नज़रियाः तीन तलाक़ को अपराध बनाए जाने से होगा क्या?

  • 22 सितंबर 2018
मुस्लिम महिला की प्रतीकात्मक तस्वीर इमेज कॉपीरइट Thinkstock

पिछले एक साल से लटके पड़े तीन तलाक़ बिल पर अध्यादेश को राष्ट्रपति ने मंजूरी दे दी है. प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में कैबिनेट ने बुधवार यानी 19 सितंबर की दोपहर को ही इस अध्यादेश को हरी झंडी दे दी थी.

इसके साथ एक बार में तीन तलाक़ को अपराध की श्रेणी में रखा गया है और इसके लिए तीन साल से ज़्यादा की सज़ा का प्रावधान रखा गया है.

केंद्रीय क़ानून मंत्री रवि संकर प्रसाद ने प्रेस कॉफ्रेंस करके सरकार के इस क़दम की घोषणा की और अध्यादेश के अहम बिन्दुओं को सामने रखने की कोशिश की. इस अध्यादेश में लोकसभा में पारित तलाक़ बिल से इतर कुछ आमूल-चूल बदलाव हैं.

लोकसभा में तो यह बिल दिसंबर 2017 में उसी दिन पारित हो गया था जिस दिन इसे पेश किया गया था.

इसके मुताबिक, एक अनजान शख़्स भी पुलिस में शिकायत दर्ज़ करवा सकता था. इसका मतलब ये हुआ कि कोई भी तीन तलाक़ को लेकर मुस्लिम पुरुष को धमका सकता था, तब भी जब उसकी पत्नी ऐसा नहीं चाहती हो.

आजकल के समय में जबकि बीफ़ रखने के संदेह में यूं भी मुस्लिम पुरुषों में लिंचिंग के डर का माहौल है, ऐसे में ये ताक़त लोगों के हाथों में दिए जाने से स्थिति और भी डरावनी हो जाती है.

राज्य सभा में हुई तीखी बहस के बीच सरकार ने इसके प्रावधान के दायरे को संशोधित करने के लिए हामी भर दी थी. इसलिए संशोधित बिल पुलिस में शिकायत दर्ज कराने का अधिकार सिर्फ़ महिला और उनके रिश्तेदारों को ही देता है.

विरोध के बावजूद, तीन तलाक़ अब भी ग़ैर-ज़मानती है. इसका मतलब ये हुआ कि अगर पुलिस किसी को तीन तलाक़ के आरोप में गिरफ़्तार करती है तो वो ज़मानत पर रिहा नहीं होगा. हालांकि, मजिस्ट्रेट ज़मानत दे सकते हैं लेकिन वो भी पत्नी की बात सुनने के बाद ही.

इस नए बिल में एक तीसरा बदलाव ये भी किया गया है कि मुस्लिम दंपति आपसी सहमति से समझौता कर सकता है और अगर पत्नी इस समझौते के लिए मजिस्ट्रेट के पास जाती है.

ये कुछ ऐसे बिंदु थे जिस पर जनवरी 2018 में राज्य सभा में जमकर बहस के बाद सहमति बनी थी. तब विपक्ष इसके प्रावधानों को बारीकी से देखने के लिए इस बिल को सेलेक्ट कमिटी के पास भेजने की मांग कर रही थी. लेकिन सरकार अड़ी रही.

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तीन तलाक़ पर अध्यादेश क्यों?

अब आज हर आदमी के दिमाग़ में ये प्रश्न कौंध रहा है- आखिर सरकार को इस बिल को अध्यादेश के जरिए पास कराने की इतनी जल्दबाज़ी क्यों है. जबकि अध्यादेश का रास्ता तभी अपनाया जाता है जब राष्ट्रीय आपातकाल जैसी कोई स्थिति हो, ऐसे में तीन तलाक़ पर ये अध्यादेश क्यों?

प्रजातंत्र में, कार्यपालिका की शक्ति संसद की विधायिका की ताक़त को दबाने में नहीं किया जा सकता है. इसे स्पष्ट रूप से कार्यपालिका को अधिक तरजीह दिया जाना क़रार दिया जा सकता है.

आख़िर तीन तलाक़ पर सरकार की इस हड़बड़ी की राजनीतिक वजह क्या है? कुछ लोगों को लगता है कि यह राजनीतिक रूप से प्रेरित है और 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को फ़ायदा पहुंचाएगा.

मुस्लिम महिलाएं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनके उद्धारक के रूप में स्वीकार करना शुरू कर देंगी और इससे मुसलमानों के एक बड़े तबके में निहित मोदी विरोधी भावनाओं को दूर करने में मदद मिलेगी.

हालांकि ऐसी भविष्यवाणियों को लेकर संशय है. मुस्लिम महिलाओं को जब तक राजनीति से इतर इसमें कुछ ठोस लाभ नहीं दिखता, वो अपने समुदाय की भावनाओं के ख़िलाफ़ जाकर उस पार्टी के पक्ष में अपना वोट क्यों देंगी, जिसे आमतौर पर मुस्लिम विरोधी माना जाता है.

और यहां इस पूरे मसले का सार सामने आता है. यह अध्यादेश मुस्लिम महिलाओं को ऐसा क्या देगा जो पहले से मौजूद अन्य व्यवस्था में नहीं है?

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पति ही जेल में होगा तो भरण-पोषण के पैसे कौन देगा?

क्या यह मुस्लिम निकाह को बचा पाएगा, मुस्लिम महिलाओं के आर्थिक अधिकारों की रक्षा करेगा या यह सुनिश्चित करेगा कि उनके सिर पर छत बना रहेगा, जो मौजूदा अन्य व्यवस्थाओं के तहत निर्धारित हैं?

क्या यह कोई जादू की छड़ी है जो मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक़ से पैदा हुए हालात से बचाएगी?

इसके बिल्कुल विपरीत, यह मुस्लिम महिलाओं की बेबसी को और बढ़ाएगा. क्योंकि जब मुस्लिम पति को तीन तलाक़ बोलने के लिए जेल भेजा जाएगा तो अपनी पत्नी और बच्चों की देखभाल नहीं कर सकेगा. समस्या तो यह है कि वो अपनी शादी को भी बचा नहीं सकेगा.

शादी में विवाद की स्थिति में क्या मुस्लिम पत्नी का अंतिम लक्ष्य पति को जेल भिजवाना है या अपनी आर्थिक स्थिति को सुरक्षित करना?

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क्या मुस्लिम महिलाएं यही चाहती हैं?

मुझे लगता है कि सरकार का गणित यहां ग़लत हो गया है.

कैसे कोई अनपढ़ मुस्लिम महिला जिसे उसके घर से बाहर कर दिया गया हो, अपने पति के ख़िलाफ़ एक कठोर और मुश्किल आपराधिक मुक़दमा लड़ कर उसका अपराध साबित करने में सक्षम होगी? सबसे महत्वपूर्ण तो यह है कि इस सज़ा से उस मुस्लिम तलाक़शुदा महिला को क्या मिलेगा?

पति को तीन, सात या 10 साल की सज़ा दिलाने मात्र से यह तय नहीं हो जाएगा कि उसके पास अपने बच्चों के लिए खाना, उन्हें पहनाने और उनकी शिक्षा के लिए पैसे आ जाएंगे, जो कि ऐसी स्थिति में ग़रीब ही नहीं बल्कि किसी भी महिला की पहली चिंताएं होंगी.

यदि मुस्लिम महिला की इच्छा शादी को तोड़ने के बजाए उसे बचाने की और यह सुनिश्चित करने की हो कि उसका घर और उसके भरण-पोषण की हिफाजत हो, तो तीन तलाक़ को अपराध बनाना इसका जवाब नहीं है.

घरेलू हिंसा अधिनियम के प्रावधानों का उपयोग करते हुए और सायरा बानो बनाम भारत सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट की फुल बेंच के हालिया फ़ैसले का संदर्भ देते हुए तीन तलाक़ को चुनौती देने से बेहतर यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि महिला को उसके उसके घर और भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जाए.

अब चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही तीन बार मनमाने तरीके से तलाक़, तलाक़ तलाक़ बोलने को अमान्य कर दिया है तो ऐसे में कई क़ानूनी विशेषज्ञ इस सोच में पड़ गए हैं कि जो मान्य है ही नहीं उसे क़ानूनी तौर पर अपराध कैसे बनाया जा सकता है. क़ानून की कसौटी पर यह कैसे खड़ा उतरेगा?

हाल के दिनों में उत्तर भारत के लगभग सभी राज्यों में गोरक्षकों के मुसलमानों की लिंचिंग (पीट-पीट कर हत्या) किए जाने में हुई बढ़ोतरी है और प्रधानमंत्री के इस पर मौन रहे, लव जिहाद का हौआ बनाया गया जिसका इस्तेमाल हिंदू महिला से शादी करने वाले मुस्लिम पुरुष को मारने के लिए किया जाता है, और आतंकवाद के संदेह के आधार पर मुस्लिमों को लंबे समय के लिए जेल में बंद करने के बाद अब डर यह है कि स्थानीय गुंडों और पुलिस के पास मुस्लिमों को डराने और उन्हें जेल भेजने में यह क़ानून एक और हथियार का काम करेगा.

इसे लेकर इन दिनों एक मज़ाक चल रहा है कि मुसलमानों से नफ़रत करने वाले मोदी मुस्लिम महिलाओं से प्यार करते हैं.

(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं.)

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