सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आज

  • 28 सितंबर 2018
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केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं को प्रवेश देने की मांग करने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट शुक्रवार को फ़ैसला सुना सकता है.

केरल के इस मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश करने पर रोक है क्योंकि यही वह आयुवर्ग है जिसमें महिलाओं को पीरियड्स आते हैं.

लिंग आधारित समानता को मुद्दा बनाते हुए महिला वकीलों के एक समुदाय ने 2006 में कोर्ट में याचिका डाली थी. दरअसल, हिंदू धर्म में पीरियड्स के दौरान महिलाओं को 'अपवित्र' माना जाता है और कई मंदिर इस कारण महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगा देते हैं.

सबरीमाला मंदिर के अधिकारियों ने पहले दावा किया था कि वे इस परंपरा को इसलिए मानते हैं क्योंकि भगवान अयप्पा, जिनका यह मंदिर है, वो "अविवाहित" थे.

प्रतिबंध का समर्थन करने वाले भी तर्क देते हैं कि यह परंपरा कई सालों से चली आ रही है.

वे ये भी तर्क देते हैं कि श्रद्धालुओं को मंदिर में आने के लिए कम से कम 41 दिनों तक व्रत रखना ज़रूरी होता है और शारीरिक कारणों से वे महिलाएं ऐसा नहीं कर सकतीं, जिन्हें पीरियड्स आते हैं.

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12 साल पहले दी गई थी चुनौती

इस मामले को कोर्ट में वकीलों ने साल 2006 में चुनौती दी थी मगर इसपर सुनवाई 2016 में शुरू हुई.

इस साल जुलाई में हुई सुनवाई में याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि इस परंपरा से भारत के संविधान में दी गई समानता की गारंटी का उल्लंघन होता है. उनका कहना था कि यह महिलाओं और उनके उपासना के अधिकार के प्रति एक पूर्वाग्रह है.

2016 में तो राज्य सरकार ने महिलाओं के प्रवेश का विरोध किया था, मगर हाल में हुई सुनवाइयों में उसने प्रवेश दिए जाने का समर्थन किया है.

याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व कर रहीं वकील इंदिरा जयसिंह का कहना है कि यह पंरपरा महिलाओं के लिए कलंक की तरह है और उन्हें अपनी पसंद के स्थान पर प्रार्थना करने का अधिकार मिलना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में संवैधानिक पीठ का गठन किया था ताकि यह देखा जाए कि यह परंपरा मौलिक अधिकारों का उल्लंघन तो नहीं कर रही. या फिर इसे संविधान के तहत 'आवश्यक धार्मिक प्रथा' माना जा सकता है या नहीं. संविधान का अनुच्छेद 25 अपने हिसाब से धर्म का अनुसरण करने की स्वतंत्रता देता है.

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सबरीमाला मंदिर का महत्व क्या है?

सबरीमाला भारत के प्रमुख हिंदू मंदिरों में एक है. पूरी दुनिया से लाखों श्रद्धालु आशीर्वाद लेने के लिए इस मंदिर परिसर में आते हैं.

मंदिर में प्रवेश के लिए तीर्थयात्रियों को 18 पवित्र सीढ़ियां चढ़नी होती हैं. मंदिर की वेबसाइट के मुताबिक, इन 18 सीढ़ियों को चढ़ने की प्रक्रिया इतनी पवित्र है कि कोई भी तीर्थयात्री 41 दिनों का कठिन व्रत रखे बिना ऐसा नहीं कर सकता.

श्रद्धालुओं को मंदिर जाने से पहले कुछ रस्में भी निभानी पड़ती हैं. सबरीमाला के तीर्थयात्री काले या नीले रंग के कपड़े पहनते हैं और जब तक यात्रा पूरी न हो जाए, उन्हें शेविंग की इजाज़त भी नहीं होती. इस तीर्थयात्रा के दौरान वे अपने माथे पर चंदन का लेप भी लगाते हैं.

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महिलाओं को मंदिर में प्रवेश दिलाने का अभियान

साल 2016 में छात्राओं के एक समूह ने इस परंपरा के ख़िलाफ़ प्रदर्शन शुरू किए थे. यह अभियान सबरीमाला मंदिर के प्रमुख के बयान के विरोध में छेड़ा गया था.

प्रयार गोपालकृष्णन ने कहा था कि वह महिलाओं को तभी मंदिर में प्रवेश की इजाज़त देंगे, जब ऐसी मशीन का आविष्कार हो जाएगा जो यह पता लगा सके कि वे 'पवित्र' हैं या नहीं. उनका मतलब ऐसी मशीन से था जो यह पुष्टि कर पाए कि महिलाओं के पीरियड्स नहीं आ रहे हैं.

गोपालकृष्णन ने कहा था, "एक ऐसा समय आएगा जब लोग मांग करेंगे कि सभी महिलाओं को पूरा साल मंदिर में आने से रोक दिया जाए."

उन्होंने कहा था, "आजकल ऐसी मशीनें हैं जो शरीर को स्कैन कर सकती हैं और हथियारों का पता लगा सकती हैं. एक दिन ऐसी मशीन बनाई जाएगी जो स्कैन कर सकेगी कि यह महिलाओं के मंदिर में प्रवेश के लिए 'सही समय' है या नहीं. जब इस तरह की मशीन का आविष्कार हो जाएगा, हम महिलाओं को अंदर आने की इजाज़त देने पर बात करेंगे."

गोपालकृष्णन इन टिप्पणियों का कड़ा विरोध हुआ और महिलाओं ने फेसबुक पर #HappyToBleed अभियान छेड़ा और उनके बयान को 'लिंगभेदी' बताया.

इस अभियान को शुरू करने वाली निकिता आज़ाद ने बीबीसी को बताया कि महिलाओं के मंदिर में प्रवेश का कोई 'सही समय' नहीं है और महिलाओं को 'जहां मर्ज़ी और जब मर्ज़ी' जाने का अधिकार होना चाहिए.

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