समलैंगिक संबंधों पर कोर्ट में क्या रहा मोदी सरकार का रुख़?

  • 6 सितंबर 2018
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Image caption सरकार ने अदालत में दाख़िल हलफ़नामे में 'अदालत के विवेक' की बात कही थी

देश की सर्वोच्च अदालत ने गुरुवार को समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटा दिया है. इसके अनुसार आपसी सहमति से दो वयस्कों के बीच बनाए गए समलैंगिक संबंधों को अब अपराध नहीं माना जाएगा.

सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस रोहिंटन नरीमन, एएम खानविल्कर, डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा की संवैधानिक पीठ ने इस मसले पर सुनवाई की.

धारा 377 को पहली बार कोर्ट में 1994 में चुनौती दी गई थी. 24 साल और कई अपीलों के बाद सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायाधीशों की खंडपीठ ने अंतिम फ़ैसला दिया है.

लेकिन इस बीच ये जानना दिलचस्प होगा कि इस मुद्दे पर अलग-अलग सरकारों का रुख़ क्या रहा है. सबसे पहले नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार की बात.

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट पर डाला था जिम्मा

सरकार का रुख़ देखकर साफ़ पता चलता है कि इस मुद्दे का भार वो अपने कंधों पर न रखकर कोर्ट पर ही डालना चाहती थी. इसी साल जुलाई में केंद्र सरकार ने सेक्शन 377 का भविष्य तय करने का ज़िम्मा सुप्रीम कोर्ट पर ही डाला था.

और सर्वोच्च अदालत ने तभी मज़बूत संकेत दे दिए थे कि वो सेक्शन 377 के ख़िलाफ़ जाएगी जो समलैंगिकता को अपराध बताती है.

इससे पहले सरकार ने अदालत में दाख़िल हलफ़नामे में सेक्शन 377 पर फ़ैसले का ज़िक्र करते हुए 'अदालत के विवेक' की बात कही थी.

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इसमें कहा गया था, ''अदालत को इस पर फ़ैसला लेना चाहिए, इसका निर्णय अदालत को करने दीजिए.''

तभी सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि उसकी मंशा ये फ़ैसला सुनाने की है कि अगर दो बालिग लोग अपनी सहमति से अप्राकृतिक संबंध बनाना चाहते हैं तो उन्हें इसकी इजाज़त होनी चाहिए. हालांकि, ये जिरह पर निर्भर करेगा.

इससे पहले समलैंगिकता को लेकर भाजपा कुछ भी खुले तौर पर कहने या अपनी राय ज़ाहिर करने को लेकर बचती रही. हालांकि, भाजपा के मातृ संगठन माने जाने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने साल 2016 में अपना रुख़ साफ़ कर सभी को चौंका दिया था.

मार्च 2016 में आरएसएस के संयुक्त महासचिव दतात्रेय होसाबले ने ट्वीट किया था, ''समलैंगिकता कोई अपराध नहीं है, लेकिन हमारे समाज में ये सामाजिक रूप से अनैतिक काम है. ऐसे लोगों को सज़ा देने की ज़रूरत नहीं है बल्कि इसे मनोवैज्ञानिक मामला मानिए.''

हालांकि, समलैंगिकों की शादी पर संघ ने दो टूक कहा था. उन्होंने लिखा था, ''गे मैरिज असल में समलैंगिकता को संस्थानीकरण देने जैसा है इसलिए इस पर पाबंदी रहनी चाहिए.''

क्या सोचती थी पिछली सरकार

लेकिन एनडीए सरकार से पहले यूपीए सरकार का इस मुद्दे पर क्या रुख़ था, ये जानना भी ज़रूरी है.

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किसी भी क़ानून के प्रावधान का बचाव करने की तैयारी में रहने वाली सरकार ने इस मुद्दे पर कई बार अलटी-पलटी मारी.

दिल्ली उच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान जब सेक्शन 377 की वैधता पर सवाल उठाया गया था तब यूपीए सरकार ने इस प्रावधान का काफ़ी बचाव किया था, लेकिन हाई कोर्ट ने इसे ख़ारिज कर दिया.

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हालांकि, इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में उसने दूसरा रुख़ अपनाया. शुरुआत में उसके नुमाइंदे ने कहा कि इस मुद्दे पर सरकार वही रुख़ रखती है, जो हाई कोर्ट में था.

लेकिन अगले रोज़ पी चिदंबरम, वीरप्पा मोइली, ग़ुलाम नबी आज़ाद के दख़ब के बाद अटॉर्नी जनरल गुलाम वाहनवती ने कहा कि इस पर फ़ैसला अदालत को लेना है.

मुकदमेबाज़ी के दूसरे दौर में केंद्र फिर अपनी पिछली स्थिति पर लौटा और कहा कि ये फ़ैसला अदालत पर छोड़ते हैं.

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