दहेज कानून में सुप्रीम कोर्ट ने अब क्या बदलाव किया

  • 14 सितंबर 2018
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दहेज उत्पीड़न क़ानून (498 A) पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक अहम फ़ैसला सुनाया है.

अब इस क़ानून के तहत महिला की शिक़ायत पर उसके पति और ससुराल वालों की गिरफ़्तारी में 'परिवार कल्याण समिति' की कोई भूमिका नहीं होगी.

कोर्ट ने पिछले साल ऐसे मामलों के लिए 'परिवार कल्याण समिति' बनाने की बात की थी. लेकिन कोर्ट ने अपने ताज़ा फ़ैसले में इस समिति के रोल को ख़ारिज कर दिया है.

इसके आलावा सुप्रीम कोर्ट का ये फ़ैसला उनके पिछले साल के दिशा निर्देशों की तरह ही है.

कोर्ट ने पहले कहा था कि दहेज के मामलों में महिला के पति और ससुराल वालों की तुरंत गिरफ़्तारी नहीं होगी और उनके पास अग्रिम ज़मानत लेने का विकल्प भी रहेगा.

भारत के चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस ए एम खानविल्कर और जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की बेंच ने ये फ़ैसला सुनाया है.

इसी साल 23 अप्रैल को कोर्ट ने सुनवाई के बाद इस मामले में फ़ैसला सुरक्षित रखा था.

क्या था सुप्रीम कोर्ट का पुराना निर्देश?

पिछले साल 27 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट के दो जजों, जस्टिस आदर्श कुमार गोयल और जस्टिस उदय उमेश ललित ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए अहम निर्देश दिए थे.

इसमें 498-ए के तहत महिला की शिक़ायत आने पर पति और ससुराल वालों की तुंरत गिरफ़्तारी पर रोक लगाई गई थी.

इनमें सबसे अहम निर्देश है कि पुलिस ऐसी किसी भी शि‍क़ायत पर तुरंत गिरफ़्तारी नहीं करेगी. महिला की शि‍क़ायत सही है या नहीं, पहले इसकी पड़ताल होगी. पड़ताल तीन लोगों की एक अलग नई समिति करेगी. यह समिति पुलिस की नहीं होगी.

इस नई समिति का नाम परिवार कल्याण समिति होगा. उसकी रिपोर्ट आने तक पुलिस को गिरफ़्तारी जैसी कार्रवाई नहीं करनी है.

वैसे निर्देश में ये भी कहा गया था कि इस समिति की रिपोर्ट को मानना शि‍क़ायत की जाँच कर रहे अफ़सर या मजिस्ट्रेट पर लाज़िमी नहीं होगा.

विदेश में रहने वालों का पासपोर्ट आमतौर पर ज़ब्त नहीं होगा. बाहर रहने वालों को पेशी पर आने से छूट दी जा सकती है. इन मामलों में वीडियो कॉन्फ़्रेंस के ज़रिए पेशी की जा सकती है.

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लेकिन महिलाओं के हक़ के लिए बने इस क़ानून को पुरूष विरोधी बताया जाता रहा है.

इसलिए कोर्ट में ये मामला पहुँचा ताकि पुरुषों के ख़िलाफ़ इसका दुरुपयोग न हो.

महिला अधिकारों के लिए काम करने वालों ने पिछले साल के निर्देश का विरोध करते हुए दलील दी थी कि आज तक इसके आंकड़े सामने नहीं आये कि कितने मामलों में 489-ए का दुरुपयोग हुआ है.

आख़िर 498-ए क्या है?

परिवार में महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा की प्रमुख वजहों में से एक दहेज के ख़िलाफ़ है ये क़ानून. इस धारा को आम ज़बान में 'दहेज के लिए प्रताड़ना' के नाम से भी जाना जाता है.

498-ए की धारा में पति या उसके रिश्तेदारों के ऐसे सभी बर्ताव को शामिल किया गया है जो किसी महिला को मानसिक या शारीरिक नुकसान पहुँचाये या उसे आत्महत्या करने पर मजूबर करे.

दोषी पाये जाने पर इस धारा के तहत पति को अधिकतम तीन साल की सज़ा का प्रावधान है.

इसके मुताबिक़ क्रूरता का मतलब ये होगा:

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