नज़रिया: 'उन्नाव, अलीगढ़ और लखनऊ' यूपी पुलिस के लिए दाग़

  • 1 अक्तूबर 2018
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लखनऊ शहर के एक उन्नत इलाक़े में अमरीकी कंपनी एप्पल के लिए काम करने वाले युवक की हत्या, इस बात का साफ़ प्रमाण है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पुलिस की नज़र में इंसान जान की क़ीमत कितनी कम है.

योगी आदित्यनाथ एक मठ के प्रमुख से उठकर, देश के सबसे अधिक आबादी वाले राज्य के मुख्यमंत्री बने हैं. उनकी पुलिस किस तरह से न्याय देने के 'पश्चिमी देशों वाले' निरंकुश रवैये को अपना रही है, ये भी इस घटना से साफ़ गया है.

सूबे में अपराध रोकने के नाम पर आदित्यनाथ योगी के नेतृत्व में यूपी पुलिस ने 'एनकाउंटर' जैसे मध्यकालीन साधन अपना लिये हैं, जिन्होंने पुलिस को एक ऐसा शिकारी बना दिया है जो ख़ुद को ही क़ानून समझने लगे हैं.

38 साल के विवेक तिवारी 28 सितंबर की रात अपनी कंपनी की एक पार्टी से घर लौट रहे थे जब उनका सामना यूपी पुलिस के एक जवान से हुआ. पुलिसवाले का दावा है कि उन्होंने विवेक की कार को रोकने की कोशिश की थी.

लेकिन सहज ज्ञान यही कहता है कि देर रात अगर कोई कार रोके तो रुकना ठीक नहीं है. फिर उत्तरप्रदेश में तो इसे लेकर (सुरक्षा पर) चर्चा हमेशा से ही रही है. विवेक ने भी शायद उसी बात का पालन किया.

ऐसा उन्होंने शायद इसलिए भी किया हो कि एक महिला सहकर्मी उनके साथ कार में मौजूद थीं जिन्हें विवेक घर छोड़ने वाले थे.

लेकिन कार नहीं रोकने के जवाब में यूपी पुलिस के जवान ने पिस्टल निकालकर उनपर गोली चलाना ज़्यादा ठीक समझा. पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के अनुसार, गोली कार के अगले शीशे को भेदती हुई विवेक के गले के पास लगी और उनकी मौत हो गई.

विवेक की सहकर्मी सना ख़ान जो कि इस मामले की अकेली चश्मदीद हैं, वो अभी भी सदमे से बाहर नहीं निकल पाई हैं.

लेकिन उन्हें ये ठीक से याद है कि विवेक ने कैसे सड़क के बीच में खड़ी पुलिस की मोटरसाइकल को बचाते हुए अपनी कार आगे निकाली थी. लेकिन ऐसा करने की सज़ा पुलिसवाले ने उन्हें दी.

ब्रिटिश पुलिस से बदतर यूपी पुलिस

इस घटना ने लोगों में अनुशासन नहीं बल्कि पुलिस का डर बैठाया है. अगर विवेक ने गाड़ी रोक भी ली होती तो क्या उनके साथ हाथापाई की संभावना बिल्कुल नहीं होती? या उससे बदतर भी हो सकता था.

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आख़िरकार रात में पुलिस द्वारा लोगों के उत्पीड़न के बारे में किसने नहीं सुना है. ऐसे में विवेक ने जो अपनी समझ से चुना, उसका नतीजा इतना ख़ौफ़नाक साबित हुआ.

साल 1960 में इलाहबाद कोर्ट के नामी न्यायाधीश रहे ए एन मुल्ला ने अपने एक फ़ैसले में कहा था, "मैं ये पूरी ज़िम्मेदारी के साथ कह सकता हूँ कि पूरे देश में एक भी ग्रुप नहीं है जिसके अपराध का रिकॉर्ड, उस संगठित इकाई के क्राइम रिकॉर्ड से टक्कर ले सके जिसे इस देश में भारतीय पुलिस बल के नाम से जाना जाता है."

जब भी कोई ऐसी घटना सुनाई पड़ती है जिसमें पुलिस द्वारा किसी को गोली मारे जाने का उल्लेख होता है, हर बार मुझे 1960 का कोर्ट का वो फ़ैसला याद आ जाता है.

निश्चित तौर पर यूपी पुलिस के दृष्टिकोण में रत्ती भर बदलाव नहीं आया है. या ये कहें कि वक़्त के साथ पुलिस का दृष्टिकोण ख़राब ही हुआ है, तो ग़लत नहीं होगा.

कुछ महीने पहले ही यूपी के पुलिस चीफ़ रहे सुलखान सिंह ने एक इंटरव्यू में कहा था कि ब्रिटिश काल की पुलिस भी ईमानदारी और व्यवहार के मामले में तुलनात्मक रूप से आज की यूपी पुलिस से बेहतर थी.

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उन्होंने तो ये तक कहा था कि भले ही ब्रिटिश शासन में पुलिस भारतीय लोगों के प्रति असंवेदनशीलता रही हो, लेकिन उस दौर में फ़र्ज़ी जाँच या एनकाउंटर नहीं होते थे.

विवेक तिवारी का मामला कोई पहला मामला नहीं है, जब पुलिस ने किसी शख़्स को कार नहीं रोकने पर गोली मार दी हो. लेकिन जो बदलाव अब महसूस किया जा सकता है वो ये है कि हत्या का अभियुक्त पुलिसवाला एक घमंडी आदमी की शैली में ख़ुलेआम बयानबाज़ी भी कर रहा है.

वो कैमरे पर बिना किसी डर के अपने बयान बदल रहा है और उसके साथी थाने में मुस्कुरा रहे हैं.

पुलिसवाले का आरोप है कि विवेक तिवारी उनकी मोटरसाइकल पर कार चढ़ाकर, उन्हें मारना ही चाहते थे. लेकिन ज़्यादा चौंकाने वाली बात ये थी कि शुरुआत में उनके वरिष्ठ पुलिस अधिकारी उनके दावों को सही भी मान रहे थे.

यदि मीडिया ने लगातार दबाव न बनाया होता तो लखनऊ के पुलिस अधीक्षक भी अपने सिपाही की बात ख़ुशी-ख़ुशी दोहरा रहे होते. केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह के व्यक्तिगत हस्तक्षेप के बाद ही गोली चलाने वाले सिपाही प्रशांत चौधरी के ख़िलाफ़ धारा 302 के तहत क़त्ल का मामला दर्ज किया गया.

राजनाथ सिंह ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और पुलिस महानिदेशक ओपी सिंह से बात की. लखनऊ राजनाथ सिंह का संसदीय क्षेत्र भी है, वो मूकदर्शक कैसे बने रह सकते थे?

और फिर मुख्यमंत्री और पुलिस महानिदेशक ने घटना की आलोचना की और दोषियों पर सख़्त कार्रवाई सुनिश्चित करने का बयान दिया. पीड़ित परिवार का गुस्सा शांत करने के लिए सरकार ने 25 लाख रुपए की सहायता राशि की घोषणा भी कर दी और मृतक की पत्नी को लखनऊ नगर निगम में क्लर्क की नौकरी भी दे दी.

12 महीने में 1600 एनकाउंटर

यही नहीं मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने 'परिवार के चाहने पर' मुक़दमे को सीबीआई को सौंपने पर भी सहमति जता दी.

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हालांकि, सभी ये सवाल ज़रूर पूछ रहे हैं कि क्या मुख्यमंत्री एनकाउंटर को लेकर अपनी नीति पर पुनर्विचार करेंगे. स्पष्ट तौर पर इसी नीत ने 'गोली चलाने को उत्सुक' पुलिसवालों का मनोबल बढ़ाया है. उत्तर प्रदेश के पुलिसवालों को अब आम तौर पर ये लगता है कि वो क़त्ल करके भी आसानी से बच जाएंगे.

बीते 12 महीनों में योगी की पुलिस ने प्रदेशभर में 1600 से अधिक एनकाउंटर किए हैं. इनमें 67 लोग मारे गए हैं जिनमें से अधिकतर ऐसे छोटे-मोटे अपराधी थे जिन पर पुलिस ने ईनाम घोषित करके उन्हें बड़ा बना दिया था.

एनकाउंटर में मारे गए कथित अपराधियों में से ज़्यादातर मुसलमान, दलित और अन्य पिछड़ा वर्गों से हैं. मुठभेड़ों के ये आंकड़े योगी सरकार के किसी वर्ग से भेदभाव न करने और सबका साथ सबका विकास के दावों की पोल खोलते हैं.

अलीगढ़ में जिस तरह कथित एनकाउंटर की लाइव कवरेज़ के लिए मीडिया कर्मियों को बुलाया गया वो उन्हीं पूर्वाग्रहों को मज़बूत करता है जिनसे यूपी पुलिस अपराध नियंत्रण कर रही है.

कैसे छवि सुधरेगी?

बीजेपी के कई नेता भी ये बात मानते हैं कि एनकाउंटर अभियान सरकार की अपराध के ख़िलाफ़ सख़्त छवि स्थापित करने के लिए ही चलाया जा रहा है. सरकार ये संदेश देना चाहती है कि वो क़ानून व्यवस्था को लेकर गंभीर है.

वो क़ानून व्यवस्था जो कथित तौर पर पूर्ववर्ती समाजवादी सरकार के कार्यकाल में बेहद चरमरायी हुई थी. लेकिन तथ्य ये हैं कि जघन्य अपराध पहले की तरह ही हो रहे हैं और बलात्कार के आंकड़ें बढ़ रहे हैं. बिडम्बना ये है कि इस सबके बावजूद मुख्यमंत्री की प्राथमिकता कथित 'लव जिहाद' रोकना, एंटी रोमियो स्कवायड बनाना और 'गो हत्या' रोकना ही है.

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उन्नाव को वो चर्चित मामला तो हम सबको याद ही है जिसमें एक कथित गैंगरेप पीड़िता के पिता को थाने के अंदर ही बेरहमी से पीट-पीटर मार दिया गया. पुलिस ने आंखें मूंद लीं क्योंकि ये सब एक भाजपा विधायक के कहने पर हो रहा था. घटना के मीडिया में आने और हाई कोर्ट के स्वतः संज्ञान लेने के बाद ही प्रदेश सरकार ने कार्रवाई की और विधायक को गिरफ़्तार कर लिया गया.

प्रकाश सिंह पुलिस सुधार समिति की सिफ़ारिशों और सुप्रीम कोर्ट की ओर से निर्धारित दिशा-निर्देशें का पालन करके ही सरकार 'पुलिस व्यवस्था के बिगड़ रहे स्वास्थ्य' को ठीक कर सकती है.

इनमें से एक अहम सिफ़ारिश है पुलिस की क़ानून व्यवस्था बनाए रखने की भूमिका को जांच करने की भूमिका से अलग करना. प्रकाश सिंह पंजाब और यूपी पुलिस के प्रमुख रहने के अलावा बीएसएफ़ के महानिदेशक भी रह चुके हैं. उन्होंने एक स्वतंत्र जांच एजेंसी की स्थापना की स्पष्ट सिफ़ारिश की थी.

पांच साल पहले भारत के सुप्रीम कोर्ट ने भी इन सिफ़ारिशों पर अपनी मुहर लगा दी थी. लेकिन राज्य सरकारें इन्हें नज़रअंदाज़ करती रहीं. और अब नतीजा बिलकुल साफ़ है.

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एप्पल के कर्मचारी विवेक तिवारी की मौत के मामले की जांच हत्या के अभियुक्तों के सहकर्मी ही करेंगे. वो पुलिस कर्मी जो क़ानून व्यवस्था लागू करने के अलावा आपराधिक मामलों की जांच करने की भूमिका भी निभाते हैं. और इस बात से कौन इनकार कर सकता है कि ख़ून पानी से गाढ़ा होता है.

ऐसे में अगर पुलिस के जांचकर्ता अपने सहकर्मियों को बचाने के लिए मामले को हल्का करने की कोशिशें करें तो किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए. यही वजह है कि ऐसे मामले अक्सर सीबीआई के पास पहुंच जाते हैं. सीबीआई को आज भी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच एजेंसी तो माना ही जाता है, भले ही ऐसा नहीं हो.

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