नज़रिया: 'अहमद पटेल और मोतीलाल वोरा जैसों का चक्रव्यूह कैसे तोड़ पाएंगे राहुल गांधी'

  • 21 अगस्त 2018
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Image caption मोतीलाल वोरा, अशोक गहलोत, अहमद पटेल और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह

जवाहरलाल नेहरू के पसंदीदा कथनों में से एक था 'सातत्य के साथ परिवर्तन'. राहुल की कांग्रेस में इसका मतलब हो गया है निरंतरता के साथ निरंतरता और वो भी बिना किसी बदलाव के.

दिल्ली में 24 अकबर रोड के कांग्रेस मुख्यालय में जो ताज़ा बदलाव किए गए हैं, उसमें सोनिया गांधी के वफ़ादारों को ही अहम पद दिए गए हैं.

इसकी कोई दूसरी वजह नहीं कि क्यों अहमद पटेल को एआईसीसी (अखिल भारतीय कांग्रेस समिति) का कोषाध्यक्ष और 90 की अवस्था के क़रीब पहुंच चुके मोतीलाल वोरा को एआईसीसी के प्रशासनिक मामलों का महासचिव बनाया गया है.

ये दोनों ही पद कांग्रेस संगठन में बेहद महत्वपूर्ण हैं. परंपरा रही है कि एआईसीसी सचिवालय में गांधी परिवार (सोनिया, राहुल, प्रियंका) के बाद सबसे वरिष्ठ व्यक्ति ही कोषाध्यक्ष हुआ करता था.

अहमद पटेल का उदय

अहमद पटेल 1985 में राजीव गांधी के बाद के सभी कांग्रेस नेताओं के क़रीबी रहे हैं. तब उन्हें युवा प्रधानमंत्री का संसदीय सचिव नियुक्त किया गया था.

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Image caption अहमद पटेल

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उस दौर में राजीव गांधी प्रधानमंत्री कार्यालय में नौकरशाही के दबदबे को तोड़ना चाह रहे थे, लेकिन अरुण सिंह, ऑस्कर फ़र्नांडिस और अहमद पटेल की तिकड़ी का प्रयोग बुरी तरह असफल हो गया क्योंकि तीनों ही नेताओं को न तो कोई प्रशासनिक अनुभव था और न ही वो राजनीतिक कुशलता, जिससे वो ताक़तवर आईएएस लॉबी का मुक़ाबला कर सकते.

1991 में राजीव गांधी के निधन के बाद अहमद पटेल पार्टी में बड़े सियासी खिलाड़ी बने रहे.

राजीव गांधी के राजनीतिक उत्तराधिकारी पीवी नरसिम्हा राव ने अहमद पटेल को अपने और 10 जनपथ (सोनिया गांधी का आवास) के बीच एक पुल की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश की.

हालांकि इस प्रक्रिया में अहमद पटेल सोनिया गांधी के भरोसे के व्यक्ति बन गए.

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Image caption मीरा कुमार

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जब सीताराम केसरी नरसिम्हा राव के बाद पार्टी अध्यक्ष बने, तो अहमद पटेल को एआईसीसी का कोषाध्यक्ष बनाया गया.

वरिष्ठ कांग्रेस नेता शरद पवार जो एआईसीसी के संगठनात्मक चुनाव में केसरी को चुनौती देने का माद्दा रखते थे, वो केसरी के करीबियों को देख कर ये कहा करते थे - ''तीन मियां, एक मीरा'' (अहमद पटेल, ग़ुलाम नबी आज़ाद, तारिक़ अनवर और मीरा कुमार).

ये 1997 का दौर था, और आज 21 साल बाद भारत के इस पुराने राजनीतिक दल पर फिर से दो मियां (अहमद पटेल और ग़ुलाम नबी आज़ाद) दो अहम पदों पर काबिज हो गए हैं.

आज़ाद एआईसीसी महासचिव और राज्यसभा में नेता विपक्ष हैं जबकि पटेल कोषाध्यक्ष और मीरा ने पहले की तमाम वापसियों की तरह ही एक बार फिर कांग्रेस वर्किंग कमेटी में परमानेंट इन्वाइटी के रूप में वापसी की है.

69 साल के पटेल और 89 साल के वोरा दरअसल पार्टी में पीढ़ीगत बदलाव लाए जाने के तमाम तर्कों को धता बता रहे हैं.

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Image caption मल्लिकार्जुन खड़गे

कई कांग्रेस नेता ये सोच रहे थे कि वोरा को हार्दिक विदाई दे दी जाएगी और उनकी जगह कनिष्क सिंह, मिलिंद देवड़ा या फिर नई पीढ़ी के किसी और नेता को बिठाया जाएगा.

नई-नई गठित 23 सदस्यीय कांग्रेस वर्किंग कमेटी की औसत उम्र 69 साल है. लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे 75 पार के हो चले हैं.

बीजेपी की यंग ब्रिगेड

दूसरी तरफ़ बीजेपी के पार्टी पदाधिकारियों में शायद ही कोई 70 से ज़्यादा की उम्र का है.

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Image caption शशि थरूर

शशि थरूर पर चढ़ीं कांग्रेसी त्यौरियाँ

अमित शाह 53 साल के हैं जबकि पीयूष गोयल और निर्मला सीतारमण जैसे कई नेता अपेक्षाकृत युवा उम्र में ही केंद्रीय कैबिनेट में रेल, वित्त और रक्षा जैसा अहम मंत्रालय संभाल रहे हैं.

अगर भूपेंद्र यादव, कैलाश जोशी, स्मृति इरानी, धर्मेंद्र प्रधान, योगी आदित्यनाथ और दूसरे अन्य नेताओं को एक साथ देखें, तो बीजेपी के पास ऐसे युवा नेताओं की एक बड़ी जमात है जिनके पास सक्रिय राजनीतिक जीवन के दो और उससे भी ज़्यादा दशक हैं.

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Image caption निर्मला सीतारमण

एक भाषण से बीजेपी में उभरी थीं निर्मला

सोनिया काल के चर्चित चेहरों पर राहुल की ऐसी निर्भरता वाक़ई परेशान करनेवाली है क्योंकि उन्हें पार्टी के भीतर से मामूली या कहें न के बराबर कोई चुनौती देनेवाला है.

जयराम रमेश, शशि थरूर, पृथ्वीराज चौहान, सलमान ख़ुर्शीद, मनीष तिवारी, कपिल सिब्बल, भूपेंद्र सिंह हुड्डा और दूसरे अन्य नेताओं के रूप में कांग्रेस के पास अनुभवी प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है जो ज़िम्मेदारी वाले पदों को संभाल सकते हैं.

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Image caption पीयूष गोयल

और फिर तमाम ऐसे युवा नेता राज्यों में भी मौजूद हैं, जिन्हें चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं सौंपी जा सकती हैं, लेकिन राहुल शायद ही उन्हें तवज्जो देंगे.

शायद वो मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में चुनावी जीत का इंतज़ार कर रहे हैं ताकि उन्हें वह आत्मविश्वास हासिल हो जिससे वो पार्टी संगठन में बड़े बदलाव का कोई कठोर क़दम उठा सकें.

बहरहाल आज 24 अकबर रोड (कांग्रेस मुख्यालय) पर किसी शख़्स को व्यंग्य करते सुना गया, "न्यू सीपी (कांग्रेस प्रेसिडेंट) सेम एपी (अहमद पटेल)"

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