BBC SPECIAL: कम्युनिस्ट पार्टियों की लीडरशिप में कहां है दलित?

  • 10 सितंबर 2018
सीताराम येचुरी इमेज कॉपीरइट Getty Images

भारत में अगले साल आम चुनाव होने वाले हैं. इससे पहले पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव भी हैं. देश में तमाम विपक्षी दल के ज़रिए एक महागठबंधन बनाने की बात हो रही है. इन विपक्षी दलों में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) भी अहम हिस्सा है.

पिछले कुछ वक़्त से वामपंथी संगठनों के लाल झंडे के साथ दलित संगठनों का नीला रंग भी शामिल हो गया है और एक नारा उभर कर आया 'जय भीम लाल सलाम', तो क्या अब सीपीआई (एम) दलितों के मुद्दों के साथ आगे बढ़ने वाली है और आगामी चुनावों से पहले उनकी क्या रणनीतियां हैं?

सीपीआई (एम) के महासचिव सीताराम येचुरी से पूरा साक्षात्कार यहां पढ़िए.

सवालः जो उम्मीद मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से लोगों को है, उसे पूरा करने के लिए अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव को मद्देनज़र रखते हुए पार्टी का क्या रोडमैप है?

साल 2019 के चुनाव में हमें दो मुख्य चुनौतियों का सामना करना है और उनका जवाब देना है. पहला देश की एकता और अखंडता पर सांप्रदायिक ताक़तें जिस तरह से हमला कर रही हैं, उससे देश को बचाना बेहद ज़रूरी है.

दूसरा यह कि जिस तरह की आर्थिक नीतियां मोदी सरकार लागू कर रही है, उससे लोग परेशान हैं. हमारे अन्नदाता, देश के किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं. नौजवानों के लिए हर साल दो करोड़ नौकरियों का वादा किया था, लेकिन अब तो उल्टे लोगों के हाथों से नौकरियां जा रही हैं.

सवालः मैं आपके रोडमैप की बात कर रहा हूं, आप राष्ट्रीय एकता अखंडता की बात कर रहे हैं, यह नारा तो राजीव गांधी ने भी दिया था इंदिरा गांधी की हत्या के बाद. तो आने वाले चुनाव में आपके पास नया क्या है?

नए-पुराने की बात नहीं है. दरअसल आज के दिन देश में गरीब, दलित, अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं है. इसके लिए वैकल्पिक रास्ता चाहिए, वैकल्पिक नातियां चाहिए. इसलिए हमारा नारा है कि 'देश को नेता नहीं नीतियां चाहिए'.

इसके लिए मौजूदा सरकार को हटाना ज़रूरी है. हमारी पार्टी ने तय किया कि इस चुनाव में देश में हर जगह से सांप्रदायिक ताक़तों के ख़िलाफ़ वोट को बंटने से बचाना है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

सवालः अगर पश्चिम बंगाल की बात करें तो वहां आपके विधायकों की संख्या 44 से 5 पर आ गई. वहां आपका जो कैडर है, गांव के गांव बीजेपी में शामिल हो रहे हैं, इसको कैसे रोकेंगे.

पश्चिम बंगाल में हमारे सामने बहुत ही गंभीर समस्या है. वहां हमारे 200 कॉमरेडों की हत्याएं हुई हैं. ये बिलकुल ग़लत ख़बर है कि गांव के गांव छोड़कर बीजेपी में जा रहे हैं. वहां पर लाखों वामपंथी लोग हैं जो कार्यरत हैं.

सवालः जब आपको दो तिहाई बहुमत मिलता है पश्चिम बंगाल में, उस वक्त आपके मुख्यमंत्री ऑन रिकॉर्ड टेलीविज़न इंटरव्यू में कहते हैं, कैपिटलिज़्म इज़ द ओनली वे आउट('CAPITALISM IS THE ONLY WAY OUT') तो फिर ग़लती कहां हो गई?

इसके बारे में पार्टी ने भी उनकी आलोचना की. ये पार्टी की राय नहीं है. ज़रूर, एक पूंजीवादी व्यवस्था में देश है, और देश का एक हिस्सा बंगाल भी है.

लेकिन उसी पूंजीवादी व्यवस्था के विकल्प में वैकल्पिक नीतियां जो लागू की हैं, वहीं बंगाल में ख़ासियत रही. फिर चाहे भूमि-सुधार की बात हो, पंचायती राज की बात हो. ये सब बातों को छोड़कर सिर्फ़ पूंजीवाद ही एकमात्र समाधान और रास्ता है. इसकी आलोचना पार्टी ने की है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

सवालः कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं के बारे में एक ऐसी धारणा है कि वे जनता से सीधा कनेक्ट नहीं कर पाते, जनता की ज़ुबान में नहीं बोलते हैं. जिस तरह नरेंद्र मोदी, अरविंद केजरीवाल या मायावती बात करते हैं उसके मुक़ाबले आपका बात करने का तरीका सेमिनार सरीखा होता है. ऐसी आपकी आलोचना होती है. क्या इस पर कभी चर्चा होती है?

यह एक तरह का दुष्प्रचार है. कुछ दिन पहले दिल्ली में लाखों किसान मज़दूर आए हैं वो किससे प्रोत्साहित होकर आए हैं...

सवालः लेकिन यह समर्थन फिर वोट में तब्दील क्यों नहीं होता?

(हंसते हुए) यह सवाल तो पार्टी के अंदर भी सबसे बड़ा चर्चा का मुद्दा है. देश के अंदर वर्ग संघर्ष दो टांगों पर टिका हुआ है. एक है आपका आर्थिक शोषण दूसरा है सामाजिक शोषण. अब सिर्फ एक टांग को लेकर आर्थिक शोषण को लेकर आप दौड़ने की कोशिश करेंगे तो चल भी नहीं पाएंगे.

जब तक सामाजिक शोषण का जो संघर्ष है, उसे आर्थिक शोषण के संघर्षों के साथ नहीं जोड़ेंगे तो यही विरोधाभाष फ़िलहाल नज़र आता है.

पहले नारा होता था कि जिस भी फ़ैक्ट्री से धुंआ निकलता हुए दिखे तो उसके गेट पर लाल झंडा लहराना चाहिए. अब हमारा कहना है कि यह तो होना ही चाहिए, इसके साथ हर गांव में जिस कुएं से दलितों और पिछड़ों को पानी नहीं पीने देते, उस कुएं के ऊपर भी लाल झंडा नहीं लहराएगा, यह भरोसा नहीं आएगा.

इसी विरोधाभाष को हम भी समझने की कोशिश कर रहे हैं, लोग लाखों की संख्या में संघर्ष करने आते हैं, लाठी खाते हैं, जेल जाते हैं लेकिन जब वोट का समय आता है, तब अपनी सामाजिक समझ के आधार पर बंट जाते हैं.

सवालः पिछले चुनाव में बीजेपी को दलितों के वोट बैंक का 24 प्रतिशत वोट मिलाऔर दलित समाज कम्युनिस्ट पार्टियों को थोड़ा शक़ की निगाह से देखता है. कम्युनिस्ट पार्टियों में कितने दलित और दूसरी जातियों के लोग नेतृत्व करने वाले क़द तक पहुंच पाए?

ये आरोप ग़लत हैं. हालांकि अगर ऊपरी स्तर पर देखें तो दलितों का प्रतिनिधित्व जितना होना चाहिए उतना नहीं है. ये मैं भी मानता हूं, और इसको दुरुस्त करने की ज़रूरत है. वो हमारी प्राथमिकता भी है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

सवालः भले ही आपको पसंद ना आए, लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी दलित पक्ष की पार्टी ये आपने अब कहना शुरू किया है. जब कन्हैया कुमार ने जेएनयू में 'लाल सलाम, जय भीम' कहना शुरू किया तब ये बातें आनी शुरू हुई. लेकिन सवाल यही है कि कम्युनिस्ट पार्टियों में दलितों का नेतृत्व कहां है?

कन्हैया कुमार से पहले भी यह नारा आ रहा था कि 'लाल झंडा-नीला झंडा, जय भीम लाल सलाम'...

सवालः यह तो कांशीराम के उद्भव के बाद की चीज़ है उससे पहले यह नहीं था.

बिलकुल, राजनीति के अंदर यह उसी समय उभर कर आई जब बहुजन समाज पार्टी उभर कर आई और कांशीराम जी ने उसे आगे बढ़ाया, यह बात बिलकुल ठीक है.

लेकिन दलित आंदोलन और वामपंथी आंदोलनों के बीच संबंध की बात आज की नहीं बल्कि बहुत पुरानी है. हां, वामपंथी और दलित नेताओं के बीच मतभेद भी हुए हैं. लेकिन यह कहना कि वामपंथी दलित विरोधी हैं, यह कहना ग़लत है.

सवालः दलित विरोधी नहीं, वामपंथी की छवि दलितपक्षीय नहीं हैं, जैसे बीएसपी सीधे-सीधे दलितों की बात करती है. अब बीजेपी ने भी कई दलित नेताओं के साथ संबंध बनाए और वो सरकार में भी हैं. जबकि आपकी पूरी रवायत से ही दलित ग़ायब हैं?

जो दलित संगठन हैं, जो दलितों की बात करते हैं, वो हमें भी अपने कार्यक्रमों में आमंत्रित करते हैं, यह बदलाव तो आ रहा है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

सवालः 1925 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया बनी थी और इसी साल राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ भी बना था. आरएसएस ने खुद को गांव-गांव तक पहुंचाया, तमाम संगठन हैं जो उनके तहत काम करते हैं. एक ज़माने में कम्युनिस्ट पार्टी के भी ऐसे कुछ सांस्कृतिक संगठन थे जैसे इप्टा था. आख़िर आप लोग कहां रास्ता भटक गए?

आरएसएस और उसका जो राजनीतिक अंग है बीजेपी, वो तभी बहुत ज़्यादा प्रभावी दिखते हैं जब सत्ता में होते हैं. जब ये सत्ता में नहीं होते हैं, जैसे जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं थे और गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने कहा था कि आरएसएस का सबसे बड़ा संगठन केरल में है, वहां आप देखिए क्या हाल हो रहा है राजनीति में. इस तरह की पार्टियों को सत्ता में रहने का फ़ायदा होता है.

सवालः यूपीए 1 की सरकार के वक्त आपकी पार्टी ने भारत-अमरीका के बीच हुए परमाणु समझौते के मुद्दे पर सरकार से खुद को हटा लिया था, उस फ़ैसले को आप आज कैसे देखते हैं.

यूपीए सरकार को हमने एक न्यूनतम कार्यक्रम के आधार पर समर्थन दिया था, ये मुद्दा उस कार्यक्रम का हिस्सा था ही नहीं. हालांकि बाद में हमारी पार्टी ने भी अपनी गलतियों और कमज़ोरियों को पहचाना. अब वो तो इतिहास का हिस्सा बन गया है.

लोगों को यह लगने लगा कि वामपंथी पार्टी के हटने की वजह से यूपीए सरकार कमज़ोर हो गई.

सवालः प्रकाश करात के नेतृत्व ने पार्टी को बहुत पीछे कर दिया, क्या कभी इस पर मंथन हुआ?

हमारी पार्टी में कभी एक व्यक्ति के ऊपर पूरी ग़लती की ज़िम्मेदारी नहीं डाली जाती. जो भी निर्णय होते हैं वह सामूहिक तौर पर लिए जाते हैं. जो भी निर्णय ग़लत होते हैं तो सामूहिक रूप से ही कहा जाता है कि यह ग़लत हो गया.

यूपीए 1 से समर्थन वापस लेने वाला ही उदाहरण है तो उसमें हमने पाया की सात जगह हमसे ग़लती हुई.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

सवालः क्या कांग्रेस के साथ गठबंधन बनाएंगे?

कांग्रेस के साथ गठबंधन राज्य के अनुसार तय होगा. देश के स्तर पर देखें तो कभी भी कोई महागठबंधन पहले से तय नहीं होता. आज तक जितनी भी गठबंधन सरकारें बनी हैं, वो चुनाव के बाद ही बने.

इस तरह जो भी गठबंधन होगा वो 2019 चुनाव के बाद बनेगा, बस अभी यह तय किया जाए कि बीजेपी के ख़िलाफ़ वोटों का बंटवारा कम से कम हो.

सवालः आज के ज़माने में भी सोशल मीडिया में आपलोगों की मौजूदगी बहुत ही कम है, जबकि दूसरी तरफ बीजेपी को देखेंया दूसरी पार्टियों और नेताओं को देखें तो वे सोशल मीडिया पर बहुत अधिक एक्टिव रहते हैं. डोनल्ड ट्रंप ट्विटर के ज़रिए विदेश नीतियां तय करते हैं. यह आपकी आलोचना है कि आपका मीडिया सेल नहीं है?

हमारा सोशल मीडिया सेल है, हर एक राज्य में अलग-अलग सोशल मीडिया सेल चल रहे हैं. हां, बीजेपी के मुकाबले उतना मज़बूत सोशल मीडिया नहीं है. लेकिन यह भी तो है कि अगर कोई अमरीका का राष्ट्रपति या भारत का प्रधानमंत्री होगा तो उसकी ट्विटर फॉलोइंग भी तो ज़्यादा होगी.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

सवालः नरेंद्र मोदी हमेशा खुद ट्वीट नहीं करते, उनकी पार्टी में भी अलग-अलग स्तर पर सोशल मीडिया को संभाला जाता है और हिंदुत्व के एजेंडे को बढ़ाया जाता है. आप लोग अगर जय भीम लाल सलाम कह रहे हैं तो उसको बढ़ाने के लिए ट्विटर या फ़ेसबुक पर कहां प्लैटफ़ॉर्म है?

आप मेरे फ़ेसबुक या ट्विटर पर जाइए, पार्टी के फ़ेसबुक ट्विटर को देखिए वहां ये सब है. हां, एक नेटवर्क बनाने पर विचार कर रहे हैं...

सवालः इंस्टाग्राम...स्नैपचैट के बारे में सोचते हैं?

(हंसते हुए) पहले व्हाट्सएप की ही नेटवर्किंग तो कर लें, जिसके अंदर हम लगे हुए हैं और जल्द ही आपको इसमें सुधार दिखेगा. हालांकि मैं यह मानता हूं कि बाक़ी पार्टियों के मुक़ाबले हमारी सोशल मीडिया में कमजोरी है लेकिन जल्दी ही वह दुरुस्त हो रही है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए