नेहरू और शास्त्री का कौन सा चेहरा जानते थे कुलदीप नैयर

  • रेहान फ़ज़ल
  • बीबीसी संवाददाता
कुलदीप नैयर

कुलदीप नैयर भारत के उन गिने चुने अख़बारनवीसों में से थे, जिन्होंने अपनी आँख के सामने आधुनिक भारत के इतिहास को बनते देखा था.

चाहे भारत का विभाजन हो, महात्मा गाँधी की हत्या हो, चीन का आक्रमण हो, पाकिस्तान के साथ युद्ध हो, ताशकंद समझौता हो, आपातकाल की घोषणा हो या फिर 1984 का ऑपरेशन ब्लूस्टार हो, कुलदीप नैयर इन घटनाओं के चश्मदीद गवाह रहे.

कुलदीप नैयर का जन्म 14 अगस्त 1923 को स्यालकोट में हुआ था जो इस समय पाकिस्तान में हैं. स्यालकोट की मिट्टी ने और भी कई बड़ी विभूतियों को जन्म दिया है. मसलन महान शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, अल्लामा इकबाल, मशहूर पत्रकार ख़ालिद हसन और भारत के पूर्व कार्यवाहक प्रधानमंत्री गुलज़ारी लाल नंदा स्यालकोट में ही पैदा हुए थे.

1947 में जब भारत का विभाजन हुआ तो सेना के एक कर्नल ने उनके पिता से पेशकश की कि वो भारत जा रहे हैं और उनके लिए कुछ करना चाहते हैं. उनके पिता ने कहा कि वो उनके तीनों बेटों को अपने साथ भारत ले जाएं.

कर्नल ने कहा कि तीन बेटों को तो भारत ले जाना संभव नहीं है. हाँ वो उनके एक बेटे को ज़रूर अपने साथ भारत ले जा सकते हैं. उनके पिता ने चिटों पर अपने तीनों बेटों का नाम लिख कर लॉटरी निकाली. उसमें कुलदीप नैयर का नाम आया और वो उस कर्नल की जीप पर बैठ कर पहले लाहौर और फिर ट्रेन से अमृतसर पहुंचे.

गाँधी की हत्या का वो क्षण

क़ानून की डिग्री होने के बावजूद कुलदीप नैयर ने अपने करियर की शुरुआत एक पत्रकार के रूप में दिल्ली से छपने वाले एक उर्दू अख़बार 'अंजाम' से की. कुलदीप नैयर ने एक बार बीबीसी से बात करते हुए कहा था कि अपने करियर के शुरुआती दिनों में वो अपने दफ़्तर में बैठे हुए थे. अचानक वहाँ रखे टेलीप्रिंटर की घंटी बजी. और उस पर एक ख़बर फ़्लैश हुई, 'गांधी शॉट एट.'

"मैं तुरंत बिड़ला हाउस भागा. मेरा एक साथी मुझे अपनी मोटर साइकिल की पिछली सीट पर बैठा कर वहाँ छोड़ आया. जब मैं वहाँ पहुंचा तो पंडित नेहरू, सरदार पटेल और मौलाना आज़ाद वहाँ पहुंच चुके थे. मेरे सामने ही लार्ड माउंटबेटन वहाँ पहुंचे और उन्होंने गाँधी के पार्थिव शरीर को सेल्यूट किया. मुझे निजी तौर पर लगा कि मुल्क के सिर पर हाथ रखने वाला हमारे बीच से उठ गया."

इसके बाद कुलदीप नैयर प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी ) में सूचना अधिकारी बन गए और उनको तत्कालीन गृह मंत्री गोविंद वल्लभ पंत के साथ तैनात किया गया. कुलदीप का मानना था कि पंतजी बहुत बड़े आदमी थे और उनका मानवीय पक्ष बहुत मज़बूत था. जब मुझे काम करते हुए बहुत देर हो जाती थी तो हमेशा कहते थे कि मेरी कार तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ आएगी. दिन में भी वो अक्सर पूछते थे कि तमने खाना खाया या नहीं?

लालबहादुर शास्त्री के प्रेस अधिकारी

गोविंद वल्लभ पंत के बाद जब लाल बहादुर शास्त्री गृह मंत्री बने तो उन्होंने उनका सारा स्टाफ़ बदल डाला सिवाए उनके ड्राइवर और प्रेस ऑफ़िसर कुलदीप नैयर के. कुलदीप का मानना था कि शास्त्री जैसे सादा शख़्स न तो उस समय भारतीय राजनीति में थे और न ही आज हैं.

उनकी सादगी का उदाहरण देते हुए कुलदीप नैयर ने बताया था, "एक बार मैं शास्त्रीजी के साथ उनकी कार में कुतुब मीनार से वापस लौट रहा था. जहाँ आज कल 'एम्स' है, उस ज़माने में वहाँ रेल का फाटक हुआ करता था. वो उस समय बंद था. उस समय उन्होंने देखा कि एक आदमी वहाँ गन्ने का रस बेच रहा है. उन्होंने मुझसे पूछा नैयर साहब गन्ने का रस पिएंगे? मेरे हाँ कहने पर वो खुद चलकर उनके पास गए और उन्होंने सड़क पर खड़े हो कर गन्ने का रस पिया.'

अँधेरे कमरे में शास्त्री

शास्त्री के देहांत के बाद जब कुलदीप नैयर दिल्ली वापस लौटे तो कांग्रेस अध्यक्ष कामराज ने उनसे पूछा कि शास्त्री के परिवार वालों का ख़र्चा कैसे चलेगा? कुलदीप ने उन्हें बताया कि शास्त्री का बैंक बैलेंस नहीं के बराबर है और उनके परिवार के लिए अपना ख़र्च चला पाना मुश्किल होगा. तब कामराज संसद में एक बिल लाए, जिसमें व्यवस्था थी कि दिवंगत प्रधानमंत्री की पत्नी को कुछ भत्ता और रहने के लिए घर दिया जाए.

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कुलदीप नैयर बीबीसी संवाददाता रेहान फ़ज़ल के साथ

शास्त्री की सादगी का एक ऐसा क़िस्सा कुलदीप नैयर ने सुनाया था, "जब कामराज योजना के तहत लाल बहादुर शास्त्री मंत्री नहीं रहे तो मैं एक बार उनके घर गया. पूरे घर में अंधेरा फैला हुआ था और शास्त्रीजी एक कमरे में बैठे हुए थे. मैंने उनसे पूछा कि आपने सारे घर में अंधेरा क्यों कर रखा है? उनका जवाब था, अब तो मैं मंत्री नहीं रहा. बिजली का बिल तो मुझे ही भरना पड़ेगा. मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं कि मैं बिजली का बिल भर पाउं."

"तभी शास्त्रीजी ने एक बात और कही कि दाल और सब्ज़ियों के दाम भी आसमान छू रहे हैं. अब हम दिन के खाने में सिर्फ़ एक दाल और एक सब्ज़ी ही खाते हैं. उस ज़माने में शास्त्री को सांसद के तौर पर 500 रुपए मिलते थे. मैंने उनको सलाह दी कि आप कुछ पैसे कमाने के लिए अख़बारों में लिखना शुरू कर दीजिए. मैंने उनके लिखे लेख अमृत बाज़ार पत्रिका, हिंदू और हिंदुस्तान टाइम्स में छपने के लिए भेजे जिसे उन्होंने ख़ुशी ख़ुशी छापा और उन्होंने उनको उसका पारिश्रमिक भी दिया."

जब नेहरू ने बहन का कर्ज़ किश्तों में चुकाया

जवाहरलाल नेहरू कुलदीप नैयर के हीरो हुआ करते थे. उनके साथ भी उन्हें काम करने का मौका मिला था. सार्वजनिक जीवन में नेहरू की पारदर्शिता का बहुत ही मार्मिक किस्सा कुलदीप नैयर ने मुझे सुनाया था.

नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित एक बार शिमला के राजभवन में जा कर रुकीं, लेकिन उन्होंने उसका बिल नहीं चुकाया. करीब ढाई हज़ार रुपए का बिल आया. पंजाब के मुख्यमंत्री भीमसेन सच्चर ने नेहरू को पत्र लिख कर पूछा कि इस बिल का क्या किया जाए?

नेहरू ने फ़ौरन जवाब लिखा, 'भीमसेन मैं एक मुश्त में ढाई हज़ार रुपए तो नहीं भेज सकता. मैं पाँच किश्तों में हर महीने 500 रुपए पंजाब सरकार को चुका दूंगा.' कुलदीप ने बताया कि वो इस बात के गवाह हैं कि नेहरू ने ऐसा ही किया.

नूरजहाँ से मुलाक़ात

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कुलदीप नैयर बीबीसी संवाददाता मोहन लाल शर्मा के साथ

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बात सरहद पार

दो देश,दो शख़्सियतें और ढेर सारी बातें. आज़ादी और बँटवारे के 75 साल. सीमा पार संवाद.

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71 वर्ष के अपने पत्रकार जीवन में कुलदीप नैयर ने काफ़ी नाम कमाया. वो स्टेट्समैन अख़बार के दिल्ली संस्करण के संपादक भी रहे. आपातकाल के दौरान उनको गिरफ़्तार भी किया किया. वैसे तो उन्होंने कई किताबें लिखीं, लेकिन इमरजेंसी के ऊपर लिख गई उनकी किताब 'द जजमेंट' ख़ासी चर्चित रही.

उन्हें राज्यसभा का संसद भी मनोनीत किया गया और वो ब्रिटेन में भारत के उच्चायुक्त भी बनाए गए. कुलदीप नैयर को संगीत का बहुत शौक था. दिल्ली में हो रहे हर संगीत कॉन्सर्ट में कुलदीप नैयर को देखा जा सकता था.

एक बार वो मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ से लाहौर में मिले थे. बीबीसी को वो किस्सा सुनाते हुए कुलदीप नैय्यर ने बताया था, "शिमला समझौते से पहले मैं भुट्टो साहब से मिलने पाकिस्तान गया था. जब मैं लाहौर पहुंचा तो शाम को वहाँ के जनसंपर्क वालों ने मुझसे पूछा कि हम आपकी क्या ख़ातिर कर सकते हैं? मैंने कहा कि मैं मशहूर गायिका नूरजहाँ से मिलना चाहता हूँ. वो लोग मुझे उनके मॉडल टाउन वाले स्टूडियो में ले गए. मैंने उनको अदाब किया और ऐसे ही पूछ डाला आपके अब तक कितने रिकार्ड आए होंगे. नूरजहाँ ने हंसते हुए जवाब दिया, नैयर साहब न तो रिकार्डों का शुमार है और न ही गुनाहों का. ये तो आप लोग माफ़ कर देगें और वो अल्लाह मियाँ माफ़ कर देगा."

हुसैन की पेंटिंग न ख़रीद पाने का मलाल

कुलदीप नैयर को बड़े-बड़े कलाकारों की पेंटिंग जमा करने का शौक भी था. कुलदीप ने बताया था, 'उस ज़माने में एमएफ़ हुसैन साइकिल के कैरियर पर रख कर अपनी पेंटिंग बेचने निकलते थे और उनका पेंटिंग का दाम 50-100 रुपए से ज़्यादा नहीं होता था. मेरे पास उतने पैसे भी नहीं होते थे, इसलिए उनकी कोई पेंटिंग नहीं ख़रीद पाया. अब सोचता हूँ कि अगर कोई पेंटिंग ख़रीद लेता तो आज मालामाल हो जाता.'

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