स्मृति शेष: बेचैनियों-तल्खियों से भरे बेलौस कवि-लेखक विष्णु खरे को जानना ज़रूरी

  • 21 सितंबर 2018
इमेज कॉपीरइट courtesy MANGLESH DABRAL

जर्मन कवि और नाटककार बेर्टोल्ट ब्रेख्त की एक कविता का आशय कुछ इस तरह है कि जब मैं तुमसे रुखाई के साथ और तुम्हारी तरफ देखे बगैर कोई बात कहूँगा तो इसका अर्थ होगा कि मैं तुम्हारा हित चाहता हूँ और तुम्हारे लिए फिक्रमंद हूँ.

ब्रेख़्त विष्णु खरे से सबसे प्रिय लेखकों में थे और यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि ब्रेख़्त की यह कविता-पंक्ति उनके स्वभाव में ढल गई थी. यह जीवन का एक मुश्किल और अकेला कर देने वाला प्रस्थान-बिंदु था और वे जानते थे कि इसके नतीजे में उन्हें विवादास्पद, निर्वासित और आख़िरकार अवांछित होना पड़ेगा.

आख़िरी कुछ वर्षों में जब कभी कोई उनसे किसी काम में मदद के लिए कहता तो वे रास्ता ज़रूर सुझा देते, लेकिन साथ में यह भी कहते, 'मेरा हवाला मत देना वरना तुम्हारा होने वाला काम भी नहीं हो पायेगा.' जो लोग उनकी फ़ितरत को समझने में नाकाम थे, वे उन्हें कई अजब प्रत्ययों से नवाज़ा करते थे: टेढ़े, गुस्सैल, बदमिजाज, अपनी ही फौज को रौंदने वाले हाथी और 'बुल इन चाइना शॉप.'

खरे बड़ी बेचैनियों और तल्खियों में रहने वाले इंसान थे—मनुष्य और कविता दोनों रूपों में असाधारण, अलहदा और अपनी पसंद-नापसंद में बेलौस. ये बेचैनियाँ भीतरी और संवेदनात्मक थीं और तल्खियां उन अमानवीय कायाकल्पों की देन थीं जो हमारे सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में घटित होती आ रही हैं. उनकी टिप्पणियां फौरी तौर पर धक्का पहुंचाने वाली होती थीं, लेकिन बाद में लगता था कि उनमें कोई सच कह दिया गया है.

सन 1970 में विष्णु खरे कुछ समय तब के चेकोस्लोवाकिया की राजधानी प्राग में रह कर लौटे थे और उनका रुख़ काफ़ी आलोचनामक था. शायद प्राग को समाजवादी अपेक्षाओं के अनुरूप न पाकर वे हताश थे.

संवेदना और भाषा के कवि

जब हम कुछ नए-नए कम्युनिस्ट दोस्त उनसे उलझ रहे थे तो आलोक धन्वा ने आजिजी से पूछा, 'आपके हिसाब से कुछ नहीं है, तो क्या कोई चिड़िया भी नहीं है?' इस पर विष्णु खरे ने जोर से कहा, 'नहीं, चिड़िया भी नहीं है.' बाद में पता चला कि चीन समेत कई समाजवादी देशों में फसलों की हिफ़ाजत के लिए चिड़ियों को मारने का अभियान चलाया गया था.

इमेज कॉपीरइट courtesy MANGLESH DABRAL

यह वही विष्णु खरे थे जो तब तक 'टेबल' और 'दोस्त' जैसी कविताओं के ज़रिए एक नयी संवेदना और नयी भाषा का आगाज़ कर चुके थे जो अपनी बुनियाद में 'जनवादी' थी.

'दोस्त' एक छरहरे नौजवान पुलिस अफ़सर का व्यक्ति चित्र है जो लड़कियों के कॉलेज के आसपास अपनी ड्यूटी लगवाना चाहता है, मस्ती में सीटी बजाना चाहता है, लेकिन कुछ वर्ष बाद वह मोटा तुंदियल होकर पादता, अपने दाँतों में फंसे खाने के टुकड़े को खरोचता से निकालता और हाथ में डंडा लेकर किसी की पिटाई करने जाता हुआ दिखता है.

इन कविताओं के बाद विष्णु की कविता में समकालीनता, इतिहास, मिथकों, घर-परिवार, बेरोजगार बेटियों, लाचार पिताओं, भूख से पीड़ित लोगों, विधवाओं, तथाकथित बदनाम औरतों और पशु-पक्षियों को भी एक जन-पक्षधर निगाह से देखना लगातार बढ़ता गया.

इमेज कॉपीरइट courtesy Manglesh Dabral

विष्णु खरे की दोस्ती का कैनवस बड़ा था और ऐसा शायद ही कोई दोस्त होगा जिससे उनका कमोबेश विवाद न हुआ हो. ख़ास बात यह थी कि ऐसे झगड़ों की ज़िंदगी कुछ ही देर की होती थी. अपने से बाद की पीढ़ी से वे कहीं ज्यादा गहरे जुड़े थे और उसकी कविता बहुत गौर से पढ़ते थे.

कुछ कवियों के पहले कविता संग्रह भी उनके प्रयत्नों से संभव हुए जिनमें उन्हें काफ़ी संभावना नजर आयी थी. मेरे पहले संग्रह 'पहाड़ पर लालटेन' की पांडुलिपि भी उन्होंने मंगवाई थी, लेकिन उसे कवि-मित्र पंकज सिंह पहले ही राधाकृष्ण प्रकाशन के अरविन्द कुमार को सौंप चुके थे.

सत्ताधारियों से विरोध का संबंध

राजनीति और संस्कृति के सत्ताधारियों से विष्णु खरे का विरोध का संबंध रहा. उनमें यह कहने का साहस था कि 'अटलबिहारी वाजपेयी कोई कवि नहीं हैं' और यह कहने का भी कि 'आचार्य रामचंद्र शुक्ल नहीं, मुक्तिबोध हिंदी के सबसे बड़े आलोचक हैं.'

वीरेन डंगवाल को जब साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला तो कुछ प्रतिष्ठानी लेखकों ने अकारण ही विरोध करना शुरू कर दिया. खरे तब जर्मनी में अपनी बेटी के घर गए थे, लेकिन वहां से उन्होंने वीरेन की कविता की प्रंशसा और पुरस्कार के समर्थन में टिप्पणी भेजी.

कुछ समय बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के मुद्दे पर दोनों में काफ़ी विवाद हो गया. लेकिन जब लंबी बीमारी से जूझते हुए वीरेन का निधन हुआ तो उन्होंने एक मार्मिक श्रद्धांजलि लिखी जिसमें उसे 'पहाड़ में पैदा हुए सभी कवियों में सबसे श्रेष्ठ' कह कर याद किया.

विष्णु खरे के कामों में चार बहुत महत्वपूर्ण हैं. पहला तो यह है कि उन्होंने हिंदी कविता में एक मौलिक और दूरगामी बदलाव को संभव किया, जिसका व्यापक असर हुआ और कविता वह नहीं रही जो पहले थी. वह गद्यात्मक, निबंध जैसी और अलंकरण-विहीन हुई और बहुत से कवि ही उनके गैर-पारंपरिक शिल्प में लिखने लगे.

प्रसिद्ध कवि कुंवर नारायण ने अपने एक लेख में कहा था कि विष्णु खरे की कविता, कविता के तमाम प्रचलित नियमों और शिल्पों को लांघ कर लिखी गयी है.

वो काम जो हमेशा याद रहेंगे

इमेज कॉपीरइट courtesy Manglesh Dabral

विश्व कविता के कई बड़े कवियों की रचनाओं के अनुवाद उनका दूसरा बड़ा काम था. गोइठे, ग्युन्टर ग्रास, अत्तिला योज़ेफ, मिक्लोश राद्नोती, बेर्टोल्ट ब्रेख्त आदि कवियों और एस्टोनिया और फ़िनलैंड के लोक-महाकाव्यों के उनके अनुवाद उल्लेखनीय हैं. उन्होंने उन्नीस साल की उम्र में बीए में पढ़ते हुए ही अंग्रेजी कवि टी एस एलियट की प्रसिद्ध कविता 'वेस्टलैंड' को हिंदी में 'मरु प्रदेश और अन्य कवितायें' नाम से अनूदित किया.

हिंदी कविता को अनुवाद के ज़रिए अंग्रेज़ी और जर्मन, डच आदि भाषाओँ में पंहुचाना उनका तीसरा उल्लेखनीय काम था और उन्होंने जर्मन विद्वान् प्रोफ. लोठार लुत्से के साथ हिंदी कविता के जर्मन अनुवादों का पहला संकलन भी संपादित किया. हिंदी कविता के अंग्रेज़ी और डच अनुवाद भी उनके प्रयत्नों से संभव हुए.

एक और काम विष्णु खरे ने यह किया कि आलोचक के रूप में कवि चंद्रकान्त देवताले का गहरा विश्लेषण करते हुए उनकी एक प्रमुख कवि के रूप में पहचान की. हिंदी आलोचना आम तौर पर छिट-पुट और धंधई ढंग से कविता की पड़ताल करती रही है, लेकिन देवताले पर खरे का काम उसी तरह का है जैसा मलयज ने शमशेर बहादुर सिंह पर किया था.

विष्णु खरे शास्त्रीय और फिल्म संगीत और सिनेमा के भी गहरे जानकार थे और उनकी किताबों को हिंदी और विश्व सिनेमा की बुनियादी पाठ्य-सामग्री की तरह पढ़ा जा सकता है. आख़िरी दिनों में वे गजानन माधव मुक्तिबोध की कविताओं के अंग्रेज़ी अनुवाद कर रहे थे. उम्मीद है कि ये अनुवाद जल्दी ही राजा फाउंडेशन के ज़रिए पाठकों तक पहुंचेंगे.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

मिलते-जुलते मुद्दे