बिहार में क्यों वायरल हो रहे हैं औरतों से अपराध के वीडियो?

  • 9 सितंबर 2018
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"इन रेड लाइट एरिया वालों की रंगबाज़ी (दादागिरी) बहुत ज्यादा है. उनको सबक सिखाने के लिए ही उस औरत के साथ ऐसा किया गया."

बीते एक सितंबर को भुवनेश्वर से पटना लौट रही अंत्योदय एग्जाम स्पेशल ट्रेन में सवार राहुल ने मुझसे ये बात कही. रेलवे की परीक्षा देकर लौट रहे राहुल आरा के बिहारी मिल इलाके में रहते हैं.

राहुल जिस घटना की बात कर रहे हैं वो आरा के बिहिया ब्लॉक में बीते 20 अगस्त को घटी थी. यहां एक औरत को हत्या के शक में भीड़ ने सड़क पर नग्न करके घुमाया था.

आरा और वैशाली के रेलवे परीक्षार्थियों से खचाखच भरी इस ट्रेन में लगातार नौजवान लड़के शरारत कर रहे है. वे रुक-रुक कर नारे लगा रहे हैं- "आरा ज़िला घर बा, त कौन बात के डर बा."

उनके नारों के शोर के चलते कई लोकल यात्री जो परिवार के साथ ट्रेन पर सवार हुए, वो बीच स्टेशन पर ही उतर गए. इन नारे लगाने वालों में बिहिया का मंटू भी है.

मंटू कहता है," ये वीडियो वायरल ग़लत होता है. हम संस्कारी लोग है, हम लोगों को ख़ुद ये सब देखकर अच्छा नहीं लगता. "

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अप्रैल 2018 में जहानाबाद में एक लड़की से छेड़खानी का वीडियो वायरल हुआ था जिसके बाद राज्य के अलग अलग हिस्सों में ऐसी घटनाएं सामने आईं. स्थानीय मीडिया की रिपोर्टिंग के मुताबिक कैमूर, नालंदा, सहरसा, मधुबनी, गया, सहरसा में ऐसे वीडियो वायरल हुए. इसके अलावा आरा के बिहिया की घटना भी है.

बिहार में साइबर सेल के एएसपी सुशील कुमार कहते हैं, "अपराध में उछाल से ज़्यादा ये मामला अपलोडिंग का है. वीडियो बनाकर उसे इंटरनेट पर अपलोड करना नया ट्रेंड है. सरकार इससे निपटने के लिए तत्पर है. थाना, अनुमंडल और जिला स्तर पर 'साइबर सेनानी' बनाए जा रहे हैं जो सोशल मीडिया सहित अन्य साइबर अपराध पर लगाम लगाएगें."

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इसके अलावा गृह मंत्रालय ने cybercrime.gov.in नाम का वेब पोर्टल भी शुरू किया है. निर्भया फंड का इस्तेमाल करके शुरू किया गया यह वेब पोर्टल महिलाओं और बच्चों से जुड़े यौन शोषण पर काम करता है.

इस वेब पोर्टल पर आप अपनी पहचान छिपाकर भी वीडियो अपलोड करके उससे संबंधित जानकारी दे सकते हैं. दी गई जानकारी के आधार पर संबंधित राज्य को ये शिकायत भेजी जाती है जिसको 24 घंटे के अंदर ही शिकायत पर काम करना होता है.

सुशील कुमार बताते हैं, "जून 2018 से बिहार भी इस वेब पोर्टल से जुडा है और अब तक चार शिकायतें आ चुकी है. साइबर अपराध एक सामाजिक चुनौती भी है इसलिए लोग भी सहयोग करें."

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दूसरे विश्व युद्ध का संदर्भ

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लेकिन प्रशासनिक क़दम से इतर ये सवाल लाजिमी है कि इस नए ट्रेंड की वजह क्या है?

वरिष्ठ पत्रकार एस ए शाद कहते है, "दूसरे विश्व युद्ध के वक़्त फासिस्ट ताक़तें अपराध करती थीं, उस अपराध का आनंद लेती थीं और प्रचारित भी करती थीं. ठीक यही बिहार में देखने को मिल रहा है. हालांकि ये अपराध संगठित न होकर स्पानटेनियटी में हो रहे है. बिहार में पहले ये यूपी की सीमा से लगे इलाकों में छिटपुट तौर पर देखने को मिला लेकिन अब ये फैल रहा है."

एक दूसरी वजह सहरसा के स्थानीय पत्रकार ब्रजेश कुमार बताते है. सहरसा में भी अभी हाल में एक वीडियो वायरल हुआ है जिसमें साइकिल से जा रही एक छात्रा के साथ छेड़खानी करते कुछ लड़के और एक छात्रों को बचाता लड़का दिखाई दे रहा है.

ब्रजेश कहते है, "पहले 14 -15 साल के लड़के गांव कस्बे में खुली मोबाइल दुकान से 10 रुपए में अश्लील वीडियो अपलोड करवाते थे, अब तो डेटा वॉर से डेटा सस्ते होने के चलते अश्लील वीडियो उनके मोबाइल में उपलब्ध है. अब वो खुद वीडियो बना रहे है और उसके ज़रिए ब्लैकमेलिंग, किसी को बेइज्जत करते हैं."

हालांकि बिहार के सामंती समाज में इस वायरल वीडियो का जातीय ढांचा क्या है, इससे जुड़ी बातें निकलकर आना बाक़ी है.

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वीडियो वायरल का मनोविज्ञान

यहां ये सवाल ज़रूरी है कि बीती अप्रैल में जहानाबाद वायरल वीडियो में पुलिस की त्वरित कार्रवाई के बावजूद लोगों में डर क्यों नहीं है?

इसका जवाब देते हुए इंडियन साइकैट्रिक सोसाइटी के महासचिव और मनोवेद पत्रिका के संपादक डॉ. विनय कुमार मोटे तौर पर इसकी तीन वजह बताते हैं. वो कहते हैं, "मनोरोगी व्यक्तित्व वालों के लिए ऐसे वीडियो प्रेरणा का काम करते हैं. जब कभी ऐसे वीडियो वायरल होते है तो एक तरह की सीमा रेखा पर खड़े इन लोगों के लिए वैसा ही वीडियो बनाने की प्रेरणा है. आप इसे चोटी कटवा, ब्लेड मारने वाले की अफवाह और घटनाओं से भी समझ सकते है."

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Image caption बिहार में महिला सुरक्षा को लेकर विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं

वो आगे बताते है, "वैश्वीकरण और इंटरनेट ने पोर्न तक सबकी पहुंच बना दी है. और ये पोर्नोग्राफ़ी हमारे अंदर एक खास तरह की असंवेदनशीलता लाती है. जिसके चलते हमारे लिए किसी लड़की के साथ ऐसा व्यवहार करना कोई बड़ी बात नहीं है. तीसरा ये एक परपीड़क व्यवहार है यानी दूसरे की पीड़ा में खुश होने वाला और इसमें अगर कहीं से लड़की का संबंध जुड़ जाए तो ये इरॉटिक या उत्तेजक हो जाता है."

गौरतलब है कि साइबर स्पेस में लोगों के बढ़ते ग़लत व्यवहार के चलते इंडियन साइकैट्रिक सोसाइटी ने 'साइबर साइकोलाजी और मेंटल हेल्थ' नाम की एक कमिटी बनाई है. फरवरी 2018 में गठित मनोचिकित्सकों की ये कमिटी लोगों के साइबर व्यवहार का अध्ययन करेगी.

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डॉ. विनय कुमार कहते हैं कि स्कूल में साइबर स्पेस को ही पाठ्यक्रम के तौर पर शामिल करना होगा. वही पत्रकार एस ए शाद कहते हैं, "ये मर्दानगी का प्रदर्शन है और इसे रोकने के लिए सिर्फ़ पुलिसिंग ही नहीं बल्कि समाज के सभी पक्षों को शामिल होना होगा. सरकार जितनी जल्दी इस नज़रिए से काम करें, उतना अच्छा."

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