ब्लॉग: वाजपेयी से तुलना पर झुँझलाते होंगे नरेंद्र मोदी?

  • 20 अगस्त 2018
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अल्मोड़ा के पास एक छोटे से पहाड़ी गाँव में मेरे ननिहाल की एक कोठरी के पूजाघर में हनुमान जी का एक पुराना और धुंधला चित्र लटका रहता था. एक हाथ में गदा और दूसरे में पहाड़ उठाए लंबी सी पूँछ वाले इस भगवान को देखना और देखते ही रहना मेरा सबसे प्रिय शग़ल था.

हम बच्चों को बताया गया था कि ये हनुमान जी सब संकटों का निवारण करते हैं. कभी किसी तरह का भय सताए तो इन तस्वीर का स्मरण करना, हनुमान ख़ुद वहाँ आ जाएँगे. मुझे इस पर इतना पक्का विश्वास था कि कभी कभी मैं हनुमान जी के उस पर्दे से निकल आने की कल्पना करने लगता था.

कपड़े पर बनी उस धुँधली सी तस्वीर को देखकर अँधेरे से, भूतों से, मृत्यु से और बड़ों की डाँट की आशंका से डरे हुए बालमन को जैसा भरोसा और सुकून मिलता था, उसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है. हनुमान का वो चित्र मेरा सहारा था.

लगभग एक साल पहले दिल्ली की सड़कों पर घूमती महँगी और सस्ती कारों के पीछे एक और हनुमान की तस्वीर नज़र आने लगी. अगर ये तस्वीर हनुमान की है तो इससे डर लगता है. तस्वीर की आँखें ख़ौफ़ पैदा करती हैं. पैने दाँत गरदन पर गड़ते महसूस होते हैं. माथे पर लगा लंबा सा टीका कँपकँपाहट पैदा करता है.

ये स्टिकर मेरे बचपन के हनुमान जी नहीं हो सकते.

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ज़िक्र करते हुए मुझे अचानक मेरे बचपन के हनुमान और उनका मौजूदा विद्रूप क्यों याद आने लगा?

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जो लोग अटल बिहारी वाजपेयी की मृत्यु पर उन्हें एक क़द्दावर स्टेट्समन के साथ साथ एक विनोदप्रिय, भोजनप्रिय, सामान्य मनुष्य की मनुष्यता से भरे हुए व्यक्ति के तौर पर याद कर रहे हैं, उन सबको अटल की ये छवि एक भरोसा देती आई है.

जन्मजात स्वयंसेवक थे वाजपेयी

संकट चाहे जितना भी गहरा हो, समाज में दरार चाहे जितनी गहरी खोद दी गई हो, कितनी ही सफ़ाई से एक नागरिक को दूसरे नागरिक का दुश्मन बना दिया गया हो— अटल बिहारी वाजपेयी की मौजूदगी थी तो उनके प्रशंसकों को (और शायद विरोधियों को भी) लगता रहा होगा कि सब कुछ सँभल जाएगा.

भले ही अटल बिहारी वाजपेयी कुछ न सँभाल पाए हों. भले ही उन्होंने ख़ूँरेज़ी के ज़रिए समाज में सब कुछ बिगाड़ने वाली अपनी विचारधारात्मक बिरादरी से अपना गर्भनाल संबंध काटने की हिम्मत न जुटाई हो. लेकिन उनकी मौजूदगी मेरे बचपन की अँधेरी कोठरी में लटके उस कपड़े के परदे जैसी थी जिसपर बने हनुमान जी की धुँधली पड़ चुकी तस्वीर भारी से भारी संकट के बीच भी भरोसा पैदा करती थी.

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बाबरी मस्जिद का ध्वंस करने के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अधिकारियों और भारतीय जनता पार्टी के तमाम नेताओं को जब कहीं मुँह छिपाने की जगह नहीं मिल रही थी, अटल के इसी भरोसे ने उनको भवसागर से पार उतारा था. वो जन्मजात स्वयंसेवक थे पर संघ के अधिकारियों के सूखे व्यक्तित्वों के प्रभाव से उन्होने ख़ुद को बचाकर रखा. वो ऋषि-मुनि होने की ग़लतफ़हमी में नहीं जिए और शायद इसीलिए आरएसएस उन पर उतना पक्का भरोसा नहीं करता था जितना आडवाणी पर.

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तेरह दिन की सरकार चलाने के बाद वो संसद का भरोसा हासिल नहीं कर पाए और इस्तीफ़ा दे दिया. लेकिन इससे पहले बीजेपी अस्पृश्य हो गई थी. उसे दग़ाबाज़ कहा जाने लगा था. पार्टी के बड़े नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट, राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद, केंद्र सरकार और भारत की पूरी जनता को भरोसा दिलाया था कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद को नहीं तोड़ा जाएगा.

पर उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह की सरकार, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, अशोक सिंघल, ऋतंभरा, विनय कटियार, आचार्य धर्मेंद्र और तमाम रूप-रंग के संतों-महंतों ने इस भरोसे के धुर्रे बिखेर दिए. भारतीय राजनीति का संघ परिवार पर रहा सहा विश्वास भी जाता रहा.

गठबंधन सरकार चलाने का काम किया

ऐसे में अटल बिहारी वाजपेयी ने समुद्र में डूबती भारतीय जनता पार्टी को उसी तरह उठाया जैसे डूबती पृथ्वी को वाराहअवतार ने अपने थूथन से बाहर निकल रहे दाँतों में उठाकर बचाया था. उन्होंने जॉर्ज फ़र्नांडिस, नीतीश कुमार और शरद यादव जैसे समाजवादी नेताओं को अपने साथ आने को तैयार किया और तेरह महीने सरकार चलाई. इसीलिए अटल बिहारी वाजपेयी की मृत्यु के बाद उनके समर्थक और विरोधी उन्हें कृतज्ञता से याद कर रहे हैं.

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अगर आप सोच रहे हों कि अटल बिहारी संत थे और उनके कार्यकाल में खग-मृग और मधुकर श्रेणी ख़ुशियाँ मनाते थे, तो ये ग़लत होगा. ऑस्ट्रेलिया से आए ईसाई प्रचारक ग्राहम स्टेंस और उनके दो बच्चों को वाजपेयी के दौर में ही हिंदुत्ववादियों ने ज़िंदा जला दिया था, झारखंड से लेकर झाबुआ तक ईसाई चर्चों पर हमले किए गए, आउटलुक पत्रिका ने जब प्रधानमंत्री दफ़्तर और वाजपेयी के दामाद रंजन भट्टाचार्य पर सवाल उठाए तो पत्रिका के मालिकों पर इनकम टैक्स के छापे मारे गए.

तलहका के स्टिंग ऑपरेशन के बाद उसके संपादकों को नाकों चने चबवा दिए गए. इफ़्तेख़ार गिलानी और राजेश बादल जैसे पत्रकारों को वाजपेयी के दौर में ही जेल में डाला गया, क्योंकि इनकी पत्रकारिता वाजपेयी और उनके समर्थकों को रास नहीं आई.

मोदी को ज़रूर ख़याल आता होगा कि इन सबके बावजूद वाजपेयी में ऐसा क्या था कि मित्र और विरोधी दोनों उन्हें सदायश और डेमोक्रेट मान रहे हैं?

वाजपेयी के गुण और प्रधानमंत्री मोदी के गुण

ग़ौर कीजिए कि जब जब वाजपेयी को उनकी सदाशयता, विनोदप्रियता, विरोधी विचारों को सहने और आदर देने की उनकी प्रवृत्ति की तारीफ़ होती है, तब तब लगभग अनायास ही उनकी तुलना मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ हो जाती है. मोदी के लिए सीधे कुछ कहा नहीं जा रहा है, लेकिन पृष्ठभूमि में ये सवाल बार बार सिर उठा रहा है कि जिन गुणों के लिए अटल बिहारी वाजपेयी को सराहा जाता रहा है क्या मौजूदा प्रधानमंत्री को उन गुणों के लिए जाना जाता है?

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वाजपेयी अपने विरोधियों को गले लगाते थे. वो पंडित जवाहरलाल नेहरू के बड़े प्रशंसक थे. वो समाज में सबको साथ लेकर चलने के हामी थे. उनके लिए राजनीति में कोई ऐसा दुश्मन नहीं था जिसका वो सर्वनाश चाहते हों.

इन सभी वाक्यों को ग़ौर से पढ़िए तो उसके विलोम की ख़ामोश ध्वनियाँ आपको अपने कानों में गूँजती महसूस होगी. और वो सभी ध्वनियाँ मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए हैं.

अटल बिहारी वाजपेयी को जिन जिन चीज़ों के लिए याद किया जाएगा, नरेंद्र मोदी को ठीक उन्हीं चीज़ों के विरोधी के तौर पर याद किया जाएगा. क्योंकि मोदी ने राजनीति के महल में क़दम रखते ही त्यौरियाँ चढ़ा लीं थीं. अगर अटल बिहरी वाजपेयी संकटकाल में मदद करने वाले पुराने परदे के धुँधले हनुमान थे तो नरेंद्र मोदी दिल्ली की कारों के पीछे त्यौरियाँ चढ़ाएँ, तीखे तेवर दिखाने वाले भगवा रंग के ग़ुस्सैल हनुमान.

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मैंने लोकसभा में प्रधानमंत्री के तौर पर अटल बिहारी वाजपेयी के ठहाके सुने हैं और उनकी बातों पर पूरे सदन को ठहाके लगाते सुना है. जैसे, दोनों बाहें फैलाकर विपक्ष की नेता सोनिया गाँधी की ओर देखकर उनका ये कहना—अरे हम तो आपको भी, विपक्ष को भी गले लगाने को तैयार हैं. इसके मुक़ाबले पूरे देश ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राहुल गाँधी, सोनिया गाँधी, पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी पर तेज़ाबी प्रहार करते भी सुना है. राहुल गाँधी जब मोदी को गले लगाने उनके आसन पर गए तो मोदी की शुरुआती झुँझलाहट किसी से छिपी नहीं रही.

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नरेंद्र मोदी अपने भाषणों में कभी भी एक अरब बीस करोड़ लोगों को याद करना नहीं भूलते. सबका साथ, सबका विकास उनकी सरकार का सबसे महत्वपूर्ण नारा है. इसके बावजूद वो शायद इस देश के पहले प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने खुले मंच से कहा - अगर काँग्रेस मुसलमानों की पार्टी है तो उन्हें मुबारक हो, पर क्या वो मुसलमान महिलाओं की पार्टी भी है. मोदी से पहले ज़िम्मेदारी के पद पर आए किसी व्यक्ति ने इस तरह से मुसलमानों की नुमाइंदगी करने को पाप या अपराध की तरह चिन्हित नहीं किया था.

ऐसा नहीं है कि नरेंद्र मोदी को सदाशयता दिखाने के मौक़े नहीं मिले. उन्हें अटल बिहारी वाजपेयी से ज़्यादा मौक़े मिले. पर उन्होंने एक एक करके सब मौक़े गँवा दिए. वो चाहते तो करण थापर के इंटरव्यू से बिदक कर उठने की बजाए एक स्टेट्समैन की तरह मुश्किल सवालों का सामना करते और उन्हें अपना मुरीद बना लेते. वो चाहते तो सीधे सवाल करने वाले पत्रकारों को 'न्यूज़ ट्रेडर' कहकर बेइज़्ज़ती न करते. वो चाहते तो भारी बहुमत का आत्मविश्वास लिए पिछले चार साल में कम से कम चार बार आज़ाद प्रेस के सवालों का जवाब देते.

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वो चाहते तो पिछले लोकसभा चुनावों में मिली अपार सफलता के बाद अपनी संकीर्ण छवि को फिर से उसी तरह बदल सकते थे जिस तरह उन्होंने 2002 के मुस्लिम विरोधी दंगों के बाद विदेशी पीआर कंपनी की मदद से अपनी छवि बदली थी. वो चाहते तो उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी की विदाई के दिन थोड़ी सदाशयता दिखाते और अंसारी को उनका "दायरा" याद नहीं दिलाते.

गुजरात दंगों के बाद बनी छवि को बदलने और उससे बाहर निकलने के लिए उन्होंने अमरीका की पीआर कंपनी एपको वर्ल्डवाइड की सेवाएँ लीं और 'वाइब्रेंट गुजरात' के ज़रिए अपनी सांप्रदायिक संकीर्णता की छवि को विकासपुरुष की छवि में बदलने में कामयाबी हासिल की.

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काँग्रेस की अकर्मण्यता और भ्रष्टचार के कारण भारतीय जनता का जितना पुरज़ोर समर्थन मोदी को मिला उतना कभी अटल बिहारी वाजपेयी तक को नहीं मिला. मोदी चाहते तो इस पूँजी की ताक़त से देश की राजनीति और भारतीय समाज को ऐसे मुक़ाम पर ला सकते थे जहाँ मुसलमान को हिंदू से डर नहीं लगता, हिंदू किसी मुसलमान से आशंकित नहीं रहता, दलित को सवर्ण से डर नही लगता और व्यक्ति का धर्म या खान-पान नहीं बल्कि उसका नागरिक होना ही उसकी इज़्ज़त और सुरक्षा की गारंटी होता.

जहाँ लिंचिंग करने वालों के हौसले बुलंद नहीं होते, उन्हें क़ानून का ख़ौफ़ होता, जहाँ उमर ख़ालिद पर सरेआम हमला करने वालों को अपना वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डालने की हिम्मत नहीं होती. जहाँ अटल बिहारी वाजपेयी के अंतिम दर्शन करने आए 'शोकमग्न' कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश को पीटने को नहीं दौड़ते, जहाँ मोदी के मंत्री लिंचिंग के दोषी लोगों को फूलमालाएँ चढ़ाकर स्वागत नहीं करते.

नरेंद्र मोदी अगर आज हर तुलना में अटल बिहारी वाजपेयी से छोटे दिख रहे हैं तो इसके लिए कोई और नहीं बल्कि वो ख़ुद ज़िम्मेदार हैं.

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