क्या एएमयू की मुस्लिम पहचान ख़त्म हो जाएगी?

  • 22 अगस्त 2018
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी यानी एएमयू बीते एक सदी से एक अग्रणी शैक्षिक संस्थान और मुसलमानों की संस्कृति और पहचान का एक अहम केंद्र रहा है. लेकिन भारत की केंद्र सरकार अब इस संस्थान की मुस्लिम पहचान को ख़त्म करना चाहती है.

केंद्र सरकार का कहना है कि यह धार्मिक अल्पसंख्यक संस्थान नहीं है. दलितों के राष्ट्रीय आयोग ने यूनिवर्सिटी से कहा है कि वह दूसरे विश्वविद्यालयों की तरह दलितों और जनजातीय छात्रों को यूनिवर्सिटी के दाख़िले में आरक्षण दे वरना इसकी फ़ंडिंग बंद की जाए.

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के प्रमुख राम शंकर कठेरिया का कहना है कि आज़ादी के बाद देश के संविधान के तहत तमाम शैक्षणिक संस्थानों में दलितों और आदिवासी छात्रों के लिए दाख़िलों में आरक्षण दिया गया लेकिन अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में इसका पालन नहीं हुआ.

कठेरिया कहते हैं, "मैंने शिक्षा मंत्रालय से पूछा, यूनिवर्सिटी ग्रांट कमिशन से पूछा, अल्पसंख्यक आयोग से पूछा. सभी का कहना है कि एएमयू अल्पसंख्यक संस्थान नहीं है. एएमयू के पास भी कोई क़ानूनी दस्तावेज़ नहीं है."

संविधान में अल्पसंख्यकों को अपने शिक्षण संस्थान स्थापित करने का ख़ास अधिकार दिया गया है. संविधान की धारा 31 के तहत इन संस्थानों के प्रबंधन और नियमों में सरकार दख़ल नहीं देती है.

Image caption रामशंकर कठेरिया का कहना एएमयू के पास क़ानूनी दस्तावेज़ नहीं

'14 हज़ार हिंदू छात्रों को मिले आरक्षण'

कठेरिया का कहना है, "सरकार सवा सौ करोड़ रुपए अलीगढ़ यूनिवर्सिटी पर ख़र्च करती है. 30 हज़ार बच्चे पढ़ते हैं, इसमें छह हज़ार दलित-जनजातीय और आठ हज़ार छात्र पिछड़े वर्ग से हैं. एएमयू में 14 हज़ार हिंदू छात्रों को आरक्षण मिलना चाहिए."

एएमयू के प्रवक्ता डॉक्टर शाफ़े क़िदवई का कहना है कि यूनिवर्सिटी की स्थापना से यह मुसलमानों का एक अल्पसंख्यक संस्थान है. लेकिन यहां किसी के लिए आरक्षण नहीं है. दाख़िलों में 50 फ़ीसदी जगहें उन छात्रों के लिए रखी गई हैं, जिन्होंने अलीगढ़ के स्कूलों से 12वीं क्लास पास की है. चाहे वह किसी भी धर्म या वर्ग के हों. बाक़ी 50 फ़ीसदी सीटें बाहर के छात्रों के लिए खुली हुई हैं."

सर सैयद अहमद ख़ान के एंगलो-मोहम्डन ओरिएंटल कॉलेज को जब 1920 में आधिकारिक तौर पर यूनिवर्सिटी में तब्दील किया गया, उस वक़्त मुसलमानों ने इसके लिए 35 लाख रुपए जमा किए थे. 1981 में संसद में एक एक्ट मंज़ूर हुआ था, जिसके आधार पर यह व्याख्या की गई कि एएमयू को संवैधानिक तौर पर अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा मिल गया है.

2004 में मनमोहन सिंह की सरकार की ओर से एक पत्र में कहा गया कि यह अल्पसंख्यक संस्थान है, इसलिए वह अपनी दाख़िला नीति में परिवर्तन कर सकता है लेकिन सरकार के इस फ़ैसले को अदालत में चुनौती दी गई और अदालत ने अल्पसंख्यक दर्जे को ग़ैर-संवैधानिक क़रार दिया. ये मामला अब सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने अदालत में एक बयान दाख़िल किया है जिसमें कहा गया है कि वह मुस्लिम यूनिवर्सिटी को अल्पसंख्यक संस्थान नहीं मानती.

Image caption शाफ़े क़िदवई का कहना है कि एएमयू को शुरुआत से अल्पसंख्यक संस्थान दर्जा प्राप्त है

'हिंदुस्तान के मुसलमानों की इच्छाओं का केंद्र'

यूनिवर्सिटी के प्रवक्ता शाफ़े क़िदवई ने बीबीसी से कहा, "हमारे पास सारे दस्तावेज़ हैं. हमें उम्मीद है कि न्यायपालिका हमारे केस को समझेगी और इसे एक अल्पसंख्यक संस्थान स्वीकार करेगी. सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि आप अपनी पुरानी दाख़िला प्रणाली अपनाएं. जब तक फ़ैसला नहीं हो जाता तब तक ये नीति जारी रहेगी. न तो हम किसी को आरक्षण दे सकते हैं और न ही किसी का ख़त्म कर सकते हैं."

अगस्त की शुरुआत में दिल्ली में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने यूनिवर्सिटी के कुलपति और शिक्षा मंत्रालय के उच्च अधिकारियों के साथ एक बैठक की थी. आयोग ने कहा है कि अगर यूनिवर्सिटी ने हिंदुओं को आरक्षण देने के बारे में कोई फ़ैसला नहीं किया, तो वह इस महीने के आख़िर तक सुप्रीम कोर्ट में जाएंगे.

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की पहचान सिर्फ़ मुसलमानों की नहीं है. धर्मनिरपेक्ष और उदारवाद मूल्यों को बढ़ावा देने में इसकी अहम भूमिका रही है. प्रोफ़ेसर शाफ़े कहते हैं, "ये हिंदुस्तान के मुसलमानों की इच्छाओं का केंद्र है."

लेकिन इच्छाओं का ये केंद्र इस वक़्त बड़े दबाव में है. अंग्रेज़ी विभाग के प्रोफ़ेसर डॉक्टर मोहम्मद आसिम सिद्दीक़ी कहते हैं, "एएमयू को देखें, इसका किरदार देखें यहां जो छात्र पढ़ रहे हैं उनका संयोजन देखें, उनका बैकग्राउंड देखें तो यहां हर जाति, हर धर्म, हर वर्ग, हर इलाक़े और हर राज्य का छात्र पढ़ता है और हम एकता के साथ रहते हैं. ये छात्र देश के निर्माण और विकास में अपनी भूमिका अदा कर रहे हैं."

राजनीतिक शास्त्र विभाग की प्रोफ़ेसर निगार ज़बेरी का ख़याल है कि जब जनता की तवज्जो किसी अहम मसले से बंटाने की होती है तो अल्पसंख्यक भूमिका जैसे सवाल को उछाल दिया जाता है.

वह कहती हैं, "बार-बार इस तरह के सवालों को उछालकर असल मसले को पीछे धकेल दिया जाता है. इससे ऊपर उठने की ज़रूरत है."

Image caption शाहिद सिद्दीक़ी का कहना है कि एएमयू पर कांग्रेस ने भी राजनीति की

'गोरक्षा और लव जिहाद जैसा आंदोलन'

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व प्रमुख और पूर्व सांसद शाहिद सिद्दीक़ी का कहना है कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की अल्पसंख्यक स्थिति पर राजनीति कांग्रेस ने भी की है और बीजेपी ने भी.

वह कहते हैं, "मोदी सरकार एएमयू की अल्पसंख्यक स्थिति ख़त्म करके हिंदुओं को ये बताने की कोशिश करेगी कि कांग्रेस ने जो मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति अपनाकर रखी थी वह उसने ख़त्म कर दी है. ये दरअसल हिंदुत्व की नीति का हिस्सा है. ये बिलकुल गोरक्षा और लव जिहाद जैसे आंदोलन है."

शाहिद सिद्दीक़ी कहते हैं कि अगर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की अल्पसंख्यक स्थिति ख़त्म कर दी गई तो इसका मुसलमानों पर ज़बरदस्त शैक्षिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव होगा.

वह कहते हैं, "अलीगढ़ और जामिया मिल्लिया इस्लामिया दो ऐसे संस्थान हैं, जो मुसलमानों के लिए शिक्षा की खिड़की का काम कर रहे हैं. उच्च शिक्षा और प्रतियोगी परिक्षाओं में मुसलमान सबसे पीछे हैं. अगर एएमयू को ले लिया गया तो शिक्षा के हिसाब से मुसलमानों को ज़बरदस्त नुक़सान पहुंचेगा. ये बहुत बड़ा धक्का होगा लेकिन इससे फ़ायदा भी हो सकता है. मुसलमानों को ये अहसास होगा कि उन्हें शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं में रहने के लिए और भी कड़ी मेहनत करने होगी."

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी एक शैक्षिक संस्थान ही नहीं, बल्कि मुसलमानों की पहचान का एक अहम प्रतीक है. अपने अस्तित्व के सौ बरस में ये अक्सर राजनीति के घेरे में रही है. पूर्व की सरकारें इसे एक अल्पसंख्यक संस्थान मानती आई हैं.

स्वतंत्रता के बाद मोदी सरकार पहली केंद्र सरकार है, जिसने मुस्लिम यूनिवर्सिटी को मुसलमानों का अल्पसंख्यक संस्थान मानने से इनकार कर दिया है. आने वाले दिनों में एएमयू की मुस्लिम पहचान शायद उसके संस्थापक की तरह इतिहास के पन्नों में कहीं गुम न हो जाए.

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