झटकों के बावजूद तेज़ी से क्यों बढ़ रही है अर्थव्यवस्था

  • 1 सितंबर 2018
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अप्रैल से जून तक की तिमाही में भारत के आर्थिक विकास की दर अनुमानों से कहीं बेहतर 8 प्रतिशत से ज़्यादा रही. उत्पादन बढ़ने और निर्माण क्षेत्र के विस्तार के कारण अर्थव्यवस्था को रफ़्तार मिली है.

शुक्रवार को जारी हुए आंकड़ों से नरेंद्र मोदी सरकार को राहत मिली है, जिसे नवंबर 2016 में की गई नोटबंदी और फिर जुलाई 2017 मे लागू किए जीएसटी के कारण कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा था.

इन क़दमों से एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का ग्रोथ रेट अस्थायी रूप से मंद पड़ गया था.

आधिकारिक आंकड़े दिखाते हैं कि जून में ख़त्म हुई तिमाही, जो कि भारतीय वित्त वर्ष की पहली तिमाही है, 8.2 प्रतिशत की दर से बढ़ी जबकि पिछली तिमाही में यह दर 7.7 प्रतिशत थी.

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भारतीय मुद्रा में 10 प्रतिशत की गिरावट से महंगाई दर में बढ़ोतरी के बावजूद यह सुधार देखने को मिला है. शुक्रवार को तो रुपये में रिकॉर्ड गिरावट दर्ज की गई थी.

जून में भारत का चालू खाता घाटा 16 अरब डॉलर तक पहुंच गया था जो कि पिछले पांच सालों में सबसे ज़्यादा है. 70 का आंकड़ा भारतीय मुद्रा के लिए मनोवैज्ञानिक आंकड़ा कहा जा रहा था, लेकिन उसके भी पार जाना चिंता का विषय है. भारत का चालू खाता घाटा जीडीपी का 2.5 फ़ीसदी हो गया है जो कि पिछले 6 सालों में सबसे ज़्यादा है.

शुक्रवार को जीडीपी के आंकड़े आए तो अटल की सरकार में वित्त मंत्री रहे यशवंत सिन्हा ने चुटकी लेते हुए ट्वीट किया, ''दिलचस्प. सब कुछ ऊपर जा रहा है. जीडीपी, डॉलर, बैंकों के एनपीए और तेल की क़ीमत.''

पी चिदंबरम ने ट्वीट किया, ''पहली तिमाही में 8.2 फ़ीसदी जीडीपी दर तो आंकड़ा है. सच तो यह है कि डॉलर की तुलना में रुपया 70 पार हो गया. दिल्ली में डीजल 70 पार और पेट्रोल 78 पार.''

क्यों धरे रह गए आकलन

थॉमसन रॉयटर्स का आकलन था कि अप्रैल-जून की तिमाही में दर 7.6% रह सकती है जबकि स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया ने 7.7 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया था.

अगले साल मई में आम चुनावों से पहले ग्रोथ रेट में बढ़ोतरी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए फ़ायदेमंद साबित हो सकता है.

ताज़ा आंकड़े रोज़गार सृजन को लेकर भी अच्छी ख़बर लाए हैं. प्रधानमंत्री के विरोधी उनकी सरकार पर लगातार इस बात को लेकर हमला बोलते रहे हैं कि वे बेरोज़गारी की समस्या को हल करने में नाकाम रहे हैं.

अप्रैल से जून में उत्पादन 13.5 प्रतिशत बढ़ा जो पिछले साल की इसी तिमाही की तुलना में 1.8 प्रतिशत कम है. मगर निर्माण में 8.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई है जो पिछले साल की इसी तिमाही से 1.8% अधिक है.

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अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इन दोनों सेक्टरों में अच्छी ग्रोथ होना रोज़गार पैदा करने में अहमियत रखता है.

120 करोड़ से ज़्यादा की आबादी वाले भारत में हर साल एक करोड़ 20 लाख लोग नौकरी की तलाश में उतरते हैं. वर्ल्ड बैंक के मुताबिक़ भारत को रोज़गार दर स्थिर रखनी है तो उसे हर साल 80 लाख नौकरियां पैदा करनी होंगी.

झटकों के बावजूद ग्रोथ अच्छी क्यों

पिछले साल अप्रैल-जून की तिमाही में आर्थिक विकास दर 5.6 प्रतिशत हो गई थी जो 2014 में मोदी सरकार बनने के बाद सबसे कम दर थी.

नोटबंदी के कारण 217 अरब डॉलर के नोट वापस ले लिए गए. यानी कैश पर निर्भर अर्थव्यवस्था से चलन में रही 86 प्रतिशत मुद्रा वापस ले ली गई थी.

इससे कारोबारी गतिविधियों पर असर पड़ा. इसके कुछ ही महीनों बाद गुड्स एंड सर्विसेज़ टैक्स लागू कर दिया गया, जिसे लेकर काफी हंगामा भी हुआ.

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Image caption बड़े नोटों को बंद करके नए नोट जारी किए गए. कैश की कमी से अर्थव्यवस्था को नुक़सान पहुंचा था.

कुछ विश्लेषकों का कहना है कि जीडीपी के ताज़ा आंकड़े दर्शाते हैं कि भारत ने दो कठोर नीतिगत क़दमों से आई अड़चनों को पार कर लिया है.

इनसे यह भी पता चलता है कि भारत तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में बना हुआ है और इसमें उसकी रफ़्तार पड़ोसी चीन से भी ज़्यादा है जो इसी तिमाही में 6.7% बढ़ा.

मूडीज़ की इन्वेस्टर्स सर्विस ने अगस्त में कहा था कि 2018-19 में भारत की अर्थव्यवस्था 7.5 प्रतिशत के आसपास बढ़ सकती है.

इस आकलन के पीछे उसने भारत की मज़बूत स्थानीय मांग, औद्योगिक गतिविधियों में सुधार और बाहरी झटकों को सहने की क़ाबिलीयत का हवाला दिया था.

रिपोर्ट में लिखा गया था, "सामान्य मॉनसून और ख़रीफ़ की फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाए जाने से ग्रामीण भारत को मज़बूती मिलेगी."

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आश्वस्त क्यों हैं मोदी

भारत के केंद्रीय बैंक आरबीआई ने मौजूदा वित्तीय वर्ष के लिए 7.4 का ग्रोथ रेट रहने का अनुमान लगाया है. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश की आर्थिक प्रगति को लेकर आश्वस्त नज़र आते हैं.

अगस्त महीने की शुरुआत में अंग्रेज़ी अख़बार हिंदुस्तान टाइम्स को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, "अर्थव्यवस्था 7.5% से ज़्यादा की दर पर बढ़ रही है. सभी सूचकांक सकारात्मक हैं, विदेशी भंडार भी 400 अरब डॉलर से ज्यादा हैं."

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उन्होंने हाल ही में आई आईएमफ़ की रिपोर्ट के हवाले से कहा था, "हमारी अर्थव्यवस्था को ऐसा हाथी कहा जा रहा है जिसने दौड़ना शुरू किया है. मुझे लगता है कि हम सही दिशा में दौड़ रहे हैं."

इस रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत की अर्थव्यवस्था रफ्तार पकड़ रही है और इसके लिए कई सारे नीतिगत क़दम ज़िम्मेदार हैं, जैसे कि जीएसटी लागू करना और विदेशी निवेशकों के लिए अनुकूल हालात बनाना.

आईएमएफ़ का अंदाज़ा था कि मौजूदा वित्तीय वर्ष में भारत 7.3 की ग्रोथ दिखा सकता है जो पिछले साल 6.7 प्रतिशत रही थी.

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