मालदीव को लेकर भारत और चीन में होड़ क्यों है?

  • 25 सितंबर 2018
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Image caption मालदीव के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति इब्राहिम मोहम्मस सोलिह

मालदीव की पहचान दुनिया भर में एक ख़ूबसूरत पर्यटन स्थल के रूप में है. लेकिन हाल के वर्षों में इस देश की अहमियत भारत और चीन के लिए रणनीतिक रूप से बढ़ी है.

हिन्द महासागर में चीन अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए कई देशों में मौजूदगी बढ़ा रहा है तो दूसरी तरफ़ भारत चीन को रोकने के लिए चाहता है कि वो इन देशों में अपनी मौजूदगी को पुख्ता करे.

चीन वैश्विक व्यापार और इन्फ्रास्ट्रक्चर प्लान के ज़रिए इन देशों में तेज़ी से अपना पांव जमा रहा है.

1200 द्वीपों वाला 90 हज़ार वर्ग किलोमीटर का यह देश समुद्री जहाजों का महत्वपूर्ण मार्ग है. भारत और चीन दोनों चाहते हैं कि उनकी नौसैनिक रणनीति के दायरे में यह इलाक़ा रहे.

भारत पिछले कुछ सालों से मालदीव से दूर होता गया. इसकी वजह ये रही कि अब्दुल्ला यामीन की सरकार को चीन ज़्यादा रास आया और उन्होंने भारत से साथ बेरुख़ी दिखाई.

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रविवार को हुए चुनाव में अब्दुल्ला यामीन को हार मिली और विपक्ष के साझे उम्मीदवार इब्राहिम मोहम्मद सोलिह को जीत मिली. सोलिह को 58 फ़ीसदी से ज़्यादा वोट मिले हैं. भारत ने सोलिह की जीत का तत्काल स्वागत किया और कहा कि यह लोकतंत्र की जीत है.

इस छोटे से देश के लिए चीन और भारत में होड़ क्यों?

क़रीब चार लाख की आबादी वाले इस देश में सालों से भारत का प्रभाव रहा है. मालदीव में चीन की दिलचस्पी हाल के वर्षों में बढ़ी है.

मालदीव को चीन अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना वन बेल्ट वन रोड में एक अहम रूट के तौर पर देख रहा है.

चीन की बढ़ती दिलचस्पी से भारत का असहज होना लाजिमी था. भारत को लगता है कि चीन मालदीव में कोई निर्माण कार्य करता है तो उसके लिए यह सामरिक रूप से झटका होगा.

वैश्विक संबंधों में यह आम राय बन रही है कि जहां-जहां चीन होगा वहां-वहां भारत मज़बूत नहीं रह सकता है. मालदीव से लक्षद्वीप की दूरी महज 1200 किलोमीटर है. ऐसे में भारत नहीं चाहता है कि चीनी पड़ोसी देशों के ज़रिए और क़रीब पहुंचे.

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मालदीव में चीन कैसे मज़बूत हुआ?

यामीन ने चीन के पैसों से मालदीव में निर्माण कार्य शुरू किया तो भारत का यह डर और बढ़ा. यामीन ने चीन से कई परियोजनाओं के लिए समझौते किए हैं, जिनमें राजधानी माले में एक एयरपोर्ट भी शामिल है.

यामीन के कार्यकाल में चीन ने मालदीव में भारी निवेश किया है. सेंटर फोर ग्लोबल डिवेलपमेंट के अनुसार इसमें 83 करोड़ डॉलर का एयरपोर्ट भी शामिल है. इसके साथ ही 2 किलोमीटर का एक ब्रिज़ भी है जो एयरपोर्ट द्वीप को राजधानी माले से जोड़ेगा.

चीन मालदीव में 25 मंजिला अपार्टमेंट और हॉस्पिटल भी बना रहा है. साउथ चाइन मॉर्निंग पोस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले साल तीन लाख 6 हज़ार चीनी पर्यटक मालदीव गए. मालदीव में आने वाले कुल पर्यटकों का यह 21 फ़ीसदी है. पिछले साल अगस्त महीने में जब चीनी नौसैनिक जहाज माले पहुंचे तो भारत की चिंता और बढ़ गई थी.

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यामीन के शासनकाल में भारत दूर क्यों होता गया?

मार्च 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मालदीव का दौरा रद्द कर दिया था. कहा जा रहा है कि मोदी मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद को निर्वासित करने को लेकर नाराज़ थे. नशीद को भारत समर्थक राष्ट्रपति कहा जाता है.

भारत ने मालदीव को इस साल मिलान में आठ दिवसीय सैन्य अभ्यास में शामिल होने का आमंत्रण दिया था, लेकिन मालदीव ने इनकार कर दिया था.

मालदीव में वैध रूप से काम कर रहे भारतीयों के वीज़ा के नवीनीकरण से भी यामीन की सरकार ने इनकार कर दिया था. यामीन ने अपने इस रुख़ के लिए कोई तर्क नहीं दिया था.

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क्या चीनी निवेश से मालदीव को ख़तरा है?

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार इस छोटे से देश पर एक अनुमान के मुताबिक़ चीन का 1.3 अरब डॉलर का क़र्ज़ है. यह क़र्ज़ उसकी जीडीपी के एक तिहाई से भी ज़्यादा है. इन पैसों को मालदीव के इन्फ़्रास्ट्रक्चर में लगाया गया है.

मालदीव के निर्वासित पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद ने जनवरी में कहा था कि मालदीव के कुल विदेशी क़र्ज़ में चीन का हिस्सा 80 फ़ीसदी है. समाचार एजेंसी एएफ़पी से नशीद ने कहा था कि चीन ने कम से कम 16 छोटे द्वीप लीज पर लिए हैं और वो कई तरह के निर्माण कार्यों को अंजाम दे रहा है.

चुनाव के दौरान विपक्षी दल डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रवक्ता ने कहा था कि चीनी परियोजनाओं से मालदीव के क़र्ज़ के जाल में फँसने की आशंका है और यामीन सरकार में भ्रष्टाचार के भी संकेत मिल रहे हैं.

कई आलोचकों का कहना है कि बढ़ते क़र्ज़ के कारण मालदीव की स्थिति श्रीलंका की तरह हो सकती है. श्रीलंका को क़र्ज़ में डूबे होने के कारण हम्बनटोटा पोर्ट 99 सालों के लीज पर चीन को देना पड़ा था.

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हालांकि चीनी विदेश मंत्रालय इन आकलनों को ख़ारिज करता रहा है. चीनी विदेश मंत्रालय ने कहा है कि मालदीव में चीन की कोई राजनीति नहीं है. इसी साल फ़रवरी में चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गेंग शुआंग ने कहा था कि नशीद के आरोप बेबुनियाद हैं.

यामीन की हार के बाद कहा जा रहा है कि मालदीव के नए नेतृत्व को चीन और भारत के बीच संतुलन बनाकर आगे बढ़ना चाहिए.

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के चीनी अध्ययन केंद्र में प्रोफ़ेसर श्रीकांत कोंडापल्ली ने चीनी मीडिया से कहा है, ''चीन अब ख़ुद ही मालदीव में अपनी परियोजनाओं की समीक्षा करेगा. यामीन के कार्यकाल में चीन के साथ हुए फ़्री ट्रेड अग्रीमेंट की भी समीक्षा हो सकती है. पाकिस्तान और मलेशिया को नई सरकार में अपनी नीतियों पर विचार करना होगा.''

हालांकि कई विश्लेषकों का मानना है कि श्रीलंका में 2015 में सरकार बदली, लेकिन चीन का प्रभाव कम नहीं हुआ. ऐसे में मालदीव में सरकार बदलने से चीन बेदख़ल हो जाएगा, ऐसा कहना जल्दबाज़ी होगी.

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2015 में जब श्रीलंका में संसदीय चुनाव हुए तो कहा गया कि भारत ने मैत्रीपाला को सत्ता तक पहुंचाने में मदद की थी. तब महिंदा राजपक्षे को चीन समर्थक राष्ट्रपति माना जाता था और भारत चाहता था कि श्रीलंका में सत्ता परिवर्तन हो. हालिया घटनाक्रमों से लग रहा है कि मैत्रीपाला को भी भारत की तुलना में चीन की दोस्ती ज़्यादा रास आ रही है.

जब सिरीसेना सत्ता में आए थे तो उन्होंने राजपक्षे के कार्यकाल में शुरू की गईं चीन समर्थित परियोजनाओं को भ्रष्टाचार, ज़्यादा महंगा और सराकारी प्रक्रियाओं के उल्लंघन का हवाला देकर रद्द कर दिया था. हालांकि एक साल बाद ही सिरीसेना ने मामूली बदलावों के साथ सभी परियोजनाओं को बहाल कर दिया.

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