अटल बिहारी वाजपेयी के वो 4 काम जो अधूरे रह गए...

  • 18 अगस्त 2018
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अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री के तौर पर कई कामों के लिए याद किया जाता है. देश में सड़कों का जाल बिछाने की योजना हो या फिर मोबाइल क्रांति, कई मोर्चों पर वाजपेयी ने अपनी दूरदर्शिता दिखाई. इसके साथ ही परमाणु परीक्षण को भी वाजपेयी सरकार ने आक्रामक तरीक़े से अपनी उपलब्धि के तौर पर पेश किया था.

लेकिन ऐसे भी कई मोर्चे थे, जिनपर काफ़ी प्रयास करने के बावजूद वाजपेयी सफल नहीं हो सके. या यूँ कहें कि वो काम जिन्हें पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पूरा करना चाहते थे लेकिन नहीं कर सके. एक नज़र ऐसी ही कामों पर:

नदी जोड़ो योजना

देश भर की नदियों को जोड़कर सिंचाई से लेकर बाढ़ तक की समस्या से निपटने का सपना उन्हीं कार्यकाल में देखा गया. नदी जोड़ो योजना में गंगा सहित 60 नदियों को जोड़ने की योजना थी. मकसद ये था कि इससे कृषि योग्य लाखों हेक्टेयर भूमि की मॉनसून पर निर्भरता कम हो जाएगी.

2002 में देश में भयानक सूखा पड़ा था. इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने नदियों को आपस में जोड़ने के काम की व्यावहारिकता परखने के लिए एक कार्य दल का गठन किया. इसने उसी साल अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी. इसमें भी परियोजना को दो भागों में बांटने की सिफारिश की गई.

पहले हिस्से में दक्षिण भारतीय नदियां शामिल थीं जिन्हें जोड़कर 16 कड़ियों की एक ग्रिड बनाई जानी थी. हिमालयी हिस्से के तहत गंगा, ब्रह्मपुत्र और इनकी सहायक नदियों के पानी को इकट्ठा करने की योजना बनाई गई जिसका इस्तेमाल सिंचाई और बिजली परियोजनाओं के लिए होना था. लेकिन फिर 2004 में कांग्रेसनीत यूपीए की सरकार आ गई और मामला फिर ठंडे बस्ते में चला गया.

हालाँकि इस परियोजना का विरोध करने वालों की भी कमी नहीं रही. कई सामाजिक कार्यकर्ताओं का तर्क है कि इतने व्यापक स्तर पर प्रकृति से खिलवाड़ के परिणाम बहुत घातक हो सकते हैं. अगर नदियों की भूगर्भीय स्थिति, उनमें गाद आने की मात्रा, देश में ही दूसरी बड़ी नहर परियोजनाओं के अनुभवों और विदेशों में ऐसी परियोजनाओं के हश्र पर ठीक से गौर किया जाए तो नदी जोड़ परियोजना बहुत विनाशकारी साबित होने वाली है.

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केंद्रीय जल संसाधन और नदी विकास मंत्री नितिन गडकरी ने कहा है कि नदी जोड़ो परियोजनाओं पर काम की गति तेज करने के लिए राज्यों का आपस में सहयोग ज़रूरी है.

अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी के रिश्ते कैसे रहे

कश्मीर समस्या का हल

जब भी कश्मीर में चरमपंथ की जटिल समस्या के समाधान की बात आती है तो अटल बिहारी वाजपेयी के फॉर्मूले की बात की जाती है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने हालिया भाषण में कश्मीर की समस्या को सुलझाने के लिए वाजपेयी के रास्ते पर चलने की बात कही है.

क्योंकि वाजपेयी को उन नेताओं में गिना जाता है जिनकी कश्मीरियों के बीच अच्छी पैठ थी.

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साल 2003 में 18 अप्रैल को श्रीनगर में दिए एक भाषण में वाजपेयी ने कहा था, "अभी तक जो खेल होता रहा, मौत का... खून का...वो बंद होना चाहिए. लड़ाई से समस्या हल नहीं होगी. अभी आपने देखा, इराक में लड़ाई बंद हो गई. अच्छा हुआ, हम तो कहते हैं कि इराक में लड़ाई होनी ही नहीं चाहिए थी. क्या जरूरत थी लड़ाई की? जो सवाल हैं, जो मसले हैं, उन्हें आपस में बातचीत करके हल करो. बंदूक से मसले हल नहीं होंगे, बंदूक से आदमी को मारा जा सकता है लेकिन बंदूक से उसकी भूख नहीं मिट सकती."

इसके साथ ही उन्होंने कहा, ""हम लोग यहां आपके दुख और दर्द को बांटने आए हैं. आपकी जो भी शिकायतें हैं, हम मिलकर उसका हल निकालेंगे. आप दिल्ली के दरवाजे खटखटाएं. दिल्ली की केंद्र सरकार के दरवाजे आपके लिए कभी बंद नहीं होंगे. हमारे दिलों के दरवाजे आपके लिए हमेशा खुले रहेंगे."

वाजपेयी के इस भाषण के बाद कश्मीरियों में उनकी स्वीकारोक्ति बढ़ गई थी.

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वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश शर्मा कहते हैं, "वाजपेयी ने पाकिस्तान के साथ शांति को लेकर सभी उपायों पर काम किया. कश्मीर के अलगाववादियों से बातचीत का सिलसिला भी शुरू किया गया. लेकिन आगे चलकर ऐसा लगा कि अलगाववादी पाकिस्तान के इशारे पर चल रहे हैं. और उनकी दिलचस्पी शांति में कम थी."

इस दिशा में असली कोशिशों को अंजाम देते हुए आगरा शिखर सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसमें पाकिस्तान से जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ को बुलाया गया.

ऐसा माना जाता है कि इस सम्मेलन में मुशर्रफ़ और वाजपेयी ने कश्मीर की समस्या का हल निकाल ही लिया था लेकिन, आख़िरकार इस सम्मेलन का मंसूबा सफल न हो सका.

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पाकिस्तान के साथ शांति

कश्मीर के साथ-साथ पाकिस्तान और दूसरे पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों को लेकर वाजपेयी का रुख काफी सकारात्मक था.

अटल बिहारी वाजपेयी ने 21 फ़रवरी 1999 में पाकिस्तान में दिए अपने एक भाषण में कहा था, ""पाकिस्तान फले फूले हम चाहते हैं और हम फलें-फूलें यह आप भी चाहते होंगे. इतिहास बदला जा सकता है, मगर भूगोल नहीं बदला जा सकता. आप दोस्त बदल सकते हैं, पड़ोसी नहीं बदल सकते, तो अच्छे पड़ोसी के नाते रहें."

पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारने की दिशा में उन्होंने दिल्ली लाहौर बस सेवा शुरू की जिसमें सवार होकर उन्होंने खुद दो दिनों की पाकिस्तान यात्रा भी की.

वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव बताते हैं, "जब वाजपेयी ने लाहौर बस सेवा शुरू करने और बस में बैठकर पाकिस्तान जाने का फ़ैसला किया तो उस दौर में ये अपने आप में बेहद अप्रत्याशित फ़ैसला था. सुरक्षा की दृष्टि से भी ये बेहद जोख़िम भरा था लेकिन वाजपेयी ने इस फ़ैसले पर अमल किया. इसके बाद उन्हें करगिल युद्ध का सामना करना पड़ा. लेकिन इसके बाद भी उन्होंने अपने पड़ोसी मुल्क के साथ शांति स्थापित करने के लिए कारगिल युद्ध के लिए ज़िम्मेदार रहे परवेज़ मुशर्रफ़ को आगरा बुलाया."

अयोध्या मुद्दे का हल

अटल बिहारी वाजपेयी ने साल 1999 से 2004 के दौरान अपनी सरकार में अयोध्या बाबरी विवाद को सुलझाने के लिए कोशिशें शुरू की थीं.

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कांची कामकोटि पीठ के प्रमुख श्री श्री जयेंद्र सरस्वती शंकराचार्य ने साल 2010 में दावा किया था कि वह अयोध्या मसले का हल निकालने के करीब पहुंच गए, लेकिन ऐन मौके पर सुप्रीम कोर्ट में इससे जुड़ा मामला पहुंचने की वजह से उनकी कोशिशें खटाई में पड़ गईं.

जयेंद्र सरस्वती उन धर्मगुरुओं में शामिल थे जिन्हें वाजपेयी के करीब माना जाता था.

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर से इस मसले को देखने वाले ख़ालिक अहमद बताते हैं, "जयेंद्र सरस्वती पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी के बेहद करीबी लोगों में से एक थे. इस बात में बहुत संभावना है कि वाजपेयी ने इस समस्या के निदान के लिए सरस्वती को आगे बढ़ाया हो. हमें सबसे पहले साल 2002 में जयेंद्र सरस्वती की ओर से इस मसले पर पहला प्रस्ताव मिला. लेकिन इसके बाद जब हमने मंदिर बनाने की जगह को लेकर नक्शे की मांग की तो हमें वह प्राप्त नहीं हुआ."

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