जस्टिस इंदू मल्होत्रा क्यों 'सबरीमाला' पर बाकी जजों से असहमत थीं

  • 28 सितंबर 2018
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सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक सुप्रीम कोर्ट ने हटा दी है.

सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक़ मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक संविधान की धारा-14 का उल्लंघन है.

सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच के मुताबिक़ हर किसी को बिना किसी भेदभाव के मंदिर में पूजा करने की अनुमति मिलनी चाहिए.

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सबरीमाला मंदिर के मुख्य पुजारी कंदरु राजीवरु ने कहा है कि वो सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से निराश हैं, लेकिन वो कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए महिलाओं को मंदिर में प्रवेश करने देंगे.

लेकिन संवैधानिक बेंच में इकलौती महिला जज इंदू मल्होत्रा ने भी इस मामले में एक अलग राय पेश की.

जस्टिस इंदू मल्होत्रा ने कहा कि कोर्ट को धार्मिक मान्यताओं में दख़ल नहीं देना चाहिए क्योंकि इसका दूसरे धार्मिक स्थलों पर भी असर पड़ेगा.

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार जस्टिस इंदू मल्होत्रा ने कहा, देश के जो गहरे धार्मिक मुद्दे हैं, उन्हें कोर्ट को नहीं छेड़ना चाहिए ताकि देश में धर्मनिरपेक्ष माहौल बना रहे.

उन्होंने कहा:

- बात अगर 'सति प्रथा' जैसी सामाजिक बुराइयों की हो तो कोर्ट को दख़ल करना चाहिए. लेकिन धार्मिक परंपराएं कैसे निभाई जाएं, इसपर कोर्ट को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए.

- समानता का सिद्धांत, अनुच्छेद-25 के तहत मिलने वाले पूजा करने के मौलिक अधिकार की अवहेलना नहीं कर सकता.

- मेरी राय में तर्कसंगतता के विचारों को धर्म के मामलों में नहीं लाया जा सकता है.

- ये फ़ैसला केवल सबरीमाला तक ही सीमित नहीं रहेगा. इस फ़ैसले के अन्य पूजा स्थलों पर भी दूरगामी प्रभाव देखने को मिलेंगे.

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'बड़ी लड़ाई की शुरुआत'

सुप्रीम कोर्ट में मौजूद बीबीसी संवाददाता नितिन श्रीवास्तव ने बताया कि जब कोर्ट में चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा ने सबरीमाला मामले पर फ़ैसला पढ़ना शुरू किया तो सभी के चेहरे पर मुस्कुराहट थी.

सुप्रीम कोर्ट परिसर में जो गलियारा कोर्ट हाउस की तरफ जाता है वो पूरी तरह से सामाजिक कार्यकर्ताओं से भरा पड़ा था.

ज़्यादातर की राय थी कि मासिक धर्म के दौरान मंदिर परिसर में महिलाओं को प्रवेश देना वाक़ई कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय है.

जिस वक़्त ये फ़ैसला आया, कई महिलाओं ने अदालत में एक-दूसरे को गले लगाकर बधाई दी.

साल 2015 में सोशल मीडिया पर 'हैप्पी टू ब्लीड' नाम की मुहिम शुरू करने वाली पटियाला की निकिता आज़ाद ने भी सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का स्वागत किया है.

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निकिता ने बीबीसी से कहा, "सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर आया सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला ऐतिहासिक है. इसका बड़ा असर दिखाई देगा. सुप्रीम कोर्ट ने मासिक धर्म को कलंक मानने से मना कर दिया है. अपने फ़ैसले में कोर्ट ने समानता को धर्म से ऊपर रखा है. इसे एक बड़ी लड़ाई की शुरुआत के तौर पर देखा जा सकता है."

सबरीमाला मंदिर का महत्व

  • सबरीमाला भारत के प्रमुख हिंदू मंदिरों में से एक है.
  • पूरी दुनिया से लाखों श्रद्धालु आशीर्वाद लेने के लिए इस मंदिर परिसर में आते हैं.
  • मंदिर में प्रवेश के लिए तीर्थयात्रियों को 18 पवित्र सीढ़ियाँ चढ़नी होती हैं.
  • मंदिर की वेबसाइट के मुताबिक़, इन 18 सीढ़ियों को चढ़ने की प्रक्रिया इतनी पवित्र है कि कोई भी तीर्थयात्री 41 दिनों का कठिन व्रत रखे बिना ऐसा नहीं कर सकता.
  • केरल के इस मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश करने पर रोक लगी थी क्योंकि यही वह आयुवर्ग है जिस दौरान महिलाओं को पीरियड्स आते हैं.
  • सबरीमाला मंदिर के अधिकारियों ने पहले दावा किया था कि वे इस परंपरा को इसलिए मानते हैं क्योंकि भगवान अयप्पा, जिनका यह मंदिर है, वो 'अविवाहित' थे.
  • श्रद्धालुओं को मंदिर जाने से पहले कुछ रस्में भी निभानी पड़ती हैं.
  • सबरीमाला के तीर्थयात्री काले या नीले रंग के कपड़े पहनते हैं और जब तक यात्रा पूरी न हो जाए, उन्हें शेविंग की इजाज़त भी नहीं होती.
  • इस तीर्थयात्रा के दौरान वे अपने माथे पर चंदन का लेप भी लगाते हैं.

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