ब्लॉग: मोदी का और गांधी का राजधर्म अलग-अलग नहीं हो सकता

  • 29 अगस्त 2018
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राहुल गांधी ने कहा कि 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जो दंगे हुए उनमें 'कांग्रेस की कोई भूमिका नहीं थी'. कांग्रेस अध्यक्ष की इस मासूमियत पर उनकी अपनी पार्टी के लोगों को भी यक़ीन नहीं हुआ.

पंजाब के कांग्रेसी मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने शिरोमणि अकाली दल के हमलों से पार्टी का बचाव करने की जगह विधानसभा में चार कांग्रेसी नेताओं का नाम लेकर कहा कि वे दंगे भड़काने में आगे-आगे थे.

1984 के सिख विरोधी दंगों के बारे में जैसी सफ़ाई राहुल गांधी ने दी है अगर उसे मान लिया जाए तो हिंसा की किसी भी बड़ी घटना में किसी की कोई भूमिका नहीं होगी, क्या कोई पार्टी अपने लेटरहेड पर लिखकर लोगों को ज़िंदा जलाने के निर्देश कार्यकर्ताओं को देगी?

अगर कांग्रेस की भूमिका ही थी तो पार्टी ने माफ़ी क्यों माँगी थी, कुछ लोगों का तो मानना रहा है कि मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाने के पीछे सिखों को मनाने की सोच थी, राहुल के बयान ने किये कराये पर पानी फेर दिया है.

जब दंगे हुए थे, राहुल गांधी तब 14 साल के थे और उन्हें अपने पिताजी की ये बात शायद याद होगी जिन्होंने दंगों के बारे में कहा था, "जब भी कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती थोड़ी हिलती है." अगर याद न हो तो ये वीडियो देख सकते हैं.

राहुल के पिता राजीव गांधी का धरती हिलने वाला और नरेंद्र मोदी का क्रिया की प्रतिक्रिया वाला बयान, एक-दूसरे से बिल्कुल अलग नहीं है. गुजरात के दंगों को गोधरा में रेलगाड़ी में कारसेवकों की मौत की सहज प्रतिक्रिया साबित करने की कोशिश मोदी और बीजेपी ने संगठित तौर पर की थी.

इन दोनों में से किसी ने राजधर्म का पालन नहीं किया जिसकी सीख अटल बिहारी वाजपेयी ने 2002 के गुजरात दंगों के बाद नरेंद्र मोदी को दी थी. आप यहां देख सकते हैं.

वाजपेयी ने साफ़ शब्दों में समझाया था कि राजधर्म का पालन करने का अर्थ है कि जो सत्ता में बैठा है वह जनता के साथ जाति, धर्म या क्षेत्र के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा. न तो राजीव गांधी ने और न ही नरेंद्र मोदी ने समय पर हिंसा को रोकने की ईमानदार कोशिश की, या हिंसा करने वालों की खुलकर निंदा की.

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क्रिया-प्रतिक्रिया की ख़तरनाक थ्योरी

अगर क्रिया-प्रतिक्रिया की थ्योरी को मान लिया जाए तो सब कुछ न्यायोचित ठहराया जा सकता है.

ज़रा घटनाओं के सिलसिले पर नज़र डालिए-

भिंडरांवाले की क्रिया पर इंदिरा गांधी की प्रतिक्रिया थी ऑपरेशन ब्लू स्टार. ब्लू स्टार से नाराज़ सिखों की प्रतिक्रिया थी इंदिरा गांधी की हत्या. हत्या की प्रतिक्रिया में भीषण दंगे हुए, अब इन दंगों में मारे गए लोगों की प्रतिक्रिया के बारे में सोचिए, सोचिए यह कितनी ख़तरनाक थ्योरी है.

गुजरात के मुसलमानों और भारत भर के सिखों ने दंगे जैसी जघन्य क्रिया पर कोई प्रतिक्रिया नहीं की. उन्होंने इसे एक बुरा सपना समझकर भुला दिया. यही वजह है कि देश चल रहा है, वर्ना क्रिया-प्रतिक्रिया वालों का बस चले तो हिंसा-प्रतिहिंसा जारी रहेगी और दोनों पक्ष कहते रहेंगे कि वे तो प्रतिक्रिया कर रहे हैं जो जायज़ है.

राहुल गांधी ने जैसे कांग्रेस को 1984 के दंगों के कलंक से मुक्त किया है उस तरह तो इमरजेंसी का कलंक भी उन्हें धो लेना चाहिए और कहना चाहिए कि इंदिरा गांधी ने देशहित में इमरजेंसी लगाई थी और किसी के साथ कुछ बुरा नहीं किया गया था, अगर किया भी गया था तो उनकी दादी ज़िम्मेदार नहीं थीं.

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राहुल के बयान में संवेदनहीनता?

राहुल को शायद सोचना चाहिए था कि उनके इस बयान के बाद दंगा पीड़ितों के दिलों पर क्या गुज़रेगी? उनका ये कहना कि कांग्रेस की कोई भूमिका नहीं थी ऐसा ही है मानो लोगों में गु़स्सा था उन्होंने कुछ लोगों को मार दिया तो इसमें ऐसी कौन-सी बड़ी बात हो गई?

राजीव गांधी ने कहा था, "इंदिरा जी की हत्या के बाद देश में कुछ दंगे-फ़साद हुए, हमें मालूम है कि भारत की जनता के दिल में कितना क्रोध आया."

यह उनकी निजी क्षति थी कि उनकी मां की हत्या हुई, लेकिन उसके बाद जिन निर्दोष सिखों की हत्याएं हूईं और जिनकी संपत्ति लूटी गई उनके प्रति सहानुभूति का एक शब्द सुनने को नहीं मिला, न ही दुर्जनों या भगतों की कोई बुराई सुनाई दी. अब लंदन जाकर राहुल गांधी ने कहा है कि "यह त्रासदी थी, बहुत दुखद हिंसा थी." लेकिन वे अब भी कह रहे हैं कि उनकी पार्टी का इसमें कोई हाथ नहीं था.

अगर सिख विरोधी दंगों में कांग्रेस की भूमिका नहीं थी तो 11 अगस्त 2005 को संसद में तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने क्यों कहा था कि "इंदिरा गांधी की हत्या एक राष्ट्रीय त्रासदी थी. उसके बाद जो हुआ हमारा सिर शर्म से झुक गया."

डॉक्टर सिंह ने कहा, "मुझे सिख बिरादरी से माफ़ी मांगने में कोई संकोच नहीं है, मैं 1984 की घटना के लिए सिर्फ़ सिखों से नहीं पूरे देश से माफ़ी माँगता हूँ".

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मौक़ा चूक गए राहुल

यह राहुल के लिए मौक़ा था कि वे वंशवाद की राजनीति करने का आरोप लगाने वालों को चुप करा सकते, कह सकते कि ग़लती हुई थी, कांग्रेस के सभी लोग न सही, कुछ लोग दंगे भड़काने में शामिल थे, इस ऐतिहासिक भूल से हमने सबक ली है और ऐसा आगे नहीं होगा. लेकिन अपनी दादी और पिता के कांग्रेस को दोषमुक्त करके वे वंशवाद की राजनीति के आरोप की काट नहीं कर सकते.

नरेंद्र मोदी पर नफ़रत की राजनीति करने का आरोप लगाने वाले और ख़ुद को प्यार की राजनीति का नेता कहने वाले राहुल ने दंगा पीड़ित सिखों और करोड़ों न्यायप्रिय लोगों का प्यार पाने का एक मौक़ा खो दिया है. जो बहुसंख्यक वर्चस्व की राजनीति कर रहे हैं, पीड़ित भी हैं और दबंग भी उनसे माफ़ी या ग़लती स्वीकार करने की उम्मीद भी नहीं होनी चाहिए, न ही उनकी राजनीति के लिए ऐसा करना मुफ़ीद है.

राहुल गांधी अगर ख़ुद को मोदी के सामने प्रेम और शांति का दूत दिखाना चाहते हैं तो वे ऐसा करने का एक और मौक़ा चूक गए हैं.

हॉलोकास्ट डिनायल

किसी की तकलीफ़ को मानने से इनकार करना या जिसकी वजह से तकलीफ़ पहुँची उसे बरी कर देना भी एक तरह का गुनाह ही है.

जर्मनी में दूसरे महायुद्ध के दौर में यहूदियों का बड़े पैमाने पर जनसंहार हुआ था, इस भयावह ऐतिहासिक त्रासदी पर यूरोप के ज़्यादातर देशों में बहस तक की गुंजाइश नहीं है. सिख विरोधी दंगे और यहूदियों के जनसंहार की तुलना करने का कोई बहुत मतलब नहीं है, लेकिन इसे किसी समुदाय की पीड़ा के संदर्भ में समझा जाना चाहिए.

यूरोप के 15 से ज़्यादा देशों में यह कहना अपराध है कि यहूदियों के साथ ज़्यादती नहीं हुई या उन्हें नाज़ियों ने व्यवस्थित तरीके़ से बड़ी संख्या में नहीं मारा, इसे 'हॉलोकोस्ट डिनायल' कहते हैं यानी जनसंहार से इनकार करना.

ऐसा कहने वालों की कमी नहीं है कि यह क़ानून अपने आप में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सिद्धांत के ख़िलाफ़ है, लेकिन यूरोपीय देशों का मानना है कि त्रासदी की पीड़ा को नकारना एक तरह से नफ़रत फैलाना है.

राहुल गांधी को अपने जवाब के बारे में शायद और गहराई से सोचना चाहिए था.

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