मदन मुंडा कहते हैं कि उनके पास पर्चा, रसीद सब है. इसी को आधार बनाकर लोग हाईकोर्ट तक गए, लेकिन कुछ नहीं हुआ. अंत में हार मानकर छोड़ दिया है.

सुनील कुमार सिंह का कहना है, "ज़मीन का कागज़ात चेक करना वन अधिकारी काम नहीं है बल्कि एलआरडीसी, सीओ और डीसी का है. वन अधिकारी की तरफ से जिला प्रशासन के साथ बिना समन्वय बनाए ही कागज़ात को फ़र्ज़ी बताना अधिकारियों की मनमानी है. वन अभ्यारण्य इको ज़ोन सेंसेटिव बनाने का जो ड्राफ्ट तैयार हुआ, उसके पहले पन्ने पर लिखा हुआ है कि प्रभावित ग्रामीणों के साथ बातचीत की जाएगी, जो नहीं की जा रही है."

इमेज कॉपीरइट Asghar Khan/BBC

सवाल पुनर्वास का भी है

किसान भले ही चाहे जो भी दलील दें लेकिन एलआरडीसी अनवर हुसैन कहते हैं, "बहुत से ग्रामीणों की रसीद फ़र्ज़ी हैं. ये लोग अंचल स्तर के कर्मचारियों से सांठगांठ कर फ़र्ज़ी ढंग से रसीद कटाते आए हैं. रही बात पर्चे की तो ये अनुमंडल से मिलता है, जिसे जांचा जाना चाहिए कि कब, कैसे और किस आधार उन्हें ज़मीन का पर्चा दिया गया है."

दूसरी तरफ़ आदिवासी किसानों को ज़मीन खाली करने को लेकर मिले नोटिस के बारे में डीएफओ आरएन मिश्रा ने भी साफ़ तौर से इंकार किया.

किसानों के मकानों पर पोकलेन चलाने वाले आरोप को भी निराधार बताते उन्होंने कहा, "तीन-चार गांव में पोकलेन चला, लेकिन किसी भी आदिवासी के गांव या घर पर नहीं."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

मिलते-जुलते मुद्दे