मदरसा शिक्षकों का मोदी सरकार के ख़िलाफ़ मोर्चा

  • 6 सितंबर 2018
इस्लामिक मदरसा आधुनिकीकरण शिक्षक एसोसिएशन, एजाज अहमद, scheme for providing quality education in madarsas, SPQEM

ढाई साल से मानदेय की राह ताक रहे मदरसा शिक्षकों ने अब नरेंद्र मोदी सरकार के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया है.

आर्थिक संकट से जूझ रहे देशभर के मदरसा शिक्षकों ने बुधवार यानी 5 सितंबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ धरना-प्रदर्शन किया.

मदरसा शिक्षकों का आरोप है कि केंद्र सरकार शिक्षकों को तय मानदेय नहीं दे रही है, जिससे अधिकांश मदरसे बंद होने की कगार पर आ गए हैं और शिक्षकों की हालत बद से बदतर होती जा रही है.

दरअसल, केंद्र सरकार स्कीम फॉर प्रोवाडिंग क्वॉलिटी एजुकेशन इन मदरसा (एसपीक्यूएम) यानी मदरसा आधुनिकीकरण योजना के तहत पोस्ट ग्रैजुएट शिक्षकों को 12 हज़ार और ग्रैजुएट शिक्षकों को 6 हज़ार प्रतिमाह मानदेय देती है. मदरसा शिक्षकों का आरोप है कि पिछले 30 महीने से एसपीक्यूईएम योजना के तहत मिलने वाला मानदेय नहीं मिल रहा है.

इसके तहत 2016-17 के सत्र से लेकर अब तक का किसी भी शिक्षक को मानदेय नहीं दिया गया है. इससे उनकी आर्थिक स्थिति बदतर हो रही है और शिक्षक नौकरी छोड़ने को भी मजबूर हो रहे हैं.

Image caption इस्लामिक मदरसा आधुनिकीकरण शिक्षक एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष एजाज अहमद

इस्लामिक मदरसा आधुनिकीकरण शिक्षक एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष एजाज अहमद ने बीबीसी को बताया, "केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय ग्रेजुएट शिक्षक को छह हज़ार रुपये और पोस्ट ग्रेजुएट शिक्षक को 12 हज़ार रुपये देती है जबकि राज्य सरकार ग्रेजुएट शिक्षक को दो हज़ार रुपये और पोस्ट ग्रेजुएट शिक्षक को तीन हज़ार रुपये अलग से देती है. राज्य सरकार ने अपना अंश दे दिया है, लेकिन केंद्र ने पिछले 30 महीने से अपना अनुदान नहीं दिया है. इससे शिक्षकों की भुखमरी की स्थिति आ गई है. प्रदेश के सभी मदरसा शिक्षकों की योग्यता मान्यता के अनुरूप है."

बीबीसी ने अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष सैयद गय्यूर उल-हसन रिज़वी से इस विषय में पूछा.

उन्होंने कहा, "मदरसा शिक्षकों का केंद्र सरकार से पिछले 30 महीनों से मानदेय बकाया है. इसी को लेकर मदरसा आधुनिकीकरण शिक्षक संघ के पदाधिकारियों ने बुधवार को मुझसे मुलाकात की. मैं केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर से मुलाकात करके इस मसले पर चर्चा करूंगा और पूरी कोशिश करूंगा कि मदरसा शिक्षकों को उनका बकाया मानदेय मिल जाए."

क्या है एसपीक्यूईएम?

स्कीम फॉर प्रोवाइडिंग क्वॉलिटी एजुकेशन (एसपीक्यूईएम) को केंद्रीय एचआरडी मंत्रालय ने मदरसों में शिक्षा व्यवस्था में सुधार करने के उद्देश्य से मदरसों के आधुनिकीकरण के लिए और यहां पढ़ने वाले बच्‍चों के भविष्य संवारने के लिए गणित, विज्ञान, अंग्रेज़ी, कंप्यूटर और सामाजिक विज्ञान जैसे विषय पढ़ाए जाने की सिफ़ारिश की थी.

मदरसा बोर्ड ने मदरसों के बच्चों की शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए विषयवार और कक्षावार एनसीईआरटी की किताबें पाठ्यक्रम में शामिल करने और उर्दू के साथ हिंदी और अंग्रेज़ी माध्यम में भी पढ़ाई का प्रस्ताव भेजा था. इससे पहले मदरसों में उर्दू, अरबी और फ़ारसी की ही पढ़ाई हो रही थी.

इन विषयों के लिए नियुक्ति किए जाने वाले शिक्षकों की सैलरी केंद्र सरकार के उपलब्ध कराए जाने वाले कोष से दी जाती है. इसके लिए देशभर के मदरसों के शिक्षकों को दो मानदेय के तहत पंजीकृत किया गया.

लेकिन एजाज अहमद कहते हैं, "मदरसों में एनसीईआरटी (राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद) के पाठ्यक्रम लागू तो कर दिए, लेकिन इसकी किताबें उपलब्ध नहीं होने से पढ़ाई प्रभावित हो रही हैं. सरकार ने मदरसों में एनसीईआरटी सिलेबस तो लागू कर दिया, लेकिन किताबें नहीं दी गईं."

मोदी सरकार ने साल 2014-15 के बजट में मदरसों में कंप्यूटरीकरण और आधुनिकीकरण के लिए 100 करोड़ रुपये की राशि का ऐलान किया था. इस योजना को पूरा करने के लिए मानव संसाधन मंत्रालय और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय को ज़िम्मेदारी सौंपी गयी थी.

एजाज अहमद कहते हैं, "2014 के चुनावी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मदरसा का आधुनिकीकरण करने का एजेंडा रखा था. इसके लिए उन्होंने बजट में 375 करोड़ रुपये का प्रावधान भी रखा था, लेकिन प्रकाश जावडेकर ने उसे कम कर 120 करोड़ कर दिया. यह रकम समूचे मदरसा शिक्षकों के वेतन के लिए बहुत कम है."

उन्होंने कहा, "इसी साल फरवरी में माननीय मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावडेकर से हमने मुलाक़ात की थी और उन्होंने एक दो महीने में मानदेय जारी कराने का आश्वासन भी दिया था, लेकिन आज तक यह जारी नहीं किया गया. उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा और अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री लक्ष्मी नारायण चौधरी से भी मुलाकात की थी तो उन्होंने बताया था कि प्रदेश की सरकार ने इस बाबत केंद्र से मांग की लेकिन उन्होंने अभी तक पैसे नहीं दिए हैं."

एजाज कहते हैं, "सभी मदरसे सरकार के नियमों का पालन करते हुए आधुनिक शिक्षा दे रहे हैं. तीन-तीन बार इनकी जांच कराई गई जिसमें सभी मदरसों के खरे उतरने के बावजूद सरकार ने मानदेय नहीं दिया."

उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, और झारखंड समेत देश के 16 राज्यों के लगभग 50,000 से अधिक मदरसा शिक्षकों को पिछले ढाई सालों से केंद्र सरकार की तरफ से वेतन नहीं मिला है जिसके कारण बहुत से शिक्षकों की आर्थिक स्थिति ख़राब होती जा रही है.

अमरोहा से इस विरोध प्रदर्शन में पहुंचे यूसुफ अली सैफी ने कहा, "हमारे घर की स्थिति बहुत दयनीय होती जा रही है. हम गुजर बसर को लेकर परेशान हैं. कई शिक्षक दुकानों पर और खेतों में मजदूरी करने के लिए विवश हैं."

वहीं प्रतापगढ़ से पहुंचे अंसार अली कहते हैं, "हम पोस्ट ग्रेजुएट हैं लेकिन हमें वेतन दिहाड़ी मजदूरों से भी कम मिलता है यहां तक कि राज्य सरकार से मिलने वाले पैसे भी समय से नहीं मिलते. केंद्र ने पैसे रोक रखे हैं तो भला तीन हज़ार रुपये महीने में हम अपना घर कैसे चलाएं. क्या इसी दिन के लिए पोस्ट ग्रेजुएट की पढ़ाई की थी."

भारत में मदरसों की संख्या 25,000 से अधिक बताई जाती है, जिनमें अकेले उत्तर प्रदेश में ही राज्य मदरसा बोर्ड से मान्यता प्राप्त 19,213 मदरसे हैं.

एजाज अहमद कहते हैं, "राज्य के मदरसों में शिक्षकों की संख्या लगभग 25 हज़ार है, जबकि पूरे देश में इनकी तादाद 50 हज़ार है. सरकारी पोर्टल पर भी इन मदरसों के डेटा ऑनलाइन किए गए हैं. इनके आधुनिकीकरण के लिए करीब 1,000 करोड़ रुपये की ज़रूरत है. यहां केवल मुसलमान शिक्षक ही नहीं हैं. इनमें करीब 20 फ़ीसदी शिक्षक हिंदू हैं."

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