ब्लॉग: तो अब दलितों से उनकी ये पहचान भी छीनी जाएगी?

  • 5 सितंबर 2018
रैली इमेज कॉपीरइट Getty Images

ब्लैक अमरीकी ब्लॉगर एरी बाइन्स काफ़ी मुँहफट हैं और अपने बेबाक लेखन की वजह से जानी जाती हैं. बेब.नेट नाम की वेबसाइट पर वो लिखती हैं: मुझे अफ़्रीक़ी-अमरीकी कहना बंद करो- मैं ब्लैक हूँ.

मैं उनके लेख में भारतीय वर्ण व्यवस्था के सबसे निचली पायदान पर खड़ी दबी-कुचली औरत की ध्वनि सुनता हूँ, जो ऊपर की मंज़िल पर रहने वाले कुलीनों से चीख़ कर कह रही है: "मुझे हरिजन और शेड्यूल कास्ट कहना बंद करो. मैं दलित हूँ."

बाइन्स ऐसे ही कुलीनों से तंज़िया अंदाज़ में कहती हैं: "सुनो, दोस्तों और सहेलियों...लोग जैसे चाहेंगे वैसे अपनी पहचान तय करेंगे. मैं ख़ुद की पहचान ब्लैक के तौर पर करती हूँ और तुम्हारे लिए यही काफ़ी होना चाहिए."

अगर भारत के दलित ख़ुद को दलित कहलवाने में गर्व महसूस करते हैं तो भारत के 'जातीय कुलीनों' के लिए भी इतना काफ़ी होना चाहिए. अगर दलित ख़ुद को दलित कह रहा है तो कोई क़ानून, कोई सरकारी हुक्मनामा, किसी विजिलांती की कोई धमकी काम नहीं करेगी.

कभी भीमा कोरेगाँव में, कभी खैरलांजी में तो कभी मिर्चपुर का दलित ज़ोर से चिंघाड़ कर कहेगा - मैं दलित हूँ.

और जब जब जाति व्यवस्था के भारी पहिए के नीचे कुचला जा रहा व्यक्ति कहेगा कि उसे कुचला जा रहा है और यही उसकी पहचान है, तब-तब उसकी पहचान को नया नाम देने की कोशिश होगी. क्योंकि ये एक शब्द है जो सदियों से दलितों के ख़िलाफ़ हो रहे अत्याचार और भेदभाव को उसकी पूरी विद्रूपता के साथ एक झटके में नंगा कर देता है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

कहां से आया दलित शब्द

सत्य का ऐसा नग्न स्वरूप महात्मा गाँधी को भी पसंद नहीं था. इसीलिए उन्होंने दलित जातियों के लिए 'हरिजन' जैसा शब्द दिया जिसमें ब्राह्मणवादी अत्याचार और विद्रूप को आध्यात्म के रेशमी गिलाफ़ में ढका जा सके. डॉक्टर आंबेडकर इस शब्द को लेकर महात्मा गाँधी से पूरी तरह असहमत थे. हरिजन शब्द के विरोध में उन्होंने बंबई विधानसभा से वॉकआउट भी किया था.

इसके बावजूद दलित समाज की इच्छा के ख़िलाफ़ उसे हाल-हाल तक हरिजन के तौर पर चिन्हित किया जाता रहा है. हरिजन शब्द दलितों के साथ सैकड़ों सालों से चले आ रहे भेदभाव, छुआछूत, हत्या, बलात्कार और आगज़नी को शालीनता के रेशमी गिलाफ़ में ढाँप देता है, जबकि दलित शब्द इस भेदभाव, क्रूरता और अन्याय की सामाजिकता और राजनीति को हठात् उजागर कर देता है.

दलित शब्द संस्कृत के दलन से निकला है. बीज को पत्थर की चक्की के दो पाटों के बीच दलकर दाल बनाई जाती है. वर्णाश्रम व्यवस्था में कथित 'श्रेष्ठ जातियों' के पैरों तले कुचले जाने वाली जातियों को पहले 'पद दलित' और बाद में दलित कहा गया.

जब-जब किसी को दलित कहा जाएगा तो दलन करने वाले की पहचान ज़रूर पूछी जाएगी. इसी से बचने के लिए कहा जाता है कि दलित जैसे शब्द की बजाए अनुसूचित जाति जैसा शब्द इस्तेमाल किया जाए जिसे पढ़-सुनकर कोई तस्वीर ही न बन पाए.

इमेज कॉपीरइट CHANDRASHEKHAR
Image caption भीम आर्मी के चंद्रशेखर अभी भी जेल में हैं

दलन की तस्वीरें

दलित शब्द सुनते ही आपके ज़ेहन में उन चार नौजवानों की तस्वीर उभर आएगी जिन्हें गुजरात के ऊना क़स्बे के पास ऊँची जाति के कथित गौरक्षकों ने मरी गाय का चमड़ा खींचने के जुर्म में एक गाड़ी से बाँधकर चौराहे पर सरेआम डंडों से पीटा था.

वीडियो में इन नौजवानों का दलन होते हुए दिखता है - इसलिए उनकी असली सामाजिक और राजनीतिक पहचान दलित की है, अनुसूचित जाति या शेड्यूल कास्ट की नहीं जैसा कि केंद्र सरकार के सूचना प्रसारण मंत्रालय और सामाजिक कल्याण मंत्रालय हमें बता रहा है.

मशहूर ब्रितानी पत्रकार और युद्ध संवाददाता रॉबर्ट फ़िस्क कहते हैं "सत्ताधीशों और मीडिया के बीच कोई झगड़ा नहीं है. भाषा की मदद से हम भी वही बन चुके हैं."

फ़िस्क ख़बरदार करते हैं कि सत्ताधीशों और पत्रकारों की भाषा लगभग एक-सी होती जा रही है. सरकारें और हुक्मरान चाहते हैं कि हम उन्हीं शब्दों का इस्तेमाल करें जिन्हें सरकारें इस्तेमाल करवाना चाहती हैं. जैसे इराक़ पर हमले के दौरान पश्चिमी मीडिया में 'कोलैटरल डैमेज' जैसे जुमलों का इस्तेमाल होता था.

ये शब्द मीडिया में अमरीकी हुकूमत के ज़रिए लाया गया ताकि फ़ौजी हमलों में आम नागरिकों की मौत की हक़ीक़त को ढाँपा जा सके.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

भारत में भी ऐसे बहुत से शब्द

भारतीय मीडिया में भी विद्रूपताओं को ढाँपकर रखने वाले कई शब्द रोज़ाना सुनाई पड़ते हैं. कोई बड़ा बिज़नेसमैन हज़ारों करोड़ रुपए का क़र्ज़ लेकर वापिस नहीं कर रहा है तो उसे बैंक अधिकारी कहते हैं - एनपीए, यानी नॉन परफ़ॉर्मिंग एसेट्स. क्या इससे ये समझ में आता है कि जनता की गाढ़ी कमाई का करोड़ों रुपया डूब गया है?

इसीलिए केंद्र सरकार चाहती है कि दलित शब्द की जगह अनुसूचित जाति लिखा जाए ताकि खैरलांजी, मिर्चपुर, ऊना और उससे पहले कफ़ल्टा जैसे दलितों के पद-दलन की कोई तस्वीर तुरंत न उभर पाए.

दलित कार्यकर्ता कांचा इलैया कहते हैं, गौतम बुद्ध ने सबसे पहले दलित शब्द का इस्तेमाल समाज के हाशिए पर फेंक दिए गए लोगों के लिए किया था. कुछ लोग 'अस्पृश्य समाज' को दलित वाली राजनीतिक पहचान देने का श्रेय ज्योतिराव फुले और डॉक्टर भीमराव आंबेडकर को देते हैं.

जिस तरह अमरीका और यूरोप के अफ़्रीक़ी मूल के काले लोगों ने लंबे और ख़ूनी संघर्ष के बाद ब्लैक के तौर पर अपनी पहचान की लड़ाई लड़ी और जीती, उसी तरह दलितों ने भी बरसों की लड़ाई के बाद दलित के तौर पर अपनी राजनीतिक पहचान स्थापित की है.

और अब बाक़ायदा क़ानून की किताब आगे करके केंद्र सरकार कोशिश कर रही है कि दलितों से उनकी इस पहचान को छीन लिया जाए. सरकारी विभागों को आदेश दिया ही गया है कि वो दलित शब्द की जगह वर्ण व्यवस्था के भूतल में आने वाली वंचित जातियों के लिए अनुसूचित जाति का इस्तेमाल करें. पर सरकार चाहती है कि वंचित जातियों की नई नस्लों के दिमाग़ से दलित शब्द पूरी तरह मिटा दिया जाए, इसके लिए वो मीडिया को भी दलित शब्द के प्रयोग से बचने की 'सलाह' दे रही है.

दलितों की राजनीतिक पहचान को बदलने और उसे एक रंगहीन, गंधहीन समूह की पहचान में बदलने की ये कोशिश इतनी बारीकी से हो रही है कि आप सीधे सरकार को ज़िम्मेदार ठहरा ही नहीं सकते.

इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption भीमा-कोरेगांव में हुई थी हिंसक झड़पें

कोर्ट के आदेश का हवाला

सूचना और प्रसारण मंत्रालय के आदेश में कहा गया है कि ये सब कुछ अदालत के आदेश के मुताबिक़ हो रहा है. बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर शाखा ने केंद्र सरकार को आदेश दिया था कि वो मीडिया को दलित शब्द का इस्तेमाल न करने की हिदायत जारी करने के बारे में सोचे. इससे पहले सामाजिक कल्याण मंत्रालय ने इसी साल मार्च में ऐसी ही हिदायतें जारी की थीं.

केंद्र सरकार ही क्यों, केरल के अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग के आदेश के बाद वहाँ की सरकार के जनसंपर्क विभाग ने भी सभी सरकारी दस्तावेज़ों में दलित की जगह अनुसूचित जाति का प्रयोग करने का आदेश जारी किया था. तमाम दलित बुद्धिजीवियों ने तब भी इस फ़ैसले का विरोध किया था.

याद कीजिए कि उससे तीन महीने पहले यानी जनवरी के महीने में पुणे के पास भीमा कोरेगाँव में 200 साल पहले ब्राह्मण पेशवाओं पर दलित फ़ौजियों की जीत का जश्न मनाने इकट्ठा हुए दलितों पर हमले किए गए थे. उसी टकराव के बाद महाराष्ट्र पुलिस ने कहा कि भीमा कोरेगाँव की हिंसा माओवादियों ने भड़काई. हालाँकि सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज पीबी सावंत 31 दिसंबर, 2017 को हुई यलगार परिषद के आयोजकों में से थे.

इससे कुछ ही महीने पहले दिसंबर 2016 में गुजरात के ऊना में चार दलित नौजवानों को सरेआम डंडों से पीटने की घटना हो चुकी थी जिसके कारण देश भर के दलितों में ग़ुस्सा फैला था. पिछले साल ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भीम आर्मी के संयोजक चंद्रशेखर आज़ाद 'रावण' को पुलिस ने दंगा भड़काने के आरोप में गिरफ़्तार किया था. वो अब भी जेल में हैं.

ये सब उस वक़्त हो रहा था जब केंद्रीय गृह राज्यमंत्री हंसराज गंगाराम अहीर ने लोकसभा में सूचना दी कि 2016 में दलितों और आदिवासियों के ख़िलाफ़ ज़्यादतियों और दमन के 47 हज़ार से ज़्यादा मामले दर्ज किए गए. इनमें से सिर्फ़ 25.8 प्रतिशत मामलों में अपराधियों को सज़ा हो पाई.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

'मैं दलित हूँ'

मेरठ विश्वविद्यालय में भौतिक विज्ञान विभाग में एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉक्टर सतीश प्रकाश दलित राजनीति पर बारीक नज़र रखते हैं. वो कहते हैं कि आक्रामकता दलित आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है.

उन्होंने मुझसे कहा, "दलित जीवन भर दूसरों की आक्रामकता का शिकार रहता है. इसीलिए वो अपने नेताओं में एक ख़ास तरह की आक्रामकता को पसंद करता है. यही आक्रामकता ही उसकी ताक़त है."

दलित को ऐसी आक्रामकता काँशीराम में और कुछ हद तक मायावती में नज़र आई. इसी आक्रामकता ने उसको विश्वास दिलाया कि उसका दमन और दलन करने वाली जातियों को भी चुनावी राजनीति में घुटने टिकवाए जा सकते हैं. इसीलिए मायावती ने बेखटके भारतीय जनता पार्टी जैसी पार्टी के साथ हाथ मिलाया जिसे वो हमेशा 'मनुवादी' कहती आई थीं.

बहुजन समाज आंदोलन ने हाशिए पर पड़े इस समाज को ख़ुद की दलित पहचान को गर्व के साथ सामने रखने का आत्मविश्वास भी दिया. डॉक्टर सतीश प्रकाश मानते हैं कि एक दलित के तौर पर अगर मैं ख़ुद को दलित कहना पसंद करता हूँ तो सरकार को इसमें एतराज़ नहीं होता चाहिए. उन्होने कहा, "दलित अपनी पहचान की लड़ाई लड़ रहा है. अगर वो ख़ुद को दलित कहकर गौरवान्वित महसूस कर रहा है तो सरकार क्यों उसे उसकी पुरानी पहचान की ओर ले जाना चाहती है?"

वो भारत में दलित आंदोलन की तुलना अमरीका के ब्लैक राइट्स आंदोलन से करते हैं और कहते हैं कि जिस तरह अमरीकी ब्लैक समाज ने अपने तमाम दुखों का कारण गोरों को माना और उसके समानांतर अपनी संस्कृति और ब्लैक आइडेंटिटी या पहचान पर गर्व करना सीखा, उसी तरह दलित भी अपनी जाति पूछे जाने पर गर्व से कहता है कि मैं दलित हूँ.

आने वाले दिनों में देश के कई हिस्सों में दलित आंदोलन की आहटें सुनाई पड़ने वाली हैं और हर बार ये सवाल बार-बार सामने आएगा कि सरकार अपने विभागों के अलावा मीडिया से भी दलित शब्द को क्यों मिटा देना चाहती है?

दलित समाज को इस सवाल का जवाब अच्छी तरह मालूम है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

मिलते-जुलते मुद्दे