वे लोग जिन पर 'फ़ेक न्यूज़' फैलाने और उनसे कमाई का आरोप है

  • 1 नवंबर 2018
आकाश सोनी
Image caption आकाश खुद को 'बाल स्वयंसेवक' बताते हैं जो चार साल की उम्र से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे हैं

भारत में आरोप लगे हैं कि फ़ेक न्यूज़ के कारण भीड़ की हिंसा और लिंचिंग के मामलों में लोगों की मौत हुई है.

ऐसे कौन से लोग हैं जो ऐसे ट्विटर हैंडल्स और फ़ेसबुक पन्ने या वेबसाइट्स चलाते हैं जिन पर फ़ेक न्यूज़ फैलाने के आरोप लगे हैं?

फ़ेक न्यूज़ के फैलने में व्हाट्स ऐप को ज़िम्मेदार माना जाता है जिसके भारत में 20 करोड़ से ज़्यादा सब्सक्राइबर हैं.

रिपोर्टों के मुताबिक साल 2018 में फ़ेक न्यूज़ के कारण 24 लोगों की मौत हुई है.

इसी विषय की जांच के लिए हम ग्वालियर पहुंचे.

शहर के मशहूर राम मंदिर के सामने शॉपिंग कॉम्प्लेस में आकाश सोनी का दफ़्तर है.

आकाश ख़ुद को 'बाल स्वयंसेवक' बताते हैं जो चार साल की उम्र से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे हैं.

पिछले "छह सालों से" आकाश सोनी 'बीजेपी ऑल इंडिया' नाम से एक फ़ेसबुक पेज चला रहे हैं.

इस पेज के क़रीब 12 लाख फ़ेसबुक लाइक्स हैं.

फ़ैक्ट-चेकर वेबसाइट 'ऑल्ट न्यूज़' ने 'बीजेपी ऑल इंडिया' फ़ेसुबक पन्ने को लगातार फ़ेक न्यूज़ फैलाने वाला बताया है.

'ऑल्ट न्यूज़' के मुताबिक पन्ने पर छपी एक तस्वीर में दावा किया गया कि पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री शाहिद ख़ाक़ान अब्बासी को अमरीका के एक हवाईअड्डे में जांच के दौरान कपड़े उतारने पड़े हैं. ये फ़ेक ख़बर थी.

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Image caption फ़ैक्ट-चेकर वेबसाइट 'ऑल्ट न्यूज़' ने 'बीजेपी ऑल इंडिया' फ़ेसुबक पन्ने को लगातार फ़ेक न्यूज़ फ़ैलाने वाला बताया है.

फ़ेक न्यूज़ के पीछे सोच क्या

ये ख़बरें क्यों छपीं, इस पर आकाश सोनी के अपने तर्क हैं. कभी वो पोस्ट में ग़लती की बात करते हैं, कभी कहते हैं कि ग़लत ख़बरें तो मीडिया के हर हिस्से में चलती हैं तो सिर्फ़ उन पर सवाल क्यों. वो ऑल्ट न्यूज़ की विश्वसनीयता और उसकी फ़ंडिंग पर सवाल उठाते हैं.

आकाश के अनुसार वो 'वी सपोर्ट अमित शाह', 'वंदे मातरम' और ख़ुद के नाम से भी फ़ेसबुक पन्ने चलाते हैं.

कई फ़ेसबुक ग्रुप्स के सदस्य आकाश ने बताया कि वो क़रीब 350 व्हाट्सऐप ग्रुप्स से जुड़े हैं जहां से उन्हें लगातार जानकारियां मिलती रहती हैं जिसे वो फ़ेसबुक पन्नों पर पोस्ट करते हैं.

आकाश बताते हैं कि इस फ़ेसबुक पन्ने ने उन्हें एक पहचान दी है और पेज पर समस्याओं के ज़िक्र भर से उसका हल निकल जाता है.

सीसीटीवी कैमरों से लैस आकाश सोनी के दफ़्तर में दरवाज़े के साथ स्वामी विवेकानंद की एक लंबी-सी तस्वीर लगी थी.

हाथ में दो मोबाइल, माथे पर टीका और कुर्ता पहने आकाश सोनी की कुर्सी और मेज़ के सामने सोफ़ा रखा है.

आकाश के मुताबिक इसी दफ़्तर में वो सुबह से देर रात तक विभिन्न फ़ेसबुक पन्नों के लिए सामग्री जुटाते हैं.

Image caption आकाश सोनी का फ़ोन

पेशेवराना तरीके से होता है काम

उनकी सोच किसी डिजिटल न्यूज़रूम में काम करने वाले प्रोफ़ेशनल जैसी है - सुबह क्या छपना चाहिए, दफ़्तर से पहले या बाद में लोग क्या पढ़ना चाहेंगे, दोपहर में लोग क्या देखना चाहेंगे, वो ये सब बातें ध्यान में रखकर फ़ेसबुक पोस्ट करते हैं.

एक सूत्र के मुताबिक गूगल ऐड्स के माध्यम से कई लोगों की मासिक कमाई लाखों में होती है, इसलिए ज़रूरी होता है कि लोगों को पन्नों पर आने और क्लिक करने के लिए प्रेरित किया जाए.

'बीजेपी ऑल इंडिया' पेज पर भाजपा और नरेंद्र मोदी के पक्ष में बातों के अलावा कोशिश है पेज पर आने वाले हर सब्स्क्राइबर के लिए कुछ न कुछ हो, जैसे राशिफल, स्वास्थ्य, खेल जगत, मनोरंजन के अलावा हिंदू धर्म से जुड़ी बातें.

आकाश सोनी कहते हैं, "मैं और मेरा एक मित्र राजेंद्र हर 40 मिनट में एक पोस्ट डालते हैं. अपना संदेश फैलाने के लिए बैनर होता है जो राजेंद्र और मैं बनाते हैं.... (पेज का) उद्देश्य युवा पीढ़ी को राष्ट्रवाद की तरफ़ मोड़ना है, भारतीय संस्कृति को लोगों तक पहुंचाना है."

आकाश बताते हैं कि उन्होंने साल 2011 से नरेंद्र मोदी को प्रमोट करना शुरू किया ताकि "देश और युवाओं की दिशा बदली जा सके."

वो कहते हैं, "हमें पता था कि इससे (फ़ेसबुक से) हम अपनी बात लोगों तक बिना काटे-पीटे, प्रभावी तरीके से पहुंचा सकते हैं. इलेक्ट्रॉनिक चैनल पर आपको इंतज़ार करना पड़ता है - छापें, दिखाएं या न दिखाएं, ये उन (पत्रकारों) पर निर्भर करता है."

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Image caption वेबसाइट पर एक पोस्ट है का उदाहरण है जिसका शीर्षक है 'कांग्रेस की रैली, पाकिस्तान का झंडा

कैसे होता है खेल

वेबसाइट पर एक पोस्ट है जिसका शीर्षक है 'कांग्रेस की रैली, पाकिस्तान का झंडा. इस पोस्ट में एक वीडियो है जिसमें एक रैली में इंडियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) का झंडा लहराता दिख रहा है, लेकिन आईयूएमएल के झंडे को पाकिस्तान का झंडा बताया गया है.

ऑल्ट न्यूज़ के मुताबिक इस पोस्ट को 3,600 बार शेयर किया गया.

ये वीडियो जिसमें झंडे को ग़लत तरीके से पेश किया गया, दूसरी वेबसाइट्स पर भी पोस्ट हुआ था.

ये ख़बर पेज पर कैसे आई?

आकाश कहते हैं, "वो एक वेबसाइट की ख़बर थी. वो हमारी पर्सनल ख़बर नहीं थी. वेबसाइट ने वो ख़बर डाली थी.

आकाश ने बताया कि उन्होंने वो 'खबर हटा ली थी' लेकिन जब हमने चेक किया तो वो पोस्ट वहां मौजूद था.

क्या पोस्ट लगाना एक ग़लती थी, इस पर आकाश कहते हैं, "कभी-कभी मिस्टेक हो जाती है… मिस्टेक तो सबसे होती है. बस यही है वो ग़लती मान ले कि हाँ हमसे ग़लती हुई है, यही हो सकता है."

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Image caption ऑल्ट न्यूज़ में एक अन्य पोस्ट की तस्वीर का जिक्र है जिसमें जवाहर लाल नेहरू महिलाओं से घिरे हुए नज़र आते हैं

नेहरू की वो तस्वीर

ऑल्ट न्यूज़ में एक अन्य पोस्ट की तस्वीर का जिक्र है जिसमें जवाहर लाल नेहरू महिलाओं से घिरे हुए नज़र आते हैं. इस फ़ोटो पर ऊपर और नीचे नेहरू के लिए भद्दी भाषा का प्रयोग किया गया है.

इस पोस्ट को तीन हज़ार से ज़्यादा बार शेयर किया गया.

तकनीकी जालसाज़ी से बनाई गई कई साल पुरानी इस तस्वीर को ऑल इंडिया बीजेपी ने फोटोशॉप नहीं किया.

फ़ैक्ट-चेक वेबसाइट बूमलाइव ने इसे फ़ोटो को झूठा बताया.

आकाश कहते हैं, "हो सकता है ये फ़ोटो एक बंदा और है, उसने डाली हो... एक हमारे साथ राजेंद्र जी हैं जो (पेज) साथ में चलाते हैं. पर हमें याद नहीं है कि हमने कोई ऐसी पोस्ट डाली है."

वो कहते हैं, "कोशिश हम ज़रूर करते हैं कि हमसे कोई ग़लत ख़बर पब्लिश न हो. आपने एक या दो पोस्ट देखी…. ग़लतियां सबसे होती हैं.... हम ग़लती मानते हैं कि हां हमसे ग़लती से पोस्ट हुआ है."

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Image caption पिछले साल नवंबर में ऑल्ट न्यूज़ ने 'कवरेज टाइम्स' को 'उभरती हुई फ़ेक न्यूज़ साइट' बताया था

दो बड़ी ख़बरें

आकाश सोनी सांप्रदायिकता फैलाने के आरोपों से इनकार करते हैं और कहते हैं कि उन्हें कोई "गाइडलाइन नहीं मिलती कि आपको (फ़ेसबुक पर) क्या डालना है."

वो कहते हैं, "हम अपने पेज के लिए स्वतंत्र हैं. हम (भाजपा के) कोई पेड कर्मचारी तो हैं नहीं. न हमारे पास आधिकारिक ज़िम्मेदारी है…. आज तक भाजपा की ओर से कोई गाइडलाइन नहीं मिली है कि आपको क्या डालना है…. ये बात कोई प्रूव भी नहीं कर सकता."

आकाश के मुताबिक पिछले सालों में दो कहानियों ने पेज को ज़बरदस्त पहुंच दी है - पहली ताजमहल का इतिहास जिसमें दावा किया गया था कि ताजमहल की जगह पहले एक मंदिर था, और दूसरी कहानी जिसमें दावा किया था कि कांग्रेस का चुनावी पंजे का निशान अनधिकृत है.

आकाश सोनी से हमारी बातचीत के बाद हमने पाया कि 'बीजेपी आल इंडिया' नाम से फ़ेसबुक पन्ने का नाम बदलकर 'आई सपोर्ट नरेंद्रभाई मोदी बीजेपी' कर दिया गया.

सैद्धांतिक विचारधारा और आर्थिक कारण आकाश सोनी जैसे लोगों को प्रेरणा देते हैं.

आकाश के मुताबिक उनका मक़सद है ऐसी ख़बरों को लोगों तक पहुंचाना जिसे मीडिया अनदेखा कर देता है, साथ ही मीडिया की मदद से लोगों की भलाई करना.

Image caption 'कवरेज टाइम्स' का दफ़्तर

आकाश सोनी के दफ़्तर से थोड़ी दूर एक बिल्डिंग के तीसरे माले पर 'कवरेज टाइम्स' का दफ़्तर है.

कवरेज टाइम्स का कारोबार

पिछले साल नवंबर में ऑल्ट न्यूज़ ने 'कवरेज टाइम्स' को 'उभरती हुई फ़ेक न्यूज़ साइट' बताया था जिसने बेहद कम समय में अपनी पहुंच बढ़ाई थी.

जब हम रविवार दोपहर बाद दफ़्तर पहुंचे तो वहां दो लोगों के अलावा कोई नहीं था.

वेबसाइट के 27 साल के 'एडिटर इन चीफ़' राजू शिकरवर के मुताबिक, "(वेबसाइट शुरू करने के) तीन महीने में हमारी वेबसाइट टॉप 10,000 में आ गई थी" और गूगल ऐड्स आदि से उनकी महीने की एक लाख रुपए तक की कमाई हो जाती थी.

Image caption राजू शिकरवर

और फिर वेबसाइट पर छपी ख़बरों के खिलाफ़ शिकायतें आनी शुरू हुईं जिससे वेबसाइट की रीच, शेयरिंग पर असर पड़ने लगा.

ऐसी ही एक स्टोरी बीबीसी की थी.

बीबीसी की बर्मा से रोहिंया समुदाय पर एक कहानी में एक रोहिंग्या लड़की को चंद लम्हों के लिए दिखाया गया.

रिपोर्ट में लड़की के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई थी, लेकिन कवरेज टाइम्स की वेबसाइट पर लिखा गया - "14 साल की रोहिंग्या लड़की जिसके पति के 18 बच्चे, क्या आप ऐसे शरणार्थी को भारत में बसाना चाहते हो."

ये एक फे़क न्यूज़ थी, और राजू इस बात को मानते हैं.

राजू के मुताबिक उनके पास आई कहानी से जुड़े डेटा के अनुसार "ये लड़की शादी-शुदा थी... इसके पति की और भी बीवियां थीं," हालांकि ये डेटा कहां से आया और अभी वो कहां है, इस बारे में कोई साफ़ जवाब नहीं मिला.

उन्होंने कहा कि उन्हें एक सूत्र से जानकारी मिली थी, लेकिन वो जानकारी सर्वर से डिलीट हो गई है.

राजू के मुताबिक उनका मक़सद है चरमपंथ, बांग्लादेश से अप्रवासन जैसे मुद्दों को सामने लाना जिन्हें लेकर हिंदुओं में चिंता है. वो कहते हैं कि मीडिया ऐसे विषयों पर बात नहीं करता.

राजू शिकरवर के अनुसार कहानी की 'ज़बरदस्त शिकायत' के बाद उसे वेबसाइट से हटा लिया गया, लेकिन वेबसाइट की पहुंच, लाइक्स, शेयर आदि का ख़ासा नुकसान हुआ.

वो कहते हैं वो किसी गुट से नहीं जुड़े हैं.

राजू कहते हैं, "कभी-कभी ऐसा होता है कि बाइचांस आपका डेटा फ़ेक चला जाए, क्योंकि आप उसे अच्छी तरह से पढ़ नहीं पाए हों या उसमें हेडिंग में कुछ ग़लती से हो जाए, नहीं तो जो भी डेटा जाता है वो सही जाता है."

Image caption 23 साल के अभिषेक मिश्रा 'वायरल इन इंडिया नेट` नाम की वेबसाइट चलाते हैं

पैसे कमाना मक़सद

वो कहते हैं, "ना ही मुझे किसी मुस्लिम से समस्या है, ना जो हमारे देश में रह रहे हैं उनसे समस्या है, आप रह रहे हैं रहो, अच्छे से रह रहे हो, हमें कोई समस्या नहीं है.... मान लो अगर आप एक देश में रह रहे हैं, तो हमारे देश में जो है उसे फ़ॉलो करना चाहिए, जैसे आपका बंदे मातरम है, राष्ट्र गान है, तो हमें उनका तो सम्मान करना चाहिए. हम जिस देश का खा रहे हैं उसका तो सम्मान करना बनता है, जायज़ है वो चीज़. अगर आप उसी चीज़ का विरोध करने लगें तो आप कहां इंडिया के रहे. आप तो नहीं हो न."

कवरेज टाइम्स से जुड़े रामनेंद्र सिंह के मुताबिक उनका मक़सद पैसे कमाना होता है, न कि खबर से "दंगे हो जाएं" ऐसी ख़बरें करना.

वो कहते है, "कभी-कभी हमें (पोस्ट की वास्तविकता के बारे में) पता नहीं चल पाता है. (जब) सवाल आते हैं तो (हम कहानी) हटा देते हैं" क्योकिं "आपत्तिजनक पोस्ट होने पर फ़ेसबुक पेज, पहुंच या पोस्ट ब्लॉक कर देता है."

वो पूछते हैं, "हम क्यों चाहेंगे कि हमारे बिज़नेस पर असर पड़े. .. हम एजेंडा लेकर काम नहीं कर रहे हैं. हमारा मक़सद फ़ेसबुक से पैसा कमाना है."

रामनेंद्र मानते हैं कि फ़ेसबुक की कड़ी नीतियों के कारण फ़ेक न्यूज़ पर लगाम लग रही है.

कांग्रेस समर्थक वेबसाइट

ग्वालियर से दूर भोपाल में 23 साल के अभिषेक मिश्रा वायरल इन इंडिया नेट नाम की वेबसाइट चलाते हैं.

वेबसाइट और उससे जुड़े फ़ेसबुक पन्ने पर आपको कांग्रेस नेताओं जैसे कमलनाथ के पक्ष में और नरेंद्र मोदी पर तंज़ कसते कई पोस्ट मिल जाएंगे.

Image caption 'वायरल इन इंडिया' का दफ़्तर

एलेक्सा पर भारत में वायरल इन इंडिया डॉट नेट की रैंकिंग 740 के आसपास है. वेबसाइट का क़रीब 90 प्रतिशत ट्रैफ़िक भारत से आता है, लेकिन सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और क़तर से भी लोग वेबसाइट पर आते हैं.

भोपाल के एक बेहद व्यस्त इलाके में क़रीब चार साल पुरानी इस वेबसाइट का कई मंज़िला दफ़्तर है, हालांकि इतनी जल्दी इतने बड़े दफ़्तर के पीछे की क्या फ़ंडिंग है, इस पर अभिषेक ने कहा 'इसके पीछे कोई राजनीतिक फ़ंडिंग नहीं बल्कि वेबसाइट से होने वाली आय है.'

वो कहते हैं, "हमारे कई कर्मचारी दिल से काम करते हैं, पैसा भी नहीं लेते हमसे…. हमारे यहां 45 से ज़्यादा लोग हैं, हमारे यहां राजनीतिक रूप से सारे न्यूट्रल लोग काम करते हैं, हम किसी राजनीतिक आदमी को नौकरी नहीं देते हैं."

सिविल इंजीनियर अभिषेक मिश्रा के अनुसार साल 2011 में जहां उनकी वेबसाइट की 50 मिलियन रीडरशिप थी, साल 2017 में ये साप्ताहिक आंकड़ा 141 मिलियन पहुंच गया, और एक वक्त 25 से 40 हज़ार लोग उनकी वेबसाइट पढ़ रहे होते हैं.

वेबसाइट की एक कहानी में एक कथित अमरीकी सर्वे में मनमोहन सिंह को दुनिया का सबसे ईमानदार व्यक्ति बताया गया.

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Image caption वेबसाइट की एक कहानी में एक कथित अमरीकी सर्वे में मनमोहन सिंह को दुनिया का सबसे ईमानदार व्यक्ति बताया गया

फ़ैक्टचेकर वेबसाइट ऑल्ट न्यूज़ ने इसे फ़ेक ख़बर बताया.

ख़बर सच होने का दावा

इस ख़बर पर ऑल्ट न्यूज़ ने लिखा, "ये वायरल मैसेज भाजपा समर्थकों के कई बार शेयर किए गए फ़ेक न्यूज़ पोस्टरों से मिलते हैं.... उसी तरह का रंग, फ़ॉण्ट... ऐसा लगता है कि कांग्रेस समर्थकों का मानना है कि आप हरा नहीं सकते तो हमारे साथ शामिल हो जाइए."

उधर अभिषेक मिश्रा का दावा है उनकी ख़बर बिल्कुल सही है.

वो कहते हैं, "आप ये साबित कर दो कि ये फ़ेक न्यूज़ है. कोई माई का लाल ये तो साबित कर दे कि ये फ़ेक न्यूज़ है... ऑल्ट न्यूज़ जैसे छुटपुट लोग कुछ भी डाल दें तो आप भरोसा करोगे? वो साबित करें कि ये फ़ेक है... आरोप तो कोई कुछ भी लगा देता है."

लेकिन ये जानकारी कहां से आई?

अभिषेक मिश्रा के मुताबिक, "जिन्होंने ये ख़बर बनाई है, उनकी जानकारी में ये ख़बर बिल्कुल सच है. मुझे नहीं मालूम कि हमारी टीम में से ये किसने बनाया है, लेकिन ये ख़बर बिल्कुल सही है…. मैं एडिटर इन चीफ़ हूं लेकिन न मैं ग्राफ़िक्स बनाता हूँ और न वो मेरे कंट्रोल में है, ये वो जानते हैं.... आरोप मैं लगा देता हूं कि ऑल्ट न्यूज़ ने जो ख़बर डाली वो फ़ेक है."

अभिषेक के मुताबिक चाहे गूगल या फ़ेसबुक, कोई भी फ़ेक न्यूज को नहीं रोक सकता.

वो कहते हैं, मीडिया ख़बर चलाता है कि विजय माल्या गिरफ़्तार हो गए, अगले दिन मीडिया उस ख़बर को हटा लेता है. कोई माफ़ी नहीं मांगता. चैनल कहते हैं कि 2000 रुपए के नोट में चिप थी. बाद में नोट आया तो पता चला कि उसमें कोई चिप नहीं थी. तो आप कभी भी फ़ेक न्यूज़ को नहीं रोक सकते."

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