नए मुख्य न्यायाधीश जस्टिस गोगोई के सामने क्या हैं चुनौतियां?

  • 15 सितंबर 2018
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राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने जस्टिस रंजन गोगोई को देश का अगला मुख्य न्यायधीश नियुक्त कर दिया है. वो 3 अक्तूबर से अपना कार्यभार संभालेंगे.

कुछ समय पहले चार जजों ने एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर न्यायपालिका के भीतर फैली अव्यवस्था की बात की थी. इनमें जस्टिस रंजन गोगोई भी शामिल थे.

इन जजों का आरोप था कि संवेदनशील मामलों को चुनिंदा जजों के पास भेजा जा रहा है और ये लोकतंत्र के लिए एक बड़ा ख़तरा है.

और अब जस्टिस रंजन गोगोई की नियुक्ति के बाद उनसे कई उम्मीदें बंध गई हैं. हालांकि, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि उनके सामने कई चुनौतियां भी हैं.

ये बात पहले ही पता थी कि इस साल अक्तूबर में मौजूदा मुख्य न्यायधीश दीपक मिश्रा रिटायर होने वाले हैं. लेकिन आशंकाएं जताई जा रही थी कि क्या सुप्रीम कोर्ट के सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश रंजन गोगोई को मुख्य न्यायाधीश बनाया जाएगा.

सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जजों में जस्टिस गोगोई को सबसे मुखर जज माना जाता है और उनके बारे में कहा जाता है कि वो चुप बैठने वालों में से नहीं है. ऐसे में उनकी नियुक्ति को बेहद अहम माना जा रहा है.

वरिष्ठ पत्रकार रमेश मेनन कहते हैं, "ये नियुक्ति बेहद अहम है क्योंकि जब ये प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई थी तब बहुत लोगों को लगता था कि वो कभी मुख्य न्यायाधीश नहीं बनेंगे. उन्होंने कहा था कि न्यायपालिका जिस तरह काम कर रही है वो ठीक नहीं है और गणतंत्र ख़तरे में है."

मेनन कहते हैं, "हाल में देश में व्यवस्था बिगड़ी है, जाति और धर्म को लेकर हिंसा हुई है, मॉब लिंचिंग हुई है ऐसे में कई लोगों को लगता है कि मुख्य न्यायधीश वो व्यक्ति होना चाहिए जो स्पष्ट बोलता हो और ईमानदार हो. ऐसे में जस्टिस रंजंन गोगोई की नियुक्ति का फ़ैसला अच्छी बात है."

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परंपरा का पालन

वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण कहते हैं आमतौर पर सर्वोच्च जज को ही मुख्य न्यायाधीश बनाया जाता है और अब तक भारत में केवल दो बार ही ऐसे मौक़े आए हैं जब ऐसा नहीं हुआ है.

प्रशांत भूषण कहते हैं, "इस मामले में शंका इसलिए पैदा हुई थी क्योंकि एक तो उन्होंने मुख्य न्यायाधीश का विरोध किया था. दूसरा ये कि ये सरकार जिस तरह से न्यायपालिका में हस्तक्षेप करने की कोशिश कर रही थी उससे ऐसा लग रहा था कि ये सरकार उनकी जगह किसी और को मुख्य न्यायाधीश बना सकती है लेकिन ऐसा नहीं किया. ये बहुत अच्छा हुआ क्योंकि न्यायपालिका को और सरकार को भी नुकसान होता."

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नए चीफ़ जस्टिस की चुनौतियां

जस्टिस रंजन गोगई को उनके एक बयान के लिए भी जाना जाता है जो उन्होंने दिल्ली में आयोजित तीसरे रामनाथ गोयनका स्मृति व्याख्यान के दौरान दिया था.

उन्होंने न्यायपालिका को उम्मीद का आख़िरी गढ़ बताया था और कहा था कि न्यायपालिका को पवित्र, स्वतंत्र और क्रांतिकारी होना चाहिए. उन्होंने अपने व्याख्यान में कहा था कि 'हो-हल्ला मचाने वाले जज न्यायपालिका की पहली रक्षा पंक्ति थे.'

ऐसे में उनसे उम्मीदें अनेक हैं और कहा जाए तो उनके सामने कई चुनौतियां भी हैं.

प्रशांत भूषण कहते हैं, "जिस तरह से पूरे देश के लोगों के मौलिक अधिकारों के ऊपर फासीवादी हमले किए जा रहे हैं, अल्पसंख्यकों को लिंच किया जा रहा है, जो सरकार से सहमत नहीं हैं उन्हें चुप कराया जा रहा है, जिस तरह से मीडिया को अपने कब्ज़े में किया जा रहा है. ये सभी लोकतंत्र के सामने बड़ी चुनौतियां हैं और न्यायपालिका को बड़ी भूमिका निभानी पड़ेगी."

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रमेश मेनन कहते हैं कि जस्टिस गोगोई के सामने अब राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर का मामला आएगा.

वो कहते हैं, "एनआरसी का मुद्दा उनके सामने आएगा और वो अच्छा काम करेंगे, मुझे लगता है कि एक साल के भीतर ही इस पर कुछ ना कुछ फ़ैसला आएगा. जो कड़े कदम उठाएंगे."

जस्टिस रंजन गोगोई पूर्वोत्तर राज्यों से मुख्य न्यायाधीश बनने वाले देश के पहले व्यक्ति होंगे. उन्होंने 1978 में एक वकील के तौर पर गुवाहाटी हाईकोर्ट में काम करना शुरू किया था.

बाद में साल 2001 में वो गुवाहाटी हाईकोर्ट में जज बने. 2012 में वो सुप्रीम कोर्ट जज नियुक्त किए गए थे.

जस्टिस गोगोई 17 नवंबर 2019 में रिटायर होंगे और उनका कार्यकाल 1 साल और 44 दिनों का रहेगा.

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