धर्म में क्या हैं समलैंगिक संबंध- अप्राकृतिक व्यभिचार या पाप?

  • 6 सितंबर 2018
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जब से भारत के सुप्रीम कोर्ट ने दंड संहिता की धारा 377 पर पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई शुरू की, तब से ही भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म में समलैंगिकता के बारे में बहस गरम होने लगी थी.

बहरहाल, गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि समलैंगिक समुदाय को भी समान अधिकार हैं. चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पाँच सदस्यीय पीठ ने आईपीसी की धारा 377 को मनमाना और अतार्किक बताते हुए असंवैधानिक करार दिया.

ये तो रही अदालती फ़ैसले की बात. लेकिन धर्मों में समलैंगिक संबंधों को किस रूप में देखा गया है. सवाल ये है कि क्या धर्म में समलैंगिक संबंध अप्राकृतिक व्याभिचार या पाप है?

समलैंगिकता वाली बहस हमेशा ही पाखंड और दोहरे मानदंडों की वजह से पटरी से उतरती रही है. इस बार भी यह ख़तरा नज़र आ रहा है.

सबसे बड़ा कुतर्क यह है कि सभी धर्म समलैंगिक संबंधों को अप्राकृतिक व्यभिचार या पाप समझते हैं. ईसाई मिशनरियों और कट्टरपंथी मुसलमान मौलवियों के इस देश में पैर रखने से पहले तक हिंदू अपने यौनाचार और काम भावना की अभिव्यक्ति के बारे में कुंठित नहीं थे.

महादेव शिव का एक रूप अर्धनारीश्वर वाला है जिसे आज की शब्दावली में एंड्रोजीनस सैक्सुअलिटी की सहज स्वीकृति ही कहा जा सकता है. मिथकीय आख्यान में विष्णु का मोहिनी रूप धारण कर शिव को रिझाना किसी भी भक्त को अप्राकृतिक अनाचार नहीं लगता था.

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महाभारत में अर्जुन की मर्दानगी बृहन्नला बनने से कलंकित नहीं होती, शिखंडी का लिंग परिवर्तन संभवत: सेक्स रिअसाइनमेंट का पहला उदाहरण है.

गुप्त काल में रचित वात्स्यायन के कामसूत्र में निमोंछिए चिकने नौकरों, मालिश करने वाले नाइयों के साथ शारीरिक संबंध बनाने वाले पुरुषों का बखान विस्तार से किया गया है और इस संभोग सुख के तरीक़े भी दर्ज हैं.

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स्त्रैण गुणों वाला अपराधी नहीं

स्त्रैण गुणों वाले व्यक्तियों को पापी या अपराधी नहीं घोषित किया गया है. स्त्रियों की आपसी रतिक्रीड़ा का भी सहज वर्णन है. खजुराहो के मंदिर हों या ओडिशा के, उनकी दीवारों पर जो मूर्तियाँ उकेरी गई हैं उनमें भी यही खुली सोच दिखलाई देती है.

मध्य काल में सखी भाव वाली परंपरा को समलैंगिकता का उदात्तीकरण (उत्थान की प्रक्रिया) ही माना सकता है. इस सबका सार संक्षेप यह है कि समलैंगिकता सिर्फ़ अब्राहमी धर्मों में- यहूदी, ईसाई धर्म तथा इस्लाम में ही वर्जित रही है.

पश्चिम में भी इसके पहले यूनान तथा रोम में वयस्कों तथा किशोरों के अंतरंग शारीरिक संबंध समाज में स्वीकृत थे. मज़ेदार बात यह है कि जिस बुरी व्याभिचारी लत को अंग्रेज़ 'ग्रीक लव' कहते रहे हैं उसे फ़्रांसीसी 'वाइस आंग्लैस' (अँगरेज़ी ऐब) कहते हैं.

प्रख्यात साहित्यकार ऑस्कर वाइल्ड से लेकर क्रिस्टोफ़र इशरवुड तक विलायती अभिजात्य वर्ग के लोग बेड ब्रेकफ़ास्ट एंड बॉय की तलाश में मोरक्को से लेकर मलाया तक फिरते रहे हैं.

दर्शन को नई दिशा देने वाले मिशेल फूको ने अपनी समलैंगिकता को कभी छुपाया नहीं, दुर्भाग्य यह है कि पाखंड और दोहरे मानदंडों के कारण एलन ट्यूरिंग जैसे प्रतिभाशाली गणितज्ञ, वैज्ञानिक और कोड ब्रेकर को उत्पीड़न के बाद आत्महत्या करनी पड़ी थी.

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ब्रिटिश शासन काल का क़ानून

इन सबके मद्देनज़र 1960 के दशक में ही वुल्फेंडन कमीशन की रिपोर्ट के बाद ब्रिटेन ने समलैंगिकता वाले विक्टोरियन क़ानून को रद्द कर दिया था, पर ग़ुलाम भारत ने आज़ादी के बाद भी गोरे हुक्मरानों की पहनाई बेड़ियों में जकड़े रहने का फ़ैसला किया.

जब सुप्रीम कोर्ट यह फ़ैसला सुना चुका है कि निजता और एकांत बुनियादी अधिकार है तब यह समझना असंभव है कि कैसे पुलिस समलैंगिकों के आचरण की निगरानी कर धर-पकड़ कर सकती है?

पश्चिम में जिन्हें थर्ड सेक्स कहा जाता है वैसे कई व्यक्ति भारत में इस क़ानून की वजह से प्रताड़ित और तिरस्कृत होते रहे हैं और वेश्यावृत्ति को ही अपनी जीविका का आधार बनाने को मजबूर हुए हैं, निश्चय ही 377 के शिकंजे से मुक्ति उन्हें मानवीय गरिमा के साथ जीने का मौक़ा देगा.

इस बात को भी अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए कि ईसाई अमेरिका के अनेक राज्यों ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से निकाल दिया गया है और इनके विवाह को कई प्रांतों ने क़ानूनी मान्यता दी है.

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ख़ुद पोप यह कह चुके हैं कि समलैंगिक भी उसी ईश्वर की संतान हैं जिसे हम पूजते हैं इसलिए इनके प्रति भेदभाव नहीं बरता जाना चाहिए.

बदक़िस्मती यह है कि इन्हीं दिनों चर्च में किशोरों और कच्ची उम्र के लड़कों के यौन उत्पीड़न के मामलों का पर्दाफ़ाश हुआ है जिन्हें छुपाने का प्रयास वैटिकन के अधिकारी करते रहे हैं, ऐसे में समलैंगिकता के बारे में खुलकर बोलने से पोप और कार्डिनल बिशप कतराते हैं.

यह याद रखने की ज़रूरत है कि वयस्कों के बीच सहमति पर आधारित समलैंगिक आचरण और किशोरों बच्चों के यौन शोषण में बहुत फ़र्क़ है. यह कुतर्क 377 को जारी रखने के लिए नहीं दिया जा सकता.

21वीं सदी के पहले चरण में वैज्ञानिक शोध यह बात अकाट्य रूप से प्रमाणित कर चुका है कि समलैंगिकता रोग या मानसिक विकृति नहीं है, यह अप्राकृतिक नहीं कही जा सकती. जिनका रुझान इस ओर होता है उन्हें इच्छानुसार जीवनयापन के बुनियादी अधिकार से वंचित नहीं रखा जा सकता.

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संकट यह है कि हमारी न्यायपालिका में और मंत्रिमंडल में ऐसी विभूतियों का अभाव नहीं है जो मानते हैं कि डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत मूर्खता है या कि मोर की संतान उसके आंसुओं से पैदा होती है! इनसे यह अपेक्षा व्यर्थ है कि यह विज्ञान के आलोक में तर्कसंगत फ़ैसला कर सकते हैं.

अपने धार्मिक विश्वास (अंधविश्वास) से ऊपर उठकर क़ानूनों की सामाजिक उपयोगिता के अनुसार संवैधानिकता तय की जा सकती है. अपने को धर्मनिरपेक्ष कहने वाला भारत किसी भी धर्म की मान्यता के अनुसार क़ानून बना या लागू नहीं कर सकता.

यह मुद्दा सिर्फ़ समलैंगिकों के अधिकारों तक सीमित नहीं, क़ानून के राज और क़ानून के सामने समानता के बुनियादी अधिकार से जुड़ा है, क्या समलैंगिक लोग भारत के नागरिक नहीं हैं कि उन्हें क़ानून से बुनियादी सुरक्षा मिले?

बहरहाल अदालत के फ़ैसले के बाद भी अधिकांश लोग शायद इस डर से चुप हैं कि अगर उन्होंने धारा 377 के उन्मूलन का समर्थन किया तो लोग इन्हें ही समलैंगिक समझने लगेंगे!

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