नज़रियाः 2019 के चुनावी समर के लिए मोदी-शाह के दिमाग़ में क्या

  • 10 सितंबर 2018
नरेंद्र मोदी, अमित शाह और लालकृष्ण आडवाणी इमेज कॉपीरइट BJP TWITTER

भाजपा की दिल्ली में हुई दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने विदाई भाषण के साथ एक तरह से 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों का शंखनाद कर दिया.

इसके साथ ही बीजेपी अब पूरी तरह से चुनाव अभियान के मूड में उतर जाएगी.

राष्ट्रीय कार्यकारिणी से यह सीधा संदेश दे दिया गया कि पूरी तरह से कांग्रेस पर निशाना साधा जाएगा और राजनीतिक रणनीतियों के तौर पर चुनावों में आक्रामक रुख बरकरार रखा जाएगा.

इसका उदाहरण भी हमें इसी बैठक में देखने को मिला जब बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने कांग्रेस पर हमलावर रुख़ अख़्तियार करते हुए विशेष रूप से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और देश के वित्त मंत्री और गृह मंत्री रहे पी.चिंदबरम को निशाने पर लिया.

इस मामले में चिंदबरम को विशेष तौर पर इसलिए सामने रखा गया क्योंकि उनकी छवि एक अंग्रेज़ी बोलने वाले और सभ्रांत वर्ग से आने वाले व्यक्ति के रूप में है.

इस वर्ग को आमतौर पर मोदी के ख़िलाफ़ समझा जाता है. चिंदबरम की पृष्ठभूमि में ही अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा भी शामिल हो जाते हैं.

अमित शाह ने एकबार फिर साफ़ कर दिया कि उनकी पार्टी का ट्रंम्प कार्ड मोदी और उनका चमत्कारिक नेतृत्व है.

पार्टी के नेतृत्व में किसी तरह के बदलाव की क्षणिक आशंकाओं को भी उन्होंने अपने इस बयान के साथ दूर कर दिया.

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मोदी और शाह के हाथों में चुनाव की कमान

कार्यकारिणी में यह भी साफ़ हो गया कि 2019 के चुनाव में बीजेपी के चाणक्य और रणनीतिकार अमित शाह ही रहेंगे. यह साफ़ संकेत है कि इन चुनावों में बीजेपी एक पूरी तरह से तैयार सेना के तौर पर उतरेगी जिसकी कमान मोदी और शाह संभालेंगे.

पिछले कुछ सालों में मोदी और शाह ने अपने नेतृत्व से पार्टी कैडर को अपनी अजेय छवि का साफ़ संदेश दिया है.

यही रणनीति थी जिसके दम पर नरेंद्र मोदी ने साल 2001 से 2014 तक गुजरात में राज किया.

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दिल्ली में हुई बैठक के साथ अमित शाह ने पार्टी कार्यकर्ताओं को इस बात के लिए आश्वस्त किया कि वे विपक्ष की बातों में ना आएं और इतना यक़ीन रखें कि जीत उनकी ही होगी.

कार्यकारिणी के अंतिम दिन शाम को जब मोदी ने बैठक को संबोधित किया तो उन्होंने भी अपने भाषण से पार्टी के अजेय होने के संदेश को ही सबके सामने रखा.

'अजेय भारत और अटल बीजेपी' यह नारा बहुत-ही ध्यान रखकर गढ़ा गया है जिससे भारत में बीजेपी की पहचान को बताया जा सके.

यह नारा शाइनिंग इंडिया की तरह नहीं है जिसमें एक तरह का घमंड और अहंकार छिपा हुआ था. 'अजेय भारत और अटल बीजेपी' का नारा एक धर्मनिरपेक्ष नारा लगता है जिसमें राष्ट्रीयता का पुट भी छिपा हुआ है साथ ही संघ परिवार की विचारधारा भी देखने को मिलती है.

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जोश भरने की कोशिश

निश्चित तौर पर यह बैठक पार्टी के कार्यकर्ताओं के लिए एक संदेश था, आने वाले चुनावों से पहले उनमें जोश भरने की एक कोशिश थी.

इस बैठक के ज़रिए यह बताने की कोशिश की गई कि बीजेपी देश निर्माण करने वाली पार्टी है.

बीजेपी और संघ परिवार में होने वाली ट्रेनिंग के बारे में बताया जाना इस बात का सूचक है कि पार्टी अपने कैडर के मन में यह छवि गढ़ने की पूरी कोशिश कर रही है कि देश के निर्माण में बीजेपी ही सबसे अहम है.

लेकिन जो लोग यह सोच रहे हैं कि बीजेपी सिर्फ़ मोदी की उपलब्धियों को गिनाने भर से ही रुक जाएगी, वो दरअसल एक बड़ी चूक कर रहे हैं.

2019 के चुनाव से पहले अपने कार्यकर्ताओं का इस तरह मनोबल बढ़ाना और उनको मानसिक रूप से चुनाव के लिए तैयार करना, एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा है.

अटल बिहारी वाजपेयी की याद के बहाने पूरे देश के कार्यकर्ताओं को एकसाथ जोड़ने का कार्यक्रम चल रहा है.

इसके अलावा दूसरा कार्यक्रम लोगों को यह समझाना कि मोदी सरकार और उससे पहले नेहरू-गांधी परिवार के नेतृत्व में चली कांग्रेस सरकार में कितना फ़र्क है.

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बीजेपी अपने लाखों कार्यकर्ताओं की सेना के दम पर देश भर में मोदी सरकार की उपलब्धियों को बताने का काम करेगी.

जिस तरह से बीजेपी ने अपने संगठन को फैलाया यह उसकी नेतृत्व क्षमता का ही कमाल है और नेतृत्व की यही कमी कांग्रेस और उसके गठबंधन में नज़र आती है.

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि दो दिन तक चली इस कार्यकारिणी बैठक में आने वाले चुनावी संघर्ष की एक झलक भर दिखी है. अभी तो हमें सांसें रोक कर इस संघर्ष के क्लाइमैक्स का इंतज़ार करना है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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