भीमा कोरेगांव: पाँच मानवाधिकार कार्यकर्ता गिरफ़्तार, कई शहरों में छापे

हैदराबाद

भीमा कोरेगांव में हिंसा की जांच में जुटी पुणे पुलिस ने मंगलवार सुबह कई सामाजिक कार्यकर्ताओं के घरों पर छापे मारे हैं.

बीबीसी मराठी संवाददाता मयूरेश कुन्नूर से एक पुलिस अधिकारी ने कहा है कि छापे हैदराबाद, दिल्ली, मुंबई और रांची में मारे गए हैं.

पुणे पुलिस ने बीबीसी से कहा है कि इस मामले में अब तक हैदराबाद से वरवर राव, फ़रीदाबाद से सुधा भारद्वाज और दिल्ली से गौतम नवलखा को गिरफ़्तार किया गया है. इनके अलावा अरुण फ़रेरा और वरनॉन गोंज़ाल्विस को भी पुलिस ने गिरफ़्तार किया है.

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भीमा कोरेगांव हिंसा: पांच सामाजिक कार्यकर्ता ग़िरफ़्तार

पुणे पुलिस के ज्वांइट कमिश्नर ऑफ़ पुलिस (लॉ ऐंड ऑर्डर) शिवाजी बोडाखे ने बीबीसी संवाददाता विनीत खरे को बताया कि गिरफ़्तार लोग माओवादी गतिविधियों में संलिप्त हैं.

बोडाखे ने कहा, "ये लोग हिंसा को बौद्धिक रूप से पोषित करते हैं. अब अगला क़दम ट्रांज़िट रिमांड लेना है. हम अदालत में इनके ख़िलाफ़ सबूत पेश करेंगे. इन सभी लोगों को पुणे लाया जाएगा."

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि गौतम नवलखा को दिल्ली से बाहर नहीं ले जाया जा सकेगा.

हैदराबाद में गिरफ़्तार हुए कवि और वामपंथी बुद्धिजीवी वरवर राव की पत्नी हेमलता ने कहा पुलिस की रेड और अपने पति की गिरफ्तारी पर नाराज़गी जताते हुए कहा, "पुलिस ने हमारे साथ असभ्य व्यवहार किया है. पुलिस ने अपने सर्च ऑपरेशन में घर के किसी सामान को नहीं बख्शा. यहां तक की हमारी बेटी के घर पर भी रेड की गई है."

जांच से जुड़े एक पुलिस अधिकारी ने बीबीसी को बताया है कि मुंबई में वरनेन गोंज़ाल्विस और अरुण फ़रेरा के अलावा रांची में स्टेन स्वामी के घरों पर तलाशी ली गई है.

पुलिस सुधा भारद्वाज को हरियाणा स्थित सूरजकुंड पुलिस थाने में ले गई है.

सुधा भारद्वाज की बेटी अनुषा भारद्वाज ने बीबीसी को बताया है कि पुलिस ने उनके घर पर सुबह सात बजे रेड मारी और सुधा भारद्वाज का फ़ोन और लैपटॉप ज़ब्त कर लिया.

बाद में अदालत ने सुधा भारद्वाज ट्रांज़िट रिमांड की अर्ज़ी की सुनवाई 30 अगस्त को तय की.

सुधा भारद्वाज नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में एक गेस्ट फ़ैकल्टी के रूप में पढ़ा रही हैं.

क्यों हो रही हैं ये गिरफ़्तारियां?

पुणे के विश्रामबाग पुलिस स्टेशन में यलगार परिषद के ख़िलाफ़ कथित ग़ैर-क़ानूनी गतिविधियों को रोकने के लिए बनाए गए क़ानून के तहत एक एफ़आईआर दर्ज की गई थी.

परिषद की ये बैठक 31 दिसंबर, 2017 को आयोजित की गई थी.

पुलिस का दावा है कि पुणे में हुई इस यलगार परिषद में दिए गए भाषणों की वजह से अगले दिन बड़े स्तर पर हिंसा हुई.

पुलिस के मुताबिक़, बीते जून में गिरफ़्तार किए गए पांच सामाजिक कार्यकर्ताओं से पूछताछ के बाद पर ये नाम सामने आए हैं और इसी के आधार पर इनके घरों पर तलाशी अभियान जारी है.

इन गिरफ़्तारियां पर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने कड़ी प्रतिक्रियाएं दी हैं.

मशहूर लेखक अरुंधति रॉय ने बीबीसी तेलुगू सेवा से बात करते हुए कहा है, "सरेआम लोगों की हत्या करने वालों और लिंचिंग करने वालों की जगह वकीलों, कवियों, लेखकों, दलित अधिकारों के लिए लड़ने वालों और बुद्धिजीवियों के यहां छापेमारी की जा रही हैं. इससे पता चलता है कि भारत किस ओर जा रहा है. हत्यारों को सम्मानित किया जाएगा लेकिन न्याय और हिंदू बहुसंख्यकवाद के ख़िलाफ़ बोलने वालों को अपराधी बनाया जा रहा है. क्या ये आने वाले चुनावों की तैयारी है?"

कब और क्यों हुई भीमा कोरेगांव में हिंसा?

महाराष्ट्र में पुणे के नज़दीक कोरेगांव में इस साल भीमा कोरेगांव के 200 साल पूरे होने के ख़ुशी में दलितों ने एक कार्यक्रम आयोजित किया था.

इस मौके पर कई बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भाषण भी दिए थे और इसी दौरान अचानक हिंसा भड़क उठी थी. आगजनी और पत्थरबाजी शुरू हो गई थी. इस हिंसा में राहुल फंतागले नाम के एक युवक की मौत हो गई थी.

इसके बाद दलित संगठनों ने महाराष्ट्र की अलग-अलग जगहों पर विरोध प्रदर्शन किया था और महाराष्ट्र बंद का आह्वान किया था.

कहा जाता है कि भीमा कोरेगांव की लड़ाई एक जनवरी, 1818 को ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना और पेशवाओं के नेतृत्व वाली मराठा सेना के बीच हुई थी.

क्या है भीमा कोरेगांव का मामला?

दलित समुदाय भीमा कोरेगांव में हर साल बड़ी संख्या में जुटकर उन दलितों को श्रद्धांजलि देते हैं जिन्होंने 1817 में पेशवा की सेना के ख़िलाफ़ लड़ते हुए अपनी जान गँवाई थी.

ऐसा माना जाता है कि ब्रिटिश सेना में शामिल दलितों (महार) ने मराठों को नहीं बल्कि ब्राह्मणों (पेशवा) को हराया था. महार समुदाय के इन लोगों को अछूत माना जाता था. इस साल, इस उत्सव का आयोजन बड़े पैमाने पर किया गया क्योंकि यह युद्ध की 200वीं वर्षगांठ थी. दलित कार्यकर्ता इसे ब्राह्मणवाद पर विजय के तौर पर देखते हैं.

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