रफ़ाल के सवाल पर कांग्रेस के पाप क्यों गिना रही है बीजेपी?

  • 25 सितंबर 2018
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"एक ऐसा व्यक्ति जिसके पूरे परिवार ने बोफोर्स मामले में घूस लेकर भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा की थी. इनका पूरा परिवार इस देश में भ्रष्टाचार की जननी है और राहुल गांधी हमारे प्रधानमंत्री जी के बारे में ऐसी ओछी बात करते हैं."

केंद्रीय क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने शनिवार को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को वो सब बातें याद दिलाने की कोशिश की जिनके आधार पर उनके मुताबिक़ राहुल गांधी रफ़ाल डील विवाद में मौजूदा प्रधानमंत्री पर उंगली उठाने लायक ही नहीं हैं.

राहुल गांधी ने शनिवार को ही प्रेस कॉन्फ्रेंस करके रफ़ाल डील के मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपनी चुप्पी तोड़ने को कहा था.

गांधी परिवार को क्यों कहा भ्रष्टाचारी?

सबसे दिलचस्प यह है कि जब राहुल गांधी रफ़ाल डील के मामले में केंद्र सरकार से जवाब मांग रहे हैं ठीक तभी अपनी सफाई देने की जगह कांग्रेस को उसका इतिहास याद दिलाने की वजह क्या हो सकती है. और इसका क्या मतलब हो सकता है.

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Image caption केंद्रीय क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में.

रविशंकर प्रसाद ने जो रणनीति अपनाई है, तर्कशास्त्र की भाषा में उसे ही व्हाटअबाउटरी कहा गया है. हिंदी में इसका अनुवाद कुछ यूं होगा - 'तब तुम कहां थे या तब तुमने क्या किया था'.

ये एक बेहद मारक हथियार है. इसके प्रयोग से कोई भी बहस चंद पलों में कहीं से कहीं पहुंच सकती है और उससे पहले दिए गए सारे तर्क बेकार हो जाते हैं.

इसका सबसे बड़ा फ़ायदा ये है कि आपके ऊपर जैसे ही एक मुश्किल सवाल आता तो आप तेज़ गति से सवाल को हवा में ही चकनाचूर करके सवाल पूछने वाले को ही कठघरे में खड़ा कर देते हैं.

टीवी पर होने वाली बहसों में ये अक्सर देखने में आता है. इसकी वजह भी है क्योंकि प्रवक्ताओं के सामने रोज़ाना ऐसे सवाल सामने आते हैं जिनके जवाब ख़ूबसूरती से टालने की वजह से ही प्रवक्ताओं की तरक्की होती है.

व्हाटअबाउटरी कहां से आया?

राजनीतिक बहसों में सवालों के जवाब देने का ये तरीका वर्तमान सरकार का आविष्कार नहीं है.

जानकारों के मुताबिक़, व्हाटअबाउटरी शीत युद्ध की देन है.

दरअसल, जब अमरीका और सोवियत संघ विश्व पटल पर एक दूसरे को नीचे दिखाने की कोशिश किया करते थे तब इस हथियार को बखूबी इस्तेमाल किया गया.

ये वो दौर था जब पूंजीवादी और साम्यवादी ताकतें किसी भी तरह से खुद को दूसरे से बेहतर साबित करने की होड़ में थीं.

ऐसे में जब अमरीका सोवियत संघ के ख़िलाफ़ मानवाधिकार उल्लंघन का आरोप लगाता था.

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तब सोवियत संघ इसके जवाब में कहता था - "एंड यू आर लिंचिंग नीग्रोज़'. इसका मतलब "और तुम तो अफ़्रीकी अमरीकियों को सामूहिक रूप से घेरकर मार रहे हो" है.

वरिष्ठ पत्रकार मधूसूधन आनंद कहते हैं, "पहले की दुनिया में अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में लोकलाज का भय हुआ करता था. लेकिन शीत युद्ध के बाद से स्थितियां तेजी से बदल गईं. क्यूबा मिसाइल संकट से पहले अमरीका और सोवियत संघ के बीच इसी तरह की बयानबाजी हुई थी."

व्हाटअबाउटरी का इतिहास महर्षि व्यास के महाकाव्य महाभारत में ही मिलता है.

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महाभारत में नियमों का उल्लंघन करके भीम ने जब दुर्योधन की जंघा तोड़ी तो इस पर बलराम क्रोधित हुए.

इस पर कृष्ण ने भीम का बचाव करते हुए उन्हें दुर्योधन के पाप याद दिलाते हुए कहा कि भीम ने प्रतिज्ञा कर रखी थी.

बलराम कृष्ण के इस स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं हुए और क्रोधित होकर द्वारिका चले गए थे.

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व्हाटअबाउटरी का मतलब क्या होता है?

लेकिन सवाल ये है कि ऐसे तर्क या कुतर्क देने का मायने क्या होते हैं.

मनोविज्ञान की मानें तो व्हाटअबाउटरी का प्रयोग करने वाला ये मानता है कि वो ग़लत है लेकिन उसे अपनी ग़लती का पछतावा नहीं होता है.

क्योंकि वह सवाल पूछने वाले व्यक्ति को उसके पाप याद दिलाकर उसे अपनी बराबरी पर ले आता है. और इस तरह अपराध करना सामान्य हो जाता है.

ऑस्ट्रेलियाई यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मेरॉल्ड वेस्टफल अपनी किताब 'गॉड गिल्ट एंड डेथ' में इसे समझाते हुए कहते हैं, "केवल वही लोग जो ये मानते हों कि वे ग़लत है, इस तरह के तर्कों की मदद से ये जताने की कोशिश करते हैं कि सवाल पूछने वाला लाख गुना ज़्यादा ग़लत है. ये करना ऐसे लोगों को सुरक्षित होने का अहसास देता है."

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उदाहरण के लिए, जब राहुल गांधी के आरोपों पर रविशंकर प्रसाद सफ़ाई देने आए तो उन्होंने ऊंचे स्वर में राहुल और उनके परिवार के कथित पापों के बारे में बताया.

ऐसे में उन्होंने ये साबित करने की कोशिश की कि स्पष्टीकरण देने का सवाल ही नहीं उठता जब आरोप लगाने वाला खुद ही आरोपी हो.

यूनिवर्सिटी ऑफ कैंसास में पढ़ाने वाले अमरीकी सामाजिक मनोवैज्ञानिक डैनियल वेटसन अपनी किताब व्हाट्स रॉन्ग विद मॉरेलिटी में कहते हैं, "लोगों ने ये समझ लिया है कि नैतिक होने के अपने फ़ायदे हैं, आप जांच और अपराधबोध से बच जाते हैं. लेकिन नैतिक होने से ज़्यादा फायदा नैतिक दिखने में है क्योंकि इसमें आपको नैतिक होने की कोई क़ीमत नहीं चुकानी पड़ती है." (पेज नंबर 97)

प्रोफेसर बेटसन ने जो बात कही है वो भारतीय परिप्रेक्ष्य में कहीं ज़्यादा लागू होती है. गांधी के दौर से भारत में नैतिकता से बड़ी कोई राजनीतिक पूंजी नहीं है.

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लेकिन ऐसा नहीं है कि इस हथियार का प्रयोग 2014 के बाद ही शुरू हुआ है. खुद प्रधानमंत्री मोदी कई बार इसका प्रयोग कर चुके हैं.

साल 2012 में जब राहुल गांधी ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री पर आरोप लगाते हुए कहा था कि गुजरात में सिर्फ़ एक आवाज़ सुनी जाती है और वो आवाज़ है नरेंद्र मोदी की.

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मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तब इसके जवाब में ट्वीट करते हुए कहा था, "राहुल बाबा का पाखंड चरम पर है, वे कहते हैं कि गुजरात में बस एक आवाज़ सुनी जाती है. लेकिन उन पांच हज़ार स्कीमों का क्या जो उनके परिवार के नाम पर हैं."

बीजेपी और इससे जुड़े तमाम दूसरे नेता जैसे कि राकेश सिन्हा (राज्यसभा सदस्य) और विनय सहस्त्रबुद्धे भी अलग-अलग मौकों पर इसका प्रयोग कर चुके हैं.

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व्हाटअबाउटरी के ख़तरे क्या हैं?

इस सवाल का जवाब आसान है. भारत एक डेमोक्रेसी यानी लोकतंत्र है. यहां पर सर्वसहमति की अहमियत है.

लेकिन इसके लिए संवाद और बातचीत जरूरी है. सरकारी पदों को संभाले हुए लोगों की जवाबदेही ज़रूरी है.

मधूसूधन आनंद कहते हैं, "पहले तो ये होता था कि अगर ऐसा बोलेंगे तो दुनिया क्या कहेगी. लेकिन अब ये शर्म ख़त्म हो चुकी है. अब ताकत का दौर है और अब सवाल पूछने का कोई मतलब नहीं रहा है. क्योंकि जो भी पार्टी सत्ता में होती है. उसे अब कोई परवाह नहीं है कि कोई हमारी बात पर कैसी प्रतिक्रिया देगा."

दरअसल, व्हाटअबाउटरी यानी सवालों का जवाब देने की ये प्रक्रिया जवाबदेही को एक झटके में ख़त्म कर देती है.

ऐसे में इस हथियार की मौजूदगी में किसी सरकार को किसी तरह की इमरजेंसी लगाने की ज़रूरत नहीं पड़ती.

क्योंकि व्हाटअबाटरी हर तरह की जवाबदेही ख़त्म कर देती है. इसके बाद सरकारें आती जाती हैं लेकिन सवालों के जवाब नहीं आते.

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