विवेचनाः कम आशिक़मिज़ाज नहीं रहे हैं भारतीय राजनेता भी!

  • 15 सितंबर 2018
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Image caption जवाहरलाल नेहरू और लेडी माउंटबेटन

जब मामला निजी जीवन की गोपनीयता का होता है तो भारतीय राजनीतिज्ञ दुनिया के सबसे बड़े तानाशाहों में बदल जाते हैं.

बल्कि उनके बीच एक तरह का अलिखित क़रार-सा होता है कि चाहे वो लोग एक दूसरे का कितना भी राजनीतिक विरोध क्यों न करें लेकिन एक दूसरे के प्रेम प्रसंगों, विवाहेत्तर संबंधों और तथाकथित 'दूसरी औरतों' की चर्चा सार्वजनिक रूप से नहीं करेंगे.

एकाध अपवादों को छोड़कर भारतीय राजनीतिज्ञों ने इस क़रार को निभाया भी है. इसकी वजह शायद ये है कि हर कोई शीशे के घर में रह रहा है.

लेकिन वरिष्ठ पत्रकार अजय सिंह इसके पीछे दूसरा कारण मानते हैं.

वो कहते हैं, "शीशे के घर तो विदेशों में भी होते हैं, लेकिन वहाँ तो पत्थर फेंके जाते हैं. यहाँ का एक सामंती अतीत है जहाँ हम मानकर चलते हैं कि राजा को कुछ चीज़ें अधिकार में मिली हुई हैं."

वो कहते हैं, "एक इटैलियन शब्द है 'ओमार्टा' जिसका अर्थ है कि अपराधियों में एक गुप्त समझौता होता है, जिसके अनुसार हम आपके बारे में नहीं बताएंगे और न ही आप हमारे बारे में बताएंगे. भारतीय राजनीति में भी कुछ-कुछ ओमार्टा जैसा है. कुछ मामलों में चुप्पी इतनी ज़्यादा है और उन बातों पर चुप्पी है जहाँ बिल्कुल नहीं होनी चाहिए."

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प्यार किया तो डरना क्या ?

गाँधी का ब्रह्मचर्य प्रयोग

मीडिया और राजनीतिज्ञों के बीच भी उनकी निजी ज़िंदगी को लेकर एक तरह का सामाजिक समझौता हुआ दिखता है कि एक हद के बाद उन पर सार्वजनिक चर्चा या बहस से बचा जाएगा.

भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी या भाई-भतीजावाद के मुद्दों पर भले ही आम लोग या मीडिया बहुत ही नृशंस हो लेकिन निजी जीवन के तथाकथित 'स्कैंडल्स' को ये नज़रअंदाज़ ही करते हैं.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया के पूर्व संपादक इंदर मल्होत्रा ने बीबीसी को बताया था, "तमाम दुनिया में ये हो गया है कि हर चीज़ खुली है. सोशल मीडिया भी है. नेताओं के निजी जीवन के बारे में अख़बारों में बिल्कुल नहीं छपता था. रेडियो और टेलीविज़न सरकार के थे."

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इंदर मल्होत्रा का कहना था, "अब पंडित नेहरू को ही ले लीजिए. पूरे देश में मुंहज़ुबानी चर्चा होती थी कि इनका लेडी माउंटबेटन के साथ सिलसिला है. फिर एक शारदा माता थीं जिनके बारे में कहा जाता रहा, उनकी ज़िंदगी के दौरान भी, उनके मरने के बाद उस पर किताब भी छप गई."

"उनसे पहले गांधी के बारे में भी, जो कोई चीज़ छिपाते नहीं थे, उनके एक अनुयायी ने किताब लिखी कि वो ब्रह्मचर्य के अपने प्रयोग के दौरान अपने दोनों तरफ़ युवा लड़कियों को सुलाते थे."

इंदर मल्होत्रा कहते हैं, "60 के दशक में गांधी के सेक्स और ब्रह्मचर्य के प्रयोगों पर निर्मल कुमार बोस की किताब छपने से पहले इसके बारे में लोगों को शायद पता भी नहीं था. इससे पहले इस विषय पर लिखने की भी कल्पना नहीं की जा सकती थी."

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जवाहरलाल नेहरू के बारे में कितना जानते हैं लोग?

हाल ही में दिवंगत हुए कुलदीप नैयर ने नेहरू-एडविना यानी लेडी माउंटबेटन संबंधों के बारे में एक दिलचस्प बात बीबीसी को बताई थी कि जब वो ब्रिटेन में भारत के उच्चायुक्त थे तब उनको पता चला कि एयर इंडिया की फ़्लाइट से नेहरू रोज़ एडविना को पत्र भेजा करते थे.

एडविना उसका जवाब देती थीं और उच्चायोग का आदमी उन पत्रों को एयर इंडिया के विमान तक पहुंचाया करता था.

नैयर ने एक बार एडविना के नाती लार्ड रैमसे से पूछ ही लिया कि क्या उनकी नानी और नेहरू के बीच इश्क़ था? रैमसे का जवाब था, "उनके बीच आध्यात्मिक प्रेम था."

इसके बाद नैयर ने उन्हें नहीं कुरेदा. नेहरू के एडविना को लिखे पत्र तो छपे हैं लेकिन एडविना के नेहरू को लिखे पत्रों के बारे में किसी को कुछ भी पता नहीं है.

कुलदीप नैयर ने एक बार इंदिरा गाँधी से उन पत्रों को देखने की इजाज़त मांगी थी लेकिन उन्होंने इससे साफ़ इनकार कर दिया था.

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'नेहरू और पद्मजा नायडू का इश्क़'

एडविना ही नहीं सरोजिनी नायडू की बेटी पद्मजा नायडू के लिए भी नेहरू के दिल में सॉफ़्ट कॉर्नर था. कैथरिन फ़्रैंक इंदिरा गाँधी की जीवनी में लिखती हैं कि विजयलक्ष्मी पंडित ने उन्हें बताया था कि नेहरू और पद्मजा का इश्क़ 'सालों' चला.

नेहरू ने उनसे इसलिए शादी नहीं की क्योंकि वो अपनी बेटी इंदिरा का दिल नहीं दुखाना चाहते थे. नेहरू के जीवनीकार एस. गोपाल से इंदिरा इस बात पर नाराज़ भी हो गई थीं क्योंकि उन्होंने नेहरू के 'सिलेक्टेड वर्क्स' में उनके पद्मजा के लिखे प्रेम पत्र प्रकाशित कर दिए थे.

1937 में नेहरू ने पद्मजा को लिखा था, "तुम 19 साल की हो (जबकि वो उस समय 37 साल की थीं)... और मैं 100 या उससे भी से ज़्यादा. क्या मुझे कभी पता चल पाएगा कि तुम मुझे कितना प्यार करती हो."

एक बार और मलाया से नेहरू ने पद्मजा को लिखा था, "मैं तुम्हारे बारे में जानने के लिए मरा जा रहा हूँ.. मैं तुम्हें देखने, तुम्हें अपनी बाहों में लेने और तुम्हारी आँखों में देखने के लिए तड़प रहा हूँ." (सिलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ नेहरू, सर्वपल्ली गोपाल, पृष्ठ 694)

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इंदिरा फ़िरोज़ की वैवाहिक कलह

इंदर मल्होत्रा ने बीबीसी को बताया था, "फ़िरोज़ गांधी मेरे बहुत अज़ीज़ दोस्त थे. वो कभी ज़िक्र भी कर देते थे और उनके यहाँ जो महिलाएं आती थीं वो मुझे भी जानती थीं. उनकी दोस्ती हम्मी नाम की एक बहुत ख़ुबसूरत महिला के साथ थी जिनके पिता उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री हुआ करते थे."

"इंदिरा नेहरू की देखभाल के लिए बच्चों को लेकर दिल्ली में प्रधानमंत्री निवास में आ गईं. वहाँ से फ़िरोज़ का रोमांस शुरू हुआ. फ़िरोज़ हैड अ काइंड ऑफ़ ग्लैड आई."

हम्मी को लेकर इंदिरा गांधी को ज़िंदगी भर मलाल रहा है.

इस बारे में इंदर मल्होत्रा ने बताया, "एक बार जब फ़िरोज़ नहीं रहे और इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री बन गईं तो इमरजेंसी से पहले हम्मी प्रधानमंत्री कार्यालय में किसी बात पर एक अर्ज़ी देने आईं. जब वो प्रधानमंत्री कार्यालय से निकल कर बाहर जा रही थीं तो उसी समय कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ ऑफ़िस में घुस रहे थे. इंदिरा गाँधी ने बरुआ से कहा कि बाहर नज़र डालो. जिस औरत को तुम देख रहे हो, इस औरत के लिए फ़िरोज़ ने सारी ज़िंदगी हमारी ख़राब कर दी."

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राजीव-सोनिया की प्रेम कहानी

राजीव गांधी और सोनिया गांधी के प्रेम प्रसंग पर भी राष्ट्रीय मीडिया में बहुत कम चर्चा हुई है. राशिद किदवई ने ज़रूर सोनिया गांधी पर लिखी जीवनी में इस मुददे पर अपनी नज़र दौड़ाई है.

क़िदवई ने बीबीसी को बताया, "शुरू में सोनिया गाँधी को ये भी पता नहीं था कि राजीव गांधी जवाहरलाल नेहरू के नवासे हैं. वो पहली बार केम्ब्रिज में एक ग्रीक रेस्तराँ 'वरसिटी' में मिले थे. वो अपनी एक दोस्त के साथ बैठी हुई थीं. राजीव गाँधी भी अपने दोस्तों के साथ थे."

किदवई बताते हैं, "सोनिया गाँधी का ख़ुद का कहना है कि जिस नज़र से राजीव ने उन्हें देखा.... पहली ही नज़र में उन्हें उनसे इश्क़ हो गया. फिर राजीव गांधी ने उन्हें एक कविता लिखकर भेजी. सोनिया गांधी को ये बहुत अच्छा लगा और इसके बाद दोनों का मिलना-जुलना शुरू हो गया. लेकिन जब एक बार इंदिरा गाँधी ब्रिटेन की यात्रा पर गईं और उनकी अख़बार में तस्वीर छपी तो उन्हें डर-सा महसूस हुआ."

किदवई कहते हैं, "एक बार वो आधे रास्ते से लौट आईं और इंदिरा से मिलने की हिम्मत नहीं जुटा पाईं. जब उनकी पहली बार इंदिरा से मुलाक़ात हुई तो उन्होंने उनसे फ़्रेंच में बात की क्योंकि इंदिरा को फ़्रेंच आती थी और सोनिया का हाथ अंग्रेज़ी में तंग था. बाद में जब सोनिया के पिता को पता चला कि वो राजीव से शादी करने जा रही हैं तो उन्होंने इसका विरोध किया."

वो कहते हैं, "जब राजीव गांधी सोनिया का हाथ मांगने गए तो उन्होंने कहा मैं देखना चाहता हूँ कि आप दोनों में कितनी मोहब्बत है. इसलिए आप एक साल तक एक दूसरे से न मिलें. एक साल बाद सोनिया गांधी ने पहल की लेकिन तब भी उनके पिता इस शादी के लिए दिल से तैयार नहीं हुए और उन्होंने इन दोनों की शादी में शिरकत भी नहीं की."

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संजय और रुख़साना सुल्ताना

राजीव के छोटे भाई संजय गांधी का भी नाम कई महिलाओं से जोड़ा गया. उनमें से एक रुख़्साना सुल्ताना भी थीं.

राशिद क़िदवई कहते हैं, "रुख़्साना सुल्ताना कोई बहुत बड़ी पब्लिक फ़िगर नहीं थीं. लेकिन उनको संजय गाँधी ने आगे बढ़ाया. उनका जो लाइफ़स्टाइल था, उस ज़माने में मेकअप करके, हाई हील्स पहनकर निकला करती थीं. उनका एक डॉमिनेटिंग कैरेक्टर था."

"कांग्रेस के लोग कहते थे कि वो संजय पर अपना हक़ जताती थीं और वो एक ऐसा हक़ था जिसे किसी रिश्ते का नाम नहीं दिया गया था. संजय का कई लड़कियों के साथ उठना बैठना था. बल्कि जब संजय की मेनका से शादी का पता चला तो कई लोगों को हैरत हुई कि ऐसा कैसे हो गया और कई लड़कियों के दिल टूट गए."

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राजकुमारी कौल के साथ रहने वाले वाजपेयी

पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेई के 'परिवार' पर दबे ज़ुबान कुछ चर्चा भले ही होती रही हो लेकिन इससे उनकी लोकप्रियता पर बिल्कुल फ़र्क नहीं पड़ा. वाजपेई ने कॉलेज के दिनों की अपनी दोस्त राजकुमारी कौल के साथ विवाह नहीं किया लेकिन उनकी शादी के बाद उनके पति के घर रहने लगे.

सैवी पत्रिका को दिए गए एक साक्षात्कार में श्रीमती कौल ने कहा, "मैंने और अटल बिहारी वाजपेई ने कभी इस बात की ज़रूरत नहीं महसूस की कि इस रिश्ते के बारे में कोई सफ़ाई दी जाए.''

श्रीमती कौल का कुछ दिनों पहले निधन हो गया लेकिन राष्ट्रीय मीडिया में उनकी शख़्सियत के बारे में इसलिए चर्चा नहीं हुई क्योंकि उनके बारे में लोगों को कुछ पता ही नहीं था. बीबीसी ने श्रीमती राजकुमारी कौल की दोस्त तलत ज़मीर से बात की.

तलत कहती हैं, "वो बहुत ही ख़ुबसूरत कश्मीरी महिला थीं... बहुत ही वज़नदार. बहुत ही मीठा बोलती थीं. उनकी इतनी साफ़ उर्दू ज़ुबान थी. मैं जब भी उनसे मिलने प्रधानमंत्री निवास जाती थी तो देखती थी कि वहाँ सब लोग उन्हें माता जी कहा करते थे. अटलजी के खाने की सारी ज़िम्मेदारी उनकी थी. रसोइया आकर उनसे ही पूछता था कि आज खाने में क्या बनाया जाए."

वो कहती हैं, "उनको टेलिविज़न देखने का बहुत शौक था और सभी सीरियल्स डिसकस किया करती थीं. वो कहा करती थीं कि मशहूर गीतकार जावेद अख़्तर जब पैदा हुए थे तो वो उन्हें देखने अस्पताल गई थीं क्योंकि उनके पिता जानिसार अख़्तर ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज में उन्हें पढ़ाया करते थे. वो जावेद से लगातार संपर्क में भी रहती थीं.''

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Image caption जॉर्ज फ़र्नांडिस और जया जेटली

फ़र्नांडिस और जया जेटली की दोस्ती

राजनीतिक हल्कों में पूर्व रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस और जया जेटली के संबंधों के बारे में भी काफ़ी कुछ कहा गया. इनको बल तब मिला जब जॉर्ज का अपनी पत्नी लैला कबीर से मनमुटाव हो गया.

मैंने जया जेटली से पूछा कि आपकी जॉर्ज के साथ दोस्ती किस तरह से हुई? जया जेटली ने बताया, "1979 में जनता सरकार गिर जाने के बाद जॉर्ज अकेले पड़ गए थे. उनके समाजवादी दोस्त सोचते थे कि उन्होंने मोरारजी का समर्थन करने के बाद उसी दिन उनकी सरकार के ख़िलाफ़ वोट किया था."

"उनकी पत्नी की तबियत ठीक नहीं रहती थी और वो काफ़ी दिनों के लिए विदेश चली जाती थीं. मेरे पति उनके साथ काम करते थे, इसलिए हमारा उनके यहाँ आना-जाना हो गया था."

उन्होंने बताया, "जॉर्ज को कई बार दौरों पर बाहर जाना होता था, इसलिए वो अपने लड़के को मेरे यहाँ छोड़ देते थे. उनके निजी जीवन में कोई भी ऐसा नहीं था जो उनके लिए इस तरह का काम करे. इस तरह वो और मेरा परिवार नज़दीक आ गए."

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मुलायम की दूसरी शादी

मुलायम सिंह यादव की दूसरी शादी के बारे में भी लोगों को तब पता चला जब आय से अधिक धन के मामले में मुलायम सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफ़नामा दिया.

अजय सिंह कहते हैं, "हम जब लखनऊ में काम करते थे तो हमें पता था कि ऐसा है. उनकी पत्नी तो नहीं हैं लेकिन पत्नी जैसी ही हैं जिनके यहाँ वो जाते थे. लेकिन न तो इस पर लिखना होता था न कोई बात होती थी."

"वो तो एक बार सुप्रीम कोर्ट में उन्हें एक हलफ़नामा देना पड़ा कि उनकी पहली पत्नी नहीं है. तब जाकर पता चला कि उनकी दूसरी पत्नी भी हैं और उनसे उन्हें एक लड़का भी है.''

Image caption कुलदीप नैयर के साथ बीबीसी स्टूडियों में रेहान फ़ज़ल

चढ़ती उम्र में प्रेम संबंध

रशीद क़िदवई कहते हैं, "इस ज़माने में एक दर्जन नाम गिनवाए जा सकते हैं जिनकी काफ़ी रंगीन ज़िंदगी रही है. विद्याचरण शुक्ल के बारे में बात होती थी. चंद्रशेखर के बारे में बात होती थी. नारायणदत्त तिवारी भी जब राज भवन में पकड़े गए और इसके अलावा उन पर एक पैटरनिटी सूट दाख़िल किया गया तो लोग बहुत चटख़ारे लेकर उस पर बात करते थे. लोहिया के इश्क़ पर भी बात होती थी."

इसके अलावा किदवई कुछ और नेताओं के प्रसंगों का ज़िक्र करते हुए कहते हैं, "इंदरजीत गुप्त का एक अलग किस्म का सूफ़ियाना किस्म का इश्क़ था. 62 साल की उम्र में उन्होंने शादी की. आरके धवन ने भी 74 साल की उम्र में अपनी शादी को सार्वजनिक रूप से स्वीकारा."

"हमारे समाज में जो होता है... शादी, प्रेम प्रसंग, विवाहेत्तर संबंध... राजनीति इससे अछूती नहीं रही है. सियासत का ये रंगीन पहलू है जिसे हम अंडरप्ले करते हैं."

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