इसरो के वो वैज्ञानिक जिन पर लगा जासूसी का झूठा आरोप

  • 15 सितंबर 2018
डॉक्टर एस नांबी नारायणन इमेज कॉपीरइट Imran Qureshi /BBC

इसरो में जासूसी करने के झूठे आरोपों का सामना करने वाले वैज्ञानिक डॉक्टर एस नांबी नारायणन को सुप्रीम कोर्ट ने मुआवज़े के तौर पर 50 लाख रुपए देने की बात कही है.

लेकिन डॉ. नारायणन का कहना है कि इस मामले ने उन्हें जो कष्ट दिया है उसकी भरपाई कोई रकम नहीं कर सकती, फिर चाहे वह पांच करोड़ रुपए ही क्यों न हो.

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) से जुड़े इस 24 साल पुराने मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि डॉ. नारायणन की गिरफ़्तारी बेवजह की गई थी और उसकी कोई ज़रूरत नहीं थी.

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की जांच के लिए एक जांच आयोग भी गठित किया है जिसका नेतृत्व सुप्रीम कोर्ट के ही रिटायर्ड जज जस्टिस डीके जैन करेंगे.

'मेरे साथ ऐसा क्यों किया?'

दरअसल साल 1998 में सुप्रीम कोर्ट ने डॉ. नारायणन को जासूसी के इस मामले में बरी कर दिया था लेकिन केरल हाई कोर्ट ने उन पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ़ कोई कदम नहीं उठाया जिन्होंने डॉ. नारायणन सहित 6 लोगों को इस मामले में गिरफ़्तार किया था.

यही वजह रही कि डॉ. नारायणन को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा.

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बीबीसी हिंदी के साथ बातचीत में डॉ. नारायणन ने बताया, "इस मामले में मुझे किस तरह फंसाया गया, मुझे पता है. लेकिन क्यों फंसाया गया यह मुझे नहीं पता. उन्होंने मेरे ख़िलाफ़ गुनाह, गुनहगार और तमाम सबूत तय किए. लेकिन उन्होंने ऐसा क्यों किया और मेरे ही ख़िलाफ़ क्यों किया, इनका मेरे पास कोई जवाब नहीं है."

जब डॉ नारायणन की गिरफ़्तारी हुई थी तब इस मामले से उनके साथ काम करने वाले तमाम वैज्ञानिक वाकिफ़ थे. इस गिरफ़्तारी ने भारत में स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजनों के निर्माण को दशकों पीछे खिसका दिया.

इसरो के पूर्व चेयरमैन माधवन नायर ने बीबीसी से कहा, "डॉक्टर नारायणन ने पीएसएलवी और जीएसएलवी सैटेलाइट के लिए बेहद अहम भारत के उस बेहतरीन इंजन को बहुत कम समय में तैयार कर लिया था. ये उनकी योग्यता और योगदान को दिखाता है."

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Image caption क्रायोजेनिक इंजन

क्या था मामला?

साल 1994 में डॉक्टर नारायणन के साथ एक और वैज्ञानिक और कुछ अन्य लोगों को भी गिरफ़्तार किया गया था, इसमें मालदीव की दो महिलाएं और बेंगलुरू के दो व्यापारी भी शामिल थे.

दोनों वैज्ञानिकों पर इसरो के रॉकेट इंजनों के चित्र और उनकी तकनीक दूसरे देशों में बेचने के आरोप लगे थे.

जिस इंजन के चित्र बेचने की बात सामने आई थी वो डिज़ाइन फ्रांस के इंजन का था, जिसको यहाँ भारत में फेब्रिकेट करने की कोशिश की जा रही थी.

जब सीबीआई ने इस मामले को अपने हाथों में लिया तब डॉक्टर नारायणन को बरी किया गया. डॉक्टर नारायणन का कहना है कि पुलिस हिरासत में उन पर काफी जुल्म किए गए.

वो कहते हैं, "मैं उस बारे में अब ज़्यादा बात नहीं करना चाहता, मुझे बहुत बुरी तरह मारा पीटा गया था."

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जब बरी होकर निकले

साल 1998 में सुप्रीम कोर्ट ने डॉ. नारायणन को इस मामले में बरी कर दिया. इसके बाद वो दोबारा इसरो में काम करने चले तो गए लेकिन उन्होंने उस प्रोजेक्ट पर काम नहीं किया.

वो बताते हैं, "मैं कमांडिंग पोज़िशन पर काम नहीं कर सकता था. प्रोजेक्ट डायरेक्टर या चीफ़ एग्ज़िक्यूटिव के तौर पर काम करने के लिए आपको कमांडिंग पोज़िशन पर रहना आवश्यक है. लेकिन इतनी प्रताड़ना और ज़लालत झेलने के बाद मेरा खुद से ही यकीन उठ गया था, हालांकि मैं उस प्रोजेक्ट को खराब नहीं करना चाहता था."

"इसलिए मैंने एग्जिक्यूटिव जॉब की जगह डेस्क जॉब मांगी. डेस्क के काम में आपको दूसरों के साथ बहुत ज़्यादा बातचीत नहीं करनी होती."

"मैं डिप्रेशन में नहीं था लेकिन इन सबके अलावा मेरे पास कोई दूसरा विकल्प भी नहीं था. या तो मैं अपना काम जारी रखता या फिर अपनी नौकरी से इस्तीफ़ा दे देता. मुझे अपना खोया हुआ सम्मान वापिस पाना था."

तो क्या आपको अपना सम्मान वापिस मिला?

इस सवाल के जवाब में डॉ. नारायणन कहते हैं, "मुझे लगता है कि ऐसा हुआ है. जब देश की सबसे बड़ी अदालत कहती है कि मुझे ग़लत तरीक़े से गिरफ़्तार किया गया, मुझे मुआवज़ा दिया जाता है और इस पूरे मामले के लिए जांच आयोग का गठन किया जाता है, तो इसका क्या मतलब हुआ."

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Image caption अपने पिता डॉक्टर एस नांबी नारायणन को मिठाई खिलाते हुए उनके बेटे शंकर कुमार

सालों पहले बन जाता स्वेदशी क्रायोजेनिक इंजन?

इस बीच एक सवाल उठता है कि अगर डॉ. नारायणन को उस समय यूं फंसाया ना जाता और गिरफ़्तार ना किया जाता तो क्या भारत क्रायोजेनिक इंजन का निर्माण सालों पहले कर देता.

डॉ. नारायणन इसका जवाब कुछ यूं देते हैं, "बिलकुल. ये इंजन सालों पहले बन गया होता. वैसे भी जो चीज़ हुई ही नहीं उसे कोई कैसे साबित करता. ख़ैर मैंने खुद को साबित किया और इस पूरे मामले की वजह से बहुत से लोगों का हौसला टूट गया, जिसका नतीजा हुआ कि पूरा प्रोजेक्ट धीमा पड़ गया."

इसरो के पूर्व चेयरमैन डॉ. नायर भी मानते हैं कि अगर उस वक़्त ये मामला नहीं होता तो भारत कुछ साल पहले स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन का निर्माण कर लेता.

डॉ. नायर कहते हैं, "उन्हें बहुत बड़े दुख का सामना करना पड़ा, इससे भी बढ़कर उन्होंने अपना करियर गवां दिया. हालांकि कोर्ट ने देश के इस महान वैज्ञानिक को राहत दी है."

लेकिन डॉ. नारायणन की संवेदनाओं का क्या जिनके साथ खिलवाड़ हुआ है?

डॉ. नायर जवाब देते हैं, "उसका दर्द तो हमेशा बरक़रार रहेगा."

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