नज़रिया: 'नक्सलवादी हौआ से फ़ायदा लेने की कोशिश में मोदी सरकार'

  • 29 अगस्त 2018
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Image caption गौतम नवलखा लंबे समय से रिसर्च पत्रिका ईपीडब्लयू के साथ जुड़े रहे हैं.

सात वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी और कुछ प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ताओं के घरों की तलाशी लिया जाना, भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं लगता.

चुनावी राजनीति में अपने ग्राफ़ को सुधारने के लिए मोदी सरकार अब एक गहरी माओवादी साज़िश से पैदा होने वाले डर का फ़ायदा उठाने की कोशिश कर रही है.

'अर्बन नक्सल' शब्द दरअसल सरकार की एक कल्पना का हिस्सा है.

नक्सलवाद को लेकर डर क्यों?

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मध्य भारत में सरकार के ख़िलाफ़ सशस्त्र आंदोलन चला रहे माओवादियों को नक्सलवादी कहा जाता है

संसाधनों के लिहाज़ से कमज़ोर माओवादी पीपल्स लिबरेशन आर्मी को अब मोदी और उनके कॉरपोरेट इंडिया के विज़न के लिए एक सबसे बड़े ख़तरे के रूप में पेश किया जा रहा है.

देश के दलित, आदिवासियों और वंचितों के बीच एक तरह के ग़ुस्से का भाव है, जिसकी वजह से पूरे राजनीतिक जगत में ऊंचे तबके के लोगों के बीच में एक तरह का डर पैदा हुआ है.

पिछड़ों में ग़ुस्सा

दलित समाज का युवा नेतृत्व अब नौकरियों और ज़मीन पर अपना अधिकार चाहता है और छिटपुट दिखने वाले सकारात्मक क़दमों से संतुष्ट नहीं है.

लेकिन मोदी सरकार के एजेंडे में ये मुद्दे शामिल नहीं हैं.

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जब बड़े उद्योग घराने ज़मीन हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं, तब भूमि सुधार की बात काफ़ी पुरानी है और नई नौकरियां पैदा करना उन सपनों का हिस्सा है, जो मोदी दिखाते हैं.

संविधान की 5वीं अनुसूची को लागू करने की मांग

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आदिवासी समाज भारतीय संविधान की पांचवी अनुसूची को लागू करने की मांग कर रहा है, जो इस समाज को आंतरिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है.

लेकिन अब तक इस अनुसूची को किसी राज्य में लागू नहीं किया गया है.

वन्य अधिकार और पंचायत (एक्सटेंशन टू शेड्यूल्ड एरियाज़) क़ानून 1996 को कमज़ोर बनाया जाना 21वीं शताब्दी के सबसे बड़ी भूमि लूट के रूप में सामने आ रहा है.

इस तरह की लूट उत्तरी अमरीकी महाद्वीप और ऑस्ट्रेलिया के उपनिवेशवाद के बाद से अब तक सामने नहीं आई है.

1933 में जर्मन साम्राज्य की प्रमुख इमारत रेग्सटाग में आग लगने के बाद हिटलर और गोएबल्स ने जर्मनी की जनता को डराने के लिए इस अग्निकांड का चतुराई से इस्तेमाल किया.

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इस तरह लोगों को डराकर वाइमर गणराज्य के संविधान के तहत उन्हें जो भी थोड़ा बहुत संरक्षण मिला था, उसे छोड़ देने के लिए मना लिया गया.

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नक्सलवादी हौआ यहां भी खड़ा कर दिया गया है, जिस तरह साल 1950 में अमरीकी सीनेटर ने 'रेड अंडर योर बेड' यानी आपके 'घर में छिपे साम्यवादी' का नारा देकर साम्यवादियों की निंदा की थी.

पाकिस्तान का चुनावी इस्तेमाल क्यों नहीं?

सामान्य स्थितियों में 'पाकिस्तान अंडर योर बेड' का नारा देकर डर पैदा किया जाना चाहिए.

लेकिन इस समय पाकिस्तान के मुद्दे को हवा देना इतना आसान नहीं है. पाकिस्तान में इस समय एक नई सरकार बनी है, जो भारत के साथ शांतिपूर्ण संबंधों को कायम करने से जुड़े संकेत दे रही है.

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ऐसे में मोदी सरकार ने वो करने की कोशिश की है, जो इंदिरा गांधी ने 1971 में पश्चिमी सीमा पर किया था.

कई लोग भारत के सर्जिकल स्ट्राइक को पाकिस्तानी तैयारी और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया को भांपने की कोशिश बताते हैं.

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अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विशेषकर अमरीका कश्मीर के मुद्दे पर किसी भी सैन्य कार्रवाई को आसानी से बर्दाश्त नहीं करेगा.

अफ़गानिस्तान में स्थिरता के लिए अमरीका को पाकिस्तान की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है.

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ईरान और सऊदी अरब के बीच तनाव चरम पर होने के स्थिति और राष्ट्रपति ट्रंप की तीखी बयानबाज़ी के बीच पेंटागन के अपेक्षाकृत ज़्यादा समझदार विश्लेषक ये जानते हैं कि अफ़गानिस्तान में तालिबान के साथ किसी भी समझौते के लिए ईरान और पाकिस्तान की अहम भूमिका है.

भारत में इस्लामिक आतंक का हौआ अब इतनी बड़ी चीज़ नहीं है, जिससे डर पैदा किया जा सके.

भारत में मुस्लिम युवाओं के पास आईएस के प्रभाव में आने के लिए ज़्यादा समय नहीं है.

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दलित समाज में उबलता ग़ुस्सा

हर ग्राउंड रिपोर्ट ये संकेत देती है इस्लामिक स्टेट भारत में कट्टर हिंदुत्व के उभार को तिरछी निगाहों से देखने वाले वर्गों के बीच राजनीतिक ग़ुस्से का इस्तेमाल करना चाहती है.

पिछली पीढ़ी की तरह उन्हें धर्म का बोझ नहीं उठाना है. इस पीढ़ी को मिली लुटी पिटी विरासत मिली है. उसे दूसरे वंचित समाजों के साथ खड़े होकर उस वर्ग से टक्कर लेनी जिसने अवैध ढंग से भारत की संपत्ति पर कब्जा जमा रखा है.

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शांति के साथ नेतृत्व परिवर्तन की स्थिति में हिंदुत्व कट्टरवादी सरकार को बड़ा नुकसान हो सकता है. इस सरकार ने अपने कॉरपोरेट दोस्तों की मदद करने के लिए हर सीमा पार कर दी है.

भीम आर्मी के प्रमुख दलित नेता चंद्रशेखर आज़ाद की तरह विरोध करने वाले किसी नागरिक को साल भर के लिए जेल में डाला जा सकता है.

इसके बाद जेल की इस अवधि को बढ़ाया भी जा सकता है. कश्मीर में दो साल की क़ैद दी जाती है जिसे लगातार आगे भी बढ़ाया जा सकता है.

भारत में इस समय हत्या करने के लिए गोली मारने की नीति अपनाई जा रही है, जैसा तमिलनाडु के तूतीकोरिन में दिखाई दिया था.

Image caption तमिलनाडु के तूतिकोरिन में वेदांता समूह की कंपनी स्टरलाइट के ख़िलाफ़ चल रहे विरोध प्रदर्शन में शामिल लोगों को रोकने के लिए पुलिस ने गोलियां चलाई थीं जिनमें 13 लोगों की मौत हुई थी.

सेना में अपनी सेवाएं दे रहे अधिकारी मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामलों में मुक्ति चाहते हैं जैसा सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका में सामने आया है.

इसके साथ ही 40 लाख लोगों पर राष्ट्रविहीन होने का ख़तरा मंडरा रहा है. भारत इस समय अपनी लोकतांत्रिक प्रगति के मामले में दोराहे पर है.

28 अगस्त, 1938 में ऑस्ट्रिया के मातासिन में प्रताड़ना शिविर खोला गया था.

इसी तारीख़ को साल 1963 में अमरीका में मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने नागरिक अधिकारों में सुधार के लिए अपना "आई हैव अ ड्रीम" भाषण दिया था.

भारत में इस समय दो विकल्प हैं. क्या हम ऑस्ट्रिया का रास्ता अपनाएंगे या मार्टिन लूथर किंग, कैनेडी और जॉनसन का, जिन्होंने अमरीका में सामाजिक शांति की राह दिखाई

(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है)

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