नज़रियाः क्या मीडिया पीएम मोदी का महिमामंडन कर रहा है?

  • 10 सितंबर 2018
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अति सामान्यीकरण और पसंद या नापसंदगी की अधिकता में अक़्सर बारीकियां और विषमरेखीय वास्तविकताएं छिप जाती हैं, सामने होते हुए भी दिखती नहीं.

मेरे प्रिय लेखक, चिंतक शिव विश्वनाथन के लेख के साथ यह हो गया है दुर्भाग्य से.

मोदी और मीडिया पर विश्वनाथन के एकरेखीय, सपाट मूल्यांकन की सबसे बड़ी कमज़ोरी यह है कि वह समूचे भारतीय मीडिया को एक जैसा और एकीकृत कर के देख रहे हैं, उसकी विपुल विविधता का आभास भी उनकी दृष्टि में नहीं दिखता.

वह भारतीय मीडिया को ऐसी ठोस चीज़ मान कर चल रहे हैं जिसके सारे अवयव एक ही जैसा छाप रहे हैं, दिखा रहे हैं. केवल दिल्ली में रह कर, केवल दिल्ली के अख़बार और चैनल पढ़ने देखने से यह दृष्टि संकुचन अक़्सर और ज़्यादातर लोगों को हो जाता है. बस उनसे हम यह एकांगिता अपेक्षित नहीं करते.

पर सचमुच सारे मीडिया में निरपवाद रूप से मोदी महिमा का ऐसा निरूपण हो रहा है क्या?

शिव विश्वनाथन का लेखः 'कट्टर राष्ट्रवाद की धुन में मोदी पूजा में लगा मीडिया'

मीडिया में मोदी

अंग्रेज़ी के सबसे प्रतिष्ठित और बड़े अखबारों को ले लीजिए, टाइम्स ऑफ इंडिया को छोड़ कर हिन्दुस्तान टाइम्स, इंडियन एक्सप्रेस, द हिन्दू, द टेलिग्राफ सही मुद्दों पर मोदी को तिलमिला देने वाली आलोचना करते हैं.

टेलिग्राफ और एक्सप्रेस तो अक़्सर ऐसी की तैसी वाले अंदाज़ अपना लेते हैं. टेलिग्राफ कई बार आलोचना से आगे बढ़ कर विरोध की पत्रकारीय अतिवादिता तक पहुंच जाता है.

हिन्दी में जागरण को छोड़ कर अमर उजाला, दैनिक हिन्दुस्तान, राजस्थान पत्रिका, प्रभात खबर, भास्कर काफ़ी हद तक संतुलित रहते हैं. मोदी का महिमामंडन नहीं करते. राजस्थान पत्रिका तो ताल ठोक कर मोदी-भाजपा-वसुन्धरा आलोचना कर रहा है.

यह सच है कि चैनलों में कुछ तो सचमुच निर्लज्जता की हद तक मोदी भक्ति और विपक्ष-विरोध में जुटे हैं. हिन्दी अंग्रेजी दोनों में. पर तटस्थ और आलोचक भी हैं, दोनों ही भाषाओं में.

एक तरफ राष्ट्रवाद की सरिता बहती रहती है दूसरी ओर शुद्ध विरोध की. इन दो अतियों के बीच वाले भी हैं.

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क्षेत्रीय मीडिया का हाल

पिछले कुछ सालों में अपनी एक अलग जगह और धमक बना चुके कई ऑनलाइन समाचार-विचार मंचों में तो प्रमुखता मोदी-भाजपा विरोधी स्वरों की ही है. अंग्रेज़ी में खूब तीखी.

उसकी काट के लिए कई राष्ट्रवादी मंच भी उभरे हैं पर वह प्रभाव और प्रसार नहीं हासिल कर पाए हैं. ये ऑनलाइन मंच अपने तीखेपन, मौलिकता, निडरता, विविधता और बौद्धिकता में कई बार अपने प्रिंट साथियों से आगे दिखते हैं.

लेकिन ये सब मुख्यतः राजधानी दिल्ली या कुछ प्रमुख शहरों से निकलने वाले मीडिया की बात है वह भी हिन्दी और अंग्रेजी में.

पर व्यापक भारतीय मीडिया तो सारे राज्यों में, उनकी दर्जनों भाषाओं में है. अपनी दिल्ली-केन्द्रित दृष्टि के कारण हमारा ध्यान उन पर लगभग नहीं जाता. क्षेत्रीय अखबारों और समाचार चैनलों की संपादकीय भूमिका और रुख हमेशा से प्रदेश सरकारों के ज़्यादा ख़िलाफ़ ना जाते हुए, उनसे मिल कर चलने का ही रहा है.

अपवाद सब जगह हैं, यहां भी हैं. केन्द्र सरकार, केन्द्रीय सत्तारूढ़ पार्टी उनके लिए तब तक दोयम दर्ज़े का महत्व रखते हैं जब तक उनके अपने-अपने प्रदेशों से संबंधित बात न हो.

यह ठीक है कि आज बीस से ज़्यादा राज्यों में भाजपा-एनडीए सरकारें हैं इसलिए वहां का मीडिया इस असलियत को प्रतिबिम्बित करता है. केन्द्र-राज्य दोनों जगह एक पार्टी का होना उनके मुख्यमंत्री-मोदी-भाजपा-एनडीए समीकरण से प्रभावित होने को लगभग अनिवार्य सा बना देता है.

ये स्थितियां किसी भी लोकतंत्र के लिए आदर्श नहीं हैं. लेकिन भारतीय मीडिया के चरित्र की ज़मीनी वास्तविकता यही रही है एक लंबे समय से.

अपने जमाने में कांग्रेस ने इसका फ़ायदा उठाया, अब भाजपा उठा रही है.

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Image caption क्षेत्रीय समाचार पत्र

जहां भाजपा सरकार नहीं

लेकिन इसका यह भी मतलब है कि बंगाल में ममता बनर्जी के उग्र रवैए, तेलंगाना में केसीआर, आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, पंजाब आदि में आप मोदी की गोदी में बैठे होने का आरोप वहां के बहुसंख्यक मीडिया पर नहीं लगा पाएंगे.

उनका रुख़ अपनी सत्तारूढ़ पार्टी और मुख्यमंत्री के मन के मुताबिक रहता है. जब बिहार में नीतीश भाजपा विरोधी गठबंधन में रह कर सरकार चला रहे थे उस समय भी मीडिया को बेहद सख्ती से नियंत्रण में रखने के आरोप उन पर लग ही रहे थे. आज वही नियंत्रण और दबाव एनडीए के पक्ष में है.

बंगाल मीडिया का भी कुछ अपवादों को छोड़ कर यही हाल है. लेकिन चूंकि इस विराट क्षेत्रीय मीडिया के संपादकीय रुखों और भूमिकाओं का हमें ठीक से पता नहीं चलता इसलिए हमारी विचारों-विश्लेषण से भी यह विशाल विविधता गायब रहती है.

यह सच है कि मनमोहन सिंह सरकार के दस साल के कार्यकाल में मीडिया के कई हिस्से ऐसे मनमोहन या कांग्रेस भक्ति में नहीं लगे थे जैसे आज मोदी भक्ति में लगे हैं.

हालांकि यह याद रखना भी ज़रूरी है कि उन दस सालों में राहुल गांधी को देश और कांग्रेस के प्रखरतम राजनीतिक नायक, उद्धारक के रूप में स्थापित करने के कितने प्रबल मीडिया प्रयास हुए थे.

यह भी याद रखना उतना ही ज़रूरी है कि वे ही दिन थे जब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हत्यारा, सांप्रदायिक आदि कहने, दिखाने के अभियान में देश के प्रमुखतम मीडिया संस्थान जम कर शामिल थे.

क्या किसी मुख्यमंत्री या भारतीय राजनीतिज्ञ को इतने लंबे, इतने ज़बरदस्त, इतने सघन विरोध और छविहनन को झेलना पड़ा है जितना मोदी को? नहीं.

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मोदी के पक्ष में कैसे जुटा मीडिया?

जैसा अभूतपूर्व वह छविहनन अभियान था उतना ही वह जनसमर्थन रहा है जिसने मोदी को एक आंधी बना कर प्रधानमंत्री बना दिया. इसलिए यह कहना कि मोदी को मीडिया ने बनाया है मज़ाक है.

मीडिया के बड़े हिस्सों का मोदी के पक्ष में जुटना तब हुआ जब प्रचार अभियान के दौरान उनको मिल रहे ऐतिहासिक समर्थन और स्वीकार्यता की अप्रत्याशित लहर का एहसास होना शुरू हुआ.

वह लहर मोदी और शाह की रणनीति, चुनावी तैयारी, विराट संसाधनों और टेक्नोलॉजी के कभी न देखे गए इस्तेमाल और सबसे ज़्यादा मोदी की अपनी ऊर्जावान, मौलिक वक्तृता और नए सपने दिखाने की कला से पैदा हुई थी. मीडिया इस गाड़ी में बाद में सवार हुआ.

शिव कहते हैं, दो दशक पहले मोदी पूरी तरह एक अफ़वाह थे. यह अद्भुत स्थापना है. सच यह है कि दो दशक पहले वह भारतीय जनता पार्टी के एक कार्यकर्ता थे जो बाद में महासचिव बने.

उनका गुजरात जाना, मुख्यमंत्री बनना किसी सोची समझी योजना के तहत नहीं भाजपा और गुजरात के भीतर उस समय की परिस्थितियों ने अचानक संभव कर दिया. वह अफ़वाह नहीं कभी-कबार मीडिया में आने वाले एक पार्टी नेता थे, बस.

मुख्यमंत्री बनने के तुरंत बाद गोधरा और गुजरात दंगों में मोदी की छवि मीडिया ने एक आइकन या आदर्श नहीं इसके बिलकुल उलट एक भयानक खलनायक की बनाई थी.

इस अभूतपूर्व रूप से नकारात्मक मीडिया छवि से लड़ कर, उसे हरा कर मोदी सत्ता के शिखर पर पहुंचे. मोदी मीडिया के खोजे और बनाए हुए नहीं थे तब, मीडिया के मारे हुए थे.

आज चार साल बाद स्थिति कुछ दृष्टियों से उलट गई लगती है. शिव को अभी सिर्फ़ वही दिख रही है.

जैसा ,मैं ऊपर कह चुका हूं, आज का सच सचमुच यह है कि तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया का एक प्रभावशाली हिस्सा मोदी-महिमा में शामिल है. किन्तु एक हिस्सा, पूरा नहीं. यह हिस्सा अनालोचक हो गया है. पर यह कहना कि पूरा मीडिया ऐसा हो गया है, वैचारिक अतिवादिता है और अधूरी बात है.

शिव की शिकायतें जायज़ भी हैं. नोटबंदी पर मीडिया तथ्यपरक नहीं रहा कुछ को छोड़ कर. लेकिन उस समय लगभग पूरा देश, खासतौर पर मध्यम वर्ग और खुद मोदी तथा उनकी सरकार भी नोटबंदी की अच्छाईयों के सपनों से अभिभूत थे.

वह एक अत्यंत गंभीर गलती थी, मिसकैलकुलेशन था. पर सबको यह तो दिख रहा था कि मोदी ने एक भारी राजनीतिक जोखिम उठा कर यह कदम उठाया था. वह पूरी तरह नाकाम रहा, लेकिन इसने मोदी को बड़े, क्रांतिकारी किस्म के, देशहित में कड़े और अलोकप्रिय कदम उठाने की क्षमता वाले नेता के रूप में स्थापित किया.

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विदेश नीति में मोदी पर शिव की एक टिप्पणी गौरतलब है जो चकित करती है. मोदी के शिंजो आबे, पुतिन, ट्रंप के साथ दोस्ताना तस्वीरें खिंचवाने और इनसे लोगों को मोह लेने का आरोप लगाते समय शिव कहते हैं - मीडिया इन चार देशों के नैतिक खालीपन को देखना भूल जाता है.

क्या शिव जैसे गंभीर, वरिष्ठ चिंतक यह नहीं जानते कि असली राजनय में नैतिकता हमेशा, और हर देश के लिए, एक औपचारिकता के अलावा कुछ नहीं होती. उसपर देशहित का राजनय नहीं होता न हो सकता है.

विदेश मामलों में केवल देशहित सर्वोपरि होता है और यह देशहित नैतिक नहीं आर्थिक, सैनिक या रणनीतिक होता है।

लेकिन एक बात जो अपनी मीडिया आलोचना में शिव ने नहीं कही वह मैं कहना चाहता हूं. यह दुखद है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी प्रेस कांफ्रेंस नहीं करते. चार साल में एक भी नहीं. मीडिया को दूर रखते हैं. यह गलत है.

उन्हें करनी चाहिए सभी लोकतांत्रिक प्रधानमंत्रियों, राष्ट्रपतियों की तरह. लेकिन अगर भारतीय मीडिया सचमुच उतना ही ठोस रूप से मोदी भक्त होता तो क्या मोदी उससे कतराते?

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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