घर संभालना या नौकरी करना आपको एक्टिव नहीं बनाता

  • 7 सितंबर 2018
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अगर आपको लगता है कि आप घर में खाना बनाती हैं, डस्टिंग करती हैं, बच्चा संभालती हैं और उसके बाद ऑफ़िस भी जाती हैं तो आप 'एक्टिव वूमन' हैं तो हो सकता है कि ऐसा न हो.

कई बार औरतें एक्सरसाइज़ नहीं कर पाने के पीछे ये दलील देती हैं कि घर के काम करते-करते ही वो इतना थक जाती हैं कि उन्हें और ज़्यादा शारीरिक व्यायाम करने की ज़रूरत नहीं. लेकिन ऐसा सोचना बीमारियों को न्योता देने के बराबर है.

दिल्ली स्थित न्यूट्रीशियनिस्ट डॉ शालिनी सिंघल कहती हैं कि ज़्यादातर औरतों को यही लगता है कि वो जितना काम करती हैं एक्टिव रहने के लिए वो ही पर्याप्त है, लेकिन ऐसा नहीं है.

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वो कहती हैं "शहरी महिलाओं के इन-एक्टिव होने की आशंका गांव में रहने वाली महिलाओं से ज्यादा होती है. शहरों में भारी काम करने के लिए लोग नौकर रख लेते हैं और जो काम महिलाएं करती हैं उसमें पूरे शरीर का मूवमेंट नहीं होता है. जब तक पूरे शरीर का मूवमेंट न हो, दिल की धड़कन न बढ़े, उसे एक्टिविटी नहीं माना जा सकता."

क्या कहती है विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट?

विश्व स्वास्थ्य संगठन की नई रिपोर्ट भी इसी ओर इशारा करती है. ये रिपोर्ट लान्सेट ग्लोबल हेल्थ जर्नल ने पब्लिश किया गया है. ये रिपोर्ट कहती है कि क़रीब दुनिया में हर चार में से एक वयस्क उतना एक्टिव नहीं है, जितना उसे होना चाहिए. हालांकि कुछ देश ऐसे भी हैं जहां हर तीन में से एक शख़्स फ़िजिकली एक्टिव नहीं है.

रिपोर्ट में जो सबसे अधिक चौंकाने वाली बात ये है कि महिलाएं, पुरुषों की तुलना में कम सक्रिय हैं. एक तथ्य ये भी है कि मध्यम आय और कम आय वाले देश, संपन्न देशों की तुलना में अधिक एक्टिव हैं.

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गांवों में समलैंगिकों की ज़िंदगी ऐसी होती है

रिपोर्ट के मुताबिक़, इन-एक्टिव लोगों में दिल से जुड़ी बीमारियों के होने का ख़तरा बढ़ जाता है, डायबिटीज़ का ख़तरा बढ़ जाता है और कई बार कुछ तरह के कैंसर होने की आशंका भी बढ़ जाती है. स्टडी में कहा गया है कि अगर कोई शख़्स कम एक्टिव है तो इसका असर उसके दिमागी स्तर पर भी पड़ता है.

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में जहां 43 फ़ीसदी महिलाएं इन-एक्टिव हैं वहीं पुरुषों का प्रतिशत 23.5 फ़ीसदी है. कुवैत दुनिया का सबसे ज़्यादा इन-एक्टिव देश है जबकि यूगांडा सबसे एक्टिव मुल्क़ है.

ये रिपोर्ट 168 देशों में 358 सर्वे पर आधारित है.

शारीरिक रूप से सक्रिय होने का मतलब क्या है?

एनएचएस (नेशनल हेल्थ सर्वे) के अनुसार, फ़िज़िकल एक्टिविटी मतलब वो सबकुछ जिससे शरीर में मूवमेंट हो. लेकिन इसमें पूरे शरीर का मूवमेंट होना चाहिए. मसलन, तेज़ चलना, वॉटर एरोबिक्स, साइकिल चलाना, टेनिस खेलना फ़िज़िकल एक्टिविटी के तहत आता है.

एक वयस्क को सप्ताह में कम से कम 150 मिनट की मॉडरेट एरोबिक एक्सरसाइज़ करनी चाहिए. तभी उसे एक्टिव माना जाएगा. एरोबिक एक्सरसाइज़ करने से दिल की धड़कन बढ़ती है, सांस चढ़ती-उतरती है और शरीर में गर्माहट आती है और ये फ़िज़िकली एक्टिव होने का आधार है. शॉपिंग, खाना बनाना या घर के छोटे-मोटे कामों को फ़िज़िकल एक्टिविटी में नहीं रखा जा सकता है. लेकिन ऐसा नहीं है कि इससे फ़ायदा नहीं. इन एक्टिविटीज़ का फ़ायदा ये है कि इससे बॉडी मूवमेंट चेंज होता है.

किसे कितने मॉडरेट एरोबिक एक्सरसाइज़ की ज़रूरत ?

-5 से 18 साल तक के बच्चों के लिए हर दिन क़रीब 60 मिनट की फ़िजिकल एक्टिविटी ज़रूरी है.

-19 साल से 64 साल तक वयस्क के लिए हर सप्ताह 150 मिनट की मॉडरेट एरोबिक एक्सरसाइज़ ज़रूरी है.

-65 साल और उससे ऊपर के लिए 150 मिनट की मॉडरेट एरोबिक एक्सरसाइज़ और ताक़त के लिए सप्ताह में दो दिन की एक्सरसाइज़.

क्या है मॉडरेट एरोबिक एक्टिविटी?

तेज़ चलना, तैरना, साइकिल चलाना, टेनिस, हाइकिंग, स्केटबोर्डिंग, वॉलीबॉल और बास्केटबॉल को मॉडरेट एक्टिविटी एरोबिक्स के तहत गिना जाता है.

लेकिन इसका मतलब क्या है?

डॉक्टर शालिनी के अनुसार, मॉडरेट एरोबिक एक्सरसाइज़ से मतलब ऐसी शारीरिक क्रिया से है जिसे करने से दिल की धड़कन बढ़े, सांस की गति पर असर पड़े और शरीर में गर्माहट आए.

एक्सरसाइज़ करना क्यों है ज़रूरी ?

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एनएचएस की रिपोर्ट के अनुसार, जो लोग नियमित रूप से एक्सरसाइज़ करते हैं उनमें...

  • दिल का दौरा पड़ने और दिल से जुड़ी बीमारियों के होने का ख़तरा 35 फ़ीसदी तक कम हो जाता है.
  • ऐसे लोगों में टाइप-2 डायबिटीज़ होने का ख़तरा 50 फीसदी तक कम हो जाता है.
  • कोलोन या रेक्टल कैंसर होने का ख़तरा 50 फीसदी तक कम हो जाता है.
  • ब्रेस्ट कैंसर होने का ख़तरा 20 फीसदी तक कम हो जाता है.
  • असमय मौत का ख़तरा भी 30 प्रतिशत घट जाता है.
  • हड्डियों का रोग होने की आशंका 83 फ़ीसदी तक कम हो जाती है.
  • अवसाद का ख़तरा भी 30 फ़ीसदी तक कम हो जाता है.

लेकिन औरतें क्यों हैं कम एक्टिव?

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विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक़, महिलाएं पुरुषों की तुलना में कम एक्टिव होती हैं. जबकि आम धारणा ये है कि महिलाएं पुरुषों से ज़्यादा काम करती हैं.

स्टडी से जुड़े लोगों का मानना है कि इस नतीजे के पीछे बहुत से कारण हो सकते हैं. जैसे, घरों में बच्चे संभालने की ज़िम्मेदारी अमूमन मां की ही होती है. इसके अलावा सामाजिक परिवेश भी ऐसा नहीं होता है कि महिलाएं अपने एक्सरसाइज़ और फ़िज़िकल हेल्थ पर ध्यान दे पाएं.

ऐसे में उनका कम एक्टिव होना आश्चर्य की बात नहीं.

कम फ़िजिकल एक्टिविटी के ख़तरे

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विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट में भी इसका ज़िक्र है. वहीं डॉ. शालिनी का कहना है कि फ़िजिकली एक्टिव नहीं होना लाइफ़स्टाइल से जुड़ी एक बड़ी परेशानी है. अगर समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया जाए तो ये आगे चलकर कई बीमारियों का कारण बन सकता है.

-दिल से जुड़ी बीमारियों का ख़तरा

-डायबिटीज़

-मोटापा

-ब्लड-प्रेशर

-कोलेस्ट्रॉल की समस्या

-मांस-पेशियों में दर्द

काम करते-करते भी औरत कैसे बने फ़िज़िकल एक्टिव ?

डॉक्टर शालिनी कहती हैं कि भारतीय समाज के लिहाज़ से देखें तो महिलाओं के लिए ख़ुद के लिए वक़्त निकाल पाना मुश्किल होता है. ऐसे में थोड़ा स्मार्टली काम करने की ज़रूरत है. मसलन, अगर कोई महिला सब्ज़ी ख़रीदने जा रही है तो पैदल जाए. वॉशिंग मशीन में कपड़े धो रही है तो साथ ही में एक फ़ुटर रख ले और उस पर चढ़े उतरें.

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स्ट्रेच करने के लिए ज़्यादा वक़्त की ज़रूरत नहीं, उसे खाना बनाते समय भी किया जा सकता है.

बतौर डॉक्टर शालिनी एक बात और है जिस पर ध्यान देने की ज़रूरत है. शहरों में ज़्यादातर काम अब मशीनों की मदद से किया जाने लगा है. ऐसे में कोशिश करें कि मशीनों पर निर्भरता कम करें. आटा माड़ना एक अच्छी फ़िज़िकल एक्सरसाइज़ है, अब उसे मशीन से करके हम रोज़ाना की एक एक्टिविटी में कमी कर देते हैं.

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