SC-ST क़ानून में संशोधन से मध्य प्रदेश में फँसी बीजेपी?

  • 3 सितंबर 2018
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उत्तर भारत के कई राज्यों में एससी एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को बदलने के विरोध में प्रदर्शन हो रहे हैं. इसी साल मार्च में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अनुसूचित जाति और जनजाति के ख़िलाफ़ अत्याचार निवारण क़ानून के तहत होने वाले अपराधों में अभियुक्तों की गिरफ़्तारी वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक की अनुमति या शुरुआती जांच के बाद ही होगी.

सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले को लेकर देश भर के एससी और एसटी संगठनों की तीखी प्रतिक्रिया आई थी. संसद में इस समुदाय से जुड़े सांसदों ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का विरोध किया था.

संसद के मॉनसून सत्र में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को अध्यादेश लाकर बदल दिया और यह क़ानून पहले की तरह ही हो गया. केंद्र सरकार के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अब कई राज्यों में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं.

इनमें बिहार, मध्य प्रदेश समेत कई हिन्दी भाषी राज्य शामिल हैं. विरोध करने वालों का कहना है कि एससी एसटी क़ानून का ग़ैर-एससी एसटी समुदायों को फँसाने में दुरुपयोग किया जा रहा था और सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला बिल्कुल सही था.

इसे लेकर मध्य प्रदेश में लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं. भाजपा के मंत्रियों और सांसदों के साथ ही कांग्रेस के नेताओं को भी विरोध का सामना करना पड़ रहा है. कई जगहों पर केंद्रीय मंत्रियों का भी घेराव किया गया है.

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विरोध करनेवाले कौन

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की जन आशीर्वाद यात्रा के दौरान रविवार रात को उनके रथ पर पथराव किया गया. हालांकि भाजपा इसे कांग्रेस प्रायोजित बता रही है. मुख्यमंत्री के काफ़िले को काले झंडे भी दिखाने की कोशिश की गई. मुख्यमंत्री की यात्रा चुरहट पहुंची थी और यह इलाक़ा प्रदेश के नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह का है.

वहीं ग्वालियर में केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के आवास पर धरना प्रदर्शन का आयोजन किया गया. प्रदेश की नगर विकास मंत्री माया सिंह को भी काले झंडे दिखाए गए. इसके बाद 8 लोगों को हिरासत में लिया गया है.

इस तरह के बढ़ते विरोध की वजह से पुलिस ने ग्वालियर में मंत्रियों के बंगलों पर सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी है.

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शनिवार को विदिशा पहुंचे विदेश राज्यमंत्री एमजे अकबर को भी विरोध का सामना करना पड़ा. विरोध का सामना कांग्रेस के सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ को भी करना पड़ा है.

सपाक्स यानी सामान्य पिछड़ा एवं अल्पसंख्यक वर्ग भी खुलकर इसका विरोध कर रहा है. सपाक्स सरकारी नौकरियों में प्रमोशन और आरक्षण का भी विरोध करता है. सपाक्स के संरक्षक हीरालाल त्रिवेदी का कहना है कि उनका संगठन चुनाव में भी उतरेगा.

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किस प्रावधान पर है आपत्ति

उन्होंने कहा, "अभी जो संशोधन हुआ है उसमें इस एक्ट को पहले की तरह तो बना दिया ही गया है और साथ ही हाई कोर्ट से अग्रिम ज़मानत के अधिकार को भी ख़त्म कर दिया गया है. इसमें नागरिकों के स्वतंत्रता के अधिकार का भी गला घोंट दिया गया है. समानता के अधिकार को भी ख़त्म कर दिया गया है."

इस संशोधन पर सवर्णों के एक तबके में काफ़ी नाराज़गी है. गुना के अक्षय तिवारी कहते हैं, "एससी, एसटी क़ानून का विरोध इसलिए कर रहे हैं क्योंकि यह काला क़ानून है और इसमें बोलने का अधिकार नहीं है. इसमें जो व्यक्ति शिकायत कर देगा, वही माना जाएगा और दूसरों की नहीं सुनी जाएगी.''

केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत सरकार के अध्यादेश का बचाव कर रहे हैं. उन्होंने कहा, "सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि यह एक्ट संवैधानिक है. एससी, एसटी से जुड़े लोगों पर अत्याचार बढ़ने की आशंका थी, इसलिए संशोधन किया गया."

कई जगहों पर विरोध अनूठे तरीक़े से किए जा रहे हैं. प्रदेश के महू और खरगौन में लोगों ने घरों और दुकान के बाहर पोस्टर लगा दिया है. खरगौन में लगे पोस्टर पर लिखा गया है- यह घर सामान्य वर्ग का है. राजनीतिक पार्टियां वोट मांगकर शर्मिंदा ना करें.

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विरोध के सियासी मायने?

महू में दुकानों में लगे पोस्टरों में लिखा है- हमारा परिवार सामान्य वर्ग का परिवार है. हम एससी/एसटी संशोधन बिल का विरोध करते है. मध्य प्रदेश में इस साल के अंत में विधानसभा चुनाव है. प्रदेश में 35 सीटें एससी और 47 सीटें एसटी के लिए आरक्षित हैं.

इस वक़्त एससी की 28 सीटों और एसटी की 32 सीटों पर भाजपा काबिज है. मोदी सरकार के इस संशोधन को सियासी माना जा रहा है. हालांकि भाजपा के लिए प्रदेश में सवर्णों के वोट भी काफ़ी मायने रखते हैं. बीजेपी की मुश्किल यह है कि वो फ़िलहाल एससी-एसटी के साथ सवर्णों को साधने में ख़ुद को असमर्थ पा रही है.

मध्य प्रदेश अनुसूचित जाति जनजाति अधिकारी एवं कर्मचारी संघ के महासचिव गौतम पाटिल प्रदेश में हो रहे प्रदर्शन को बेमानी मानते हैं.

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उनका कहना है, "ये एक तरह से समाज में दरार पैदा कर रहे हैं. आप किसी व्यक्ति से साथ पशुओं जैसा व्यवहार करते हो और फिर आप कहते हो कि उसके ख़िलाफ़ कुछ भी न किया जाए. यह एक तरह से राजनीति है. सरकार ने जो अध्यादेश लाया है इस पर इतना विरोध नही होना चाहिए."

मध्य प्रदेश में अनुसूचित जाति की आबादी 15.2 प्रतिशत है जबकि अनुसूचित जनजाति की आबादी 21.10 प्रतिशत है.

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