नज़रियाः राहुल गांधी की चुनौती जितनी संघ को, उतनी ही कांग्रेस को

  • 31 अगस्त 2018
राहुल गांधी इमेज कॉपीरइट Reuters

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को मुस्लिम ब्रदरहुड के साथ की गई अपनी तुलना सख्त नागवार गुजरी है. इस्लाम या मुसलमान से जुड़ी किसी भी वस्तु या अवधारणा का जिक्र अपने साथ करने का ख्याल भी संघ और उनके समर्थकों के लिए अकल्पनीय है.

इसलिए फौरन संघ और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने राहुल की भर्त्सना कहते हुए कहा कि राहुल चूँकि भारत को नहीं जानते, वो संघ को भी नहीं जान सकते.

राहुल गांधी की जो बात संघ को चुभ गई, वह कुछ यों थी: अरब में जो मुस्लिम ब्रदरहुड है, वही भारत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है. दोनों में समानता है, यह बताने के लिए राहुल गांधी ने तीन तथ्य रखे. दोनों पिछली सदी के तीसरे दशक में वजूद में आई, दोनों पर अपने देशों के राष्ट्रीय नेताओं की हत्या के बाद प्रतिबन्ध लगा और दोनों में ही औरतों का प्रवेश निषिद्ध है.

तुलना हमेशा सीमित होती है लेकिन वह इसलिए नहीं की जाती कि यह बताया जाए कि एक बिलकुल दूसरे की तरह है. दोनों का रुझान एक है या स्वभाव समान है, यह बताना ही तुलना का मकसद है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

क्या है मुस्लिम ब्रदरहुड

मुस्लिम ब्रदरहुड नाम से ही साफ़ है कि वह मुसलमानों के भाईचारे की बुनियाद पर टिका है और उसे मजबूत करना उसका मकसद है. इसके साथ ही इस्लाम को वह समाज और राज्य के संगठन की बुनियाद मानता है.

यही बात कुछ संघ के बारे में कही जा सकती है. वह हिन्दुओं के बीच बंधुत्व बढ़ाने और उनका संगठन मजबूत करने के उद्देश्य से गठित और परिचालित है. "संगठन में शक्ति है", यह संघ का प्रिय मंत्र है लेकिन इसमें जो अनकहा है, वह यह कि संगठन हिंदुओं का होना है.

अटल बिहारी वाजपेयी ने भी कहा था कि संघ हिन्दुओं को एकजुट करने का काम करता है. उनके मुताबिक़, "संघ के समक्ष दो काम हैं. एक हिन्दुओं को संगठित करना. एक मजबूत हिंदू समाज का निर्माण, सुगठित और जाति तथा अन्य कृत्रिम विभेदों से परे." क्या जातिविहीन, आत्मसम्मान युक्त समाज के गठन पर किसी को ऐतराज होना चाहिए?

अपना काम संघ अनेक संगठनों के जाल के जरिए करता है जो समाज के अलग-अलग तबकों में शिक्षा और सेवा के नाम पर सक्रिय हैं. यही मुस्लिम ब्रदरहुड भी करता है, शिक्षा, स्वास्थ्य और दूसरे कई क्षेत्रों में वह अनेक रूपों में सक्रिय है. हमास के काम का तरीका भी यही है और पाकिस्तान में जमात उल दावा भी इसी तरह काम करता है.

सारे संगठन जो किसी एक विचारधारा से परिचालित हैं, वे रूसो के इस सिद्धांत को जानते हैं कि ताकत के मुकाबले अधिक कारगर तरीका है लोगों की भावनाओं को अनुकूलित करके वर्चस्व स्थापित करना. ऐसा करके ये संगठन अपना एक व्यापक जनाधार बनाते हैं. वह उनके लिए खड़ा हो जाता है. मसलन हमास के चरमपंथी तरीकों के कारण उस पर जब भी फंदा कसेगा, उसके सामजिक कार्यों से लाभान्वित जनता उसके पक्ष में खड़ी हो जाएगी.

ब्रदरहुड हालाँकि पैदा मिस्र में हुआ लेकिन चूँकि इस्लाम दूसरे देशों में भी है, उसके प्रति आकर्षण तुर्की, ट्यूनीशिया,फिलस्तीन, कुवैत, जॉर्डन, बहरीन जैसे देशों में भी है और उसकी तरह के राजनीतिक दल वहाँ भी हैं.

इमेज कॉपीरइट rss.org

संघ की रणनीति आखिर है क्या?

संघ का दूसरा दायित्व उनके मुताबिक़ मुख्य रूप से अन्य धर्मावलम्बियों को मुख्य धारा में समाहित करना है. यह उन्हें संस्कार देकर किया जाना है.

संघ मुसलमानों और ईसाईयों को कैसे संस्कार देता है, या संस्कारित करता है, यह वे ही जानते हैं. पिछले चार सालों से जिस तरह उनका संस्कार किया जा रहा है, अगर वह जारी रहा तो राहुल गांधी की चेतावनी हकीकत में बदल जाएगी. यानी भारत पूरी तरह बदल जाएगा.

ब्रदरहुड और संघ में समानता का एक आधार पश्चिम में पैदा हुए विचारों से उनकी घृणा है. ब्रदरहुड उसे मुसलमानों को भ्रष्ट करने वाला मानता है. संघ भी शुद्ध भारतीय चिंतन और संस्कृति पर जोर देता है. पश्चिम की टेकनोलॉजी से इन दोनों को कोई परेशानी नहीं क्योंकि वह इन शुद्ध विचारों को प्रसारित करने का माध्यम भर है.

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
पीएम मोदी और राहुल गांधी से क्या चाहते हैं लोग?

राहुल गाँधी का यह आक्रामक और सीधा रुख संघ के लिए नया है. यह भी ध्यान दें कि आजतक किसी राजनेता ने संघ को सीधे चुनौती नहीं दी है. उसे किसी ने अभारतीय नहीं कहा है. किसी ने उसकी तुलना हिंसक संगठनों से नहीं की है.

इसीलिए वह राहुल के इस हमले से चौकन्ना हो गया है. भारतीय जनता पार्टी के विरोध या उसके नेताओं पर हमले से संघ को प्रायः कोई परेशानी नहीं रही है. लेकिन संघ की आलोचना से उसके कान खड़े हो जाते हैं.

इसका एक कारण यह है कि वह बहुत चर्चा में रहना शायद पसंद नहीं करता. उसका तरीका हर प्रकार के रडार के नीचे रह कर काम करने का है. अत्यधिक चर्चा से उसकी पड़ताल शुरू हो जाती है और उसकी रणनीतियों की बारीकी से जांच होने लगती है. संघ नहीं चाहता कि उसके सारे पक्ष प्रकाशित हों.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

संघ से सचेत करते इंदिरा की वो चिट्ठी

जवाहरलाल नेहरू के बाद राहुल पहले कांग्रेसी नेता हैं जो संघ को भारत के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बता रहे हैं. बीच में जनता पार्टी के सरकार के वक्त संघ की सदस्यता को जॉर्ज फर्नांडीस और उनेक दूसरे समाजवादी साथियों ने अस्वीकार्य बताया था और इसी के चलते जनता पार्टी टूट गई थी.

जन संघ जिसने खुद जो जनता पार्टी में विलीन कर दिया था, अलग हो गया क्योंकि उसकी पहली और अंतिम प्रतिबद्धता संघ से थी. बाद में वही भारतीय जनता पार्टी के नाम से अवतरित हुआ.

नेहरू संघ को भारत के विचार के लिए ख़तरा मानते थे. इसलिए संघ और जन संघ दोनों से वे लोगों को सावधान करते रहे. कांग्रेस में जो एक हिंदू मन पहले से सक्रिय था, जिसके प्रतिनिधि राजेंद्र प्रसाद, गोविंद वल्लभ पंत, सरदार पटेल, पुरुषोत्तम दास टंडन, रवि शंकर शुक्ल जैसे लोग थे. इन्हें संघ से विशेष परेशानी न थी.

5 दिसंबर, 1947 को लखनऊ से एक ख़त में इंदिरा गांधी संघ के बढ़ते प्रभाव के नेहरू को सावधान करते हुए लिखती हैं. जिसमें संघ की एक रैली का वे विस्तार से वर्णन करती हैं. वे जर्मनी के 'ब्राउन शर्ट' की लोकप्रियता का जिक्र करके कहती हैं, "जर्मनी का हालिया इतिहास हमारे इतना क़रीब है कि एक क्षण के लिए भी उसे भूलना कठिन है. क्या हम भारत के लिए उसी भाग्य को न्योता दे रहे हैं?"

इसके बाद इंदिरा यह कहती हैं कि "कांग्रेस का संगठन पहले ही इसके कब्जे में आ चुका है. ज़्यादातर कांग्रेसी ऐसी प्रवृत्तियों का समर्थन करते हैं. वाही हाल हर ओहदे पर बैठे सरकारी अधिकारियों का है."

इमेज कॉपीरइट Getty Images

भाजपा की वजाए संघ पर राहुल का निशाना क्यों?

1949 का इंदिरा का लखनऊ से लिखा ही एक दूसरा ख़त भी कांग्रेस में संघी मानसिकता से सावधान करता है. वे लिखती हैं, "सुनती हूँ कि टंडनजी हर वैसे शहर का नाम बदल देना चाहते हैं जिसके आख़िर में 'बाद' लगा है और उसकी जगह वे 'नगर' कर देना चाहते हैं. अगर इस किस्म की चीज़ें और होती रहीं तो लगता है मैं खुद को "ज़ोहरा बेगम' या ऐसा ही कुछ और कहलाना शुरू कर दूँगी."

बाद में खुद इंदिरा गाँधी में यह दृढ़ता कम होने लगी और वे हिंदू प्रतीकों से काम लेने लगीं. इसीलिए नेहरू और शुरुआती इंदिरा के बाद राहुल पहले नेता हैं जो संघ को भारत के लिए ख़तरनाक बताना अपनी राजनीति को स्पष्ट करने के लिए ज़रूरी मानते हैं.

राहुल ऐसा करके यह भी बता रहे हैं कि कांग्रेस सिर्फ़ सत्ता की नहीं, विचारों की लड़ाई लड़ रही है. ध्यान रहे वे भारतीय जनता पार्टी के बजाए हर जगह पहले संघ पर हमला कर रहे हैं. ऐसा करके वो यह भी साबित करना चाहते हैं कि दरअसल संघ एक राजनीतिक संगठन है. खुद को इस स्तर पर देखना संघ को पसंद नहीं क्योंकि वह खुद को राजनीति के ऊपर रखकर देखना चाहता है. वह एक तरह से खुद को कई राजनीतिक दलों में रक्त की तरह प्रवाहित मानता है.

राहुल गांधी ने यह कहा कि संघ भारत के हर संस्थान पर कब्ज़ा करना चाहता है. यह बात महत्त्वपूर्ण है क्योंकि अगर भारतीय राष्ट्र राज्य प्रत्येक सांस्थानिक तंत्र पर एक विचार का कब्जा हो जाएगा तो जनतंत्र की संभावना ही जाती रहेगी. इस पर ठहर कर किसी ने विचार नहीं किया है कि ऐसा होने के निहितार्थ समाज के लिए क्या हैं!

इमेज कॉपीरइट rss.org

यह सिर्फ संघ और ब्रदरहुड नहीं बल्कि कम्युनिस्ट पार्टियों का भी तरीका है जिसमें वे दूसरे विचारों के लिए कोई जगह नहीं छोड़ना चाहतीं.

संस्थाओं की स्वतंत्रता क्यों जनतंत्र और स्वस्थ समाज के लिए आवश्यक है, इस पर हमने सोचा नहीं इसलिए यह स्वाभाविक मानते हैं कि विश्वविद्यालयों के कुलपति या दूसरे निकायों के प्रमुख सत्ताधारी दल की विचारधारा के समर्थक हों, तो कोई हर्ज नहीं. राहुल एक नज़रअंदाज किए गए पक्ष पर रोशनी डालने की कोशिश कर रहे हैं.

कुछ वर्ष पहले जब राहुल गाँधी से पूछा गया था कि संघ की तरह ही अपने विचार के प्रचार के लिए कांग्रेस शिक्षा संस्थान क्यों नहीं चलाती तो उनका जवाब था कि स्कूल विचार के प्रचार का माध्यम नहीं होने चाहिए इसलिए स्कूल चलाना पार्टियों का काम नहीं हो सकता, यह शिक्षाविदों का काम है.

राहुल बार-बार इस भारत के मूल विचार के लिए संघर्ष बता रहे हैं. यह एक तरह से आज़ादी के बाद कांग्रेस के लिए पहला मौका है कि वह किसी विचार से खुद को जोड़ने की कोशिश कर रही है. विचार संघ के लिए, वामपंथियों के लिए तो स्वाभाविक है लेकिन कांग्रेस के लिए वह बिलकुल नई चीज़ है. खुद उन्हें भारत के उस विचार को खोजना होगा जिसकी विरासत का दावा राहुल कर रहे हैं.

इमेज कॉपीरइट RSS

संघ को चिढ़ानेवाली दूसरी बात है बार बार यह कहना कि ब्रदरहुड की तरह संघ में स्त्रियों का प्रवेश नहीं है. संघ इस पर कोई चर्चा नहीं चाहता लेकिन राहुल हर बार उस पर आक्रमण करते हुए यह कहना ज़रूरी समझते हैं, इस तरह वे बहुसंख्यकवादी विचारधारा के पितृसत्तावादी चरित्र को हमेशा सामने रखना चाहते हैं.

राहुल ने यूरोप के अपने दौरे में यह दुहराया कि पिछले चार सालों में उन्होंने महसूस किया कि भारत के सांस्थानिक चरित्र को आमूलचूल बदल देने की कोशिश की जा रही है और इससे वे अपने कर्तव्य के प्रति सचेत हुए. यह कर्तव्य भारत में समावेशिता की क्षमता बढ़ाने का है. ऐसा कहके राहुल खुद अपने मिशन को राजनीतिक मात्र तक सीमित रखने की जगह एक साभ्यतिक विचार का अभियान बता रहे हैं.

यह जितनी संघ को चुनौती है, उतनी ही कांग्रेस को भी. क्या वह फिर से अपने अस्तित्व के तर्क की खोज करगी? क्या वह दोबारा भारत की खोज करेगी?

(अपूर्वानंद दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के प्रोफेसर हैं, इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए