BBC SPECIAL: लद्दाख में बसे पांच हज़ार 'शुद्ध आर्य' लोगों से एक मुलाक़ात

  • 2 अक्तूबर 2018
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लद्दाख के दूर-दराज अंचल में बसे करीब 5 हज़ार ब्रोकपा खुद को दुनिया के आखिरी बचे हुए शुद्ध आर्य मानते हैं. क्या यह वाकई वो जाति है जिसे नाज़ी 'मास्टर रेस' मानते थे? या फिर ये दावा सिर्फ़ मिथक है जिसे बरक़रार रखना इन लोगों के लिए फ़ायदे का सौदा है.

हमारे दौर की सबसे चर्चित युद्धभूमि को करीब से देखने का उत्साह सफर को बोझिल नहीं होने देता.

लेह से उत्तर-पश्चिम की ओर बढ़ते हुए पहला ख्याल करगिल का ही आता है लेकिन बीबीसी की टीम इस सड़क पर कुछ और ढूंढने निकली थी.

करीब 4 घंटे तक लेह से बटालिक तक का रास्ता बिल्कुल हाइवे जैसा है. इसके बाद सड़क तंग होकर सिंधु नदी का किनारा पकड़ लेती है.

कहीं कच्चे, कहीं पक्के रास्ते पर तकरीबन दो घंटे और चलने के बाद आप गारकोन गांव पहुंचते हैं.

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गांव से ठीक पहले बियामा में आपका ध्यान सबसे पहले 2015 में आई बाढ़ में डूबे घरों की ओर जाता है.

नंगे, पथरीले पहाड़ों पर हरे पैबंद जैसे खेत स्थानीय लोगों की मेहनत भरी ज़िंदगी की गवाही देते हैं लेकिन इस जगह की सबसे बड़ी ख़ासियत खुद ये लोग हैं.

क्यों ख़ास हैं ब्रोकपा?

गारकोन के बच्चे, बूढ़े और जवान अब शहरी दिखने वाले लोगों को देखकर हैरान नहीं होते. वे अच्छी तरह जानते हैं कौन सी जिज्ञासा उन्हें यहां खींचकर लाई है.

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दुनिया के आख़िरी शद्ध आर्य

गांव के किसी भी शख्स से 5 मिनट की बातचीत भी आपको इस सवाल तक ले ही आती है. चंडीगढ़ में पढ़ाई कर रही सोनम ल्हामो बताती हैं कि शुद्ध आर्य होने की बात उनके समुदाय में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है.

वो कहती हैं, "आपने पढ़ा होगा आर्य लंबे और गोरे होते थे. आप यहां की आबादी में भी यही बात देख सकते हैं. हम लोग भी प्रकृति की पूजा करते हैं. हम अपने कल्चर को ही अपने प्योर आर्यन होने का सबसे बड़ा सुबूत मानते हैं."

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ये देखा जा सकता है कि बियामा, गारकोन, दारचिक, दाह और हानू के लोगों की शक्लें बाकी लद्दाखियों के मंगोल नैन-नक्श से अलग हैं.

ब्रोकपा नाम उन्हें लद्दाख की बाकी आबादी की ओर से ही मिला है. स्थानीय भाषा में इसका मतलब घुमंतु होता है.

बौद्ध होने के बावजूद ब्रोकपा देवी-देवताओं में यकीन करते हैं और आग जैसी कुदरती ताकतों को पूजते हैं. बलि देने की प्रथा भी अब तक ज़िंदा है हालांकि आज की पीढ़ी में उसका विरोध होने लगा है.

आग और प्रकृति की दूसरी ताकतों को पूजने और बलि देने का ज़िक्र वेदों में भी मिलता है.

हालांकि, ब्रोकपा संस्कृति में बकरियों को गायों से ज़्यादा ऊंचा दर्जा हासिल है. बदलते वक्त के साथ कहीं-कहीं अब गोवंश नज़र आने लगा है लेकिन बकरी का दूध और घी अब भी इन लोगों की पहली पसंद है.

ज़ाहिर है, बाकी लद्दाखी संस्कृति से अलग होना ही उनका शुद्ध आर्य का सुबूत नहीं हो सकता.

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इसी समुदाय से ताल्लुक रखने वाले स्वांग गैलसन करगिल के कॉलेज में पढ़ाते हैं. उनकी दिलचस्पी अपने इतिहास की तह तक जाने में है.

वो बताते हैं, 'कई इतिहासकारों ने इस बात के संकेत दिए हैं. मसलन, जर्मन विशेषज्ञ एएच फ्रैंकी ने अपनी किताब 'द हिस्ट्री ऑफ वेस्टर्न तिब्बत' में हमारी आबादी को आर्यन स्टॉक का नाम दिया है.'

हाल ही में अपनी भाषा का शब्दकोश छपवा चुके गैलसन संस्कृत के साथ उनकी भाषा की समानताएं भी गिनवाते हैं.

उनके मुताबिक, 'बाकी लद्दाखी भाषाओं से इतर हमारी ज़ुबान में संस्कृत के कई शब्द मिलते हैं.

उदाहरण के लिए घोड़े के लिए अश्व, सूरज के लिए सूर्य आदि. यही बात हम अंकों के बारे में भी कह सकते हैं.'

गैलसन के मुताबिक एक मिथक ये भी है कि उनका समुदाय सम्राट सिकंदर के सैनिकों का वशंज हैं हालांकि पाकिस्तान की कलाश जाति, हिमाचल प्रदेश में मलाणा और बड़ा भंगाल इलाके के लोग भी कुछ ऐसा ही दावा करते हैं.

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ब्रोकपा लोकगीतों में इस बात का ज़िक्र मिलता है कि उनके पूर्वज करीब सातवीं सदी में गिलगित-बलतिस्तान से आकर बटालिक के आसपास के इलाकों में बसे होंगे.

उनका सबसे बड़ा त्योहार अक्टूबर में फसल कटाई के वक्त मनाया जाने वाला बोनोना है.

हर ब्रोकपा गांव बारी-बारी से इसे आयोजित करता है. एक साल पाकिस्तान की ओर बसे उनके गांव गनोक के लिए भी छोड़ा जाता है.

हालांकि, ये कहना मुश्किल है कि उस ओर इस परंपरा को अब भी निभाया जाता है या नहीं.

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क्या है आर्यों का इतिहास?

आज के भारत में ये सवाल सियासत से परे नहीं है लेकिन ये सच है कि आर्यों को लेकर कोई एक राय नहीं है.

बीसवीं सदी तक माना जाता रहा कि इंडो-यूरोपीय भाषा बोलने वाला ये समूह मध्य एशिया से तकरीबन 2000-1500 ईसा पूर्व भारत आया होगा.

मतभेद इस बात पर रहा कि ये लोग हमलावर थे या फिर फिर भोजन के बेहतर मौके तलाशने वाले घुमंतु. पिछले 2 दशकों में आर्यों को भारतीय का मूल निवासी बताने वाली थ्योरी ने भी ज़ोर पकड़ा है.

ब्रिटेन की हडर्सफील्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मार्टिन पी रिचर्ड्स की अगुवाई में 16 वैज्ञानिकों के दल ने सच जानने के लिए मध्य एशिया, यूरोप और दक्षिण एशिया की आबादी के वाई-क्रोमोज़ोम का अध्ययन किया. वाई-क्रोमोज़ोम सिर्फ पिता से पुत्र को मिलता है.

इस शोध के मुताबिक कांस्य युग (3000-1200 ईसा पूर्व) में पलायन करने वालों में ज़्यादातर पुरुष होते थे.

पिछले साल मार्च में छपे इस रिसर्च पेपर ने लिखा है, 'हमारे विश्लेषण से पता चलता है कि स्त्रियों के जीन्स लगभग पूरी तरह देसी हैं और 55 हज़ार पहले यहां बसे पहले इंसानों से काफी मेल खाते हैं लेकिन पुरुषों के जीन्स अलग हैं जिनका ताल्लुक दक्षिण-पश्चिम एशिया और मध्य एशिया से रहा है.'

हालांकि शोध का दावा है कि पलायन का ये सिलसिला हज़ारों साल तक चला होगा.

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अगर आर्य वाकई मध्य एशिया के कैस्पियन सागर के आसपास घास के मैदानों से निकलकर दक्षिण एशिया आए होंगे तो बहुत मुमकिन है कि उनका रास्ता गिलगित-बल्टिस्तान से होकर गुज़रा हो.

गैलसन भी ब्रोकपाओं के डीएनए की जांच के लिए कोशिश कर रहे हैं.

उनका भी मानना है कि इस विषय पर अभी और पड़ताल की ज़रूरत है. 'आर्यों की ऐतिहासिक छवि विजेताओं की रही है. यही वजह है कि आज के ब्रोकपा युवाओं में इस पहचान को लेकर उत्साह बढ़ा है लेकिन हम मानते हैं कि इस दावे की और ज़्यादा खोजबीन की ज़रूरत है.'

प्रेग्नेंसी टूरिज़्म के किस्से

इंटरनेट के आने के बाद ब्रोकपाओं की इस पहचान ने दुनिया भर के लोगों का ध्यान खींचा है. इन गांवों में जर्मन महिलाओं के 'शुद्ध आर्य बीज' की चाह में यहां आने के किस्से मशहूर हैं.

साल 2007 में फिल्मकार संजीव सिवन की डॉक्यूमेंटरी में एक जर्मन महिला कैमरे पर ये बात स्वीकार करती सुनी जा सकती है.

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ज़्यादातर ब्रोकपा इस बारे में चर्चा से बचते हैं.

लेकिन बटालिक में दुकान चलाने वाले इस समुदाय के एक शख्स ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, 'एक जर्मन महिला ने कई साल पहले मुझे लेह के होटलों में अपने साथ रखा. गर्भवती होने के बाद वो महिला जर्मनी वापस लौट गई. कुछ साल बाद वो अपने बच्चे के साथ मिलने वापस भी आई थी.'

क्या चाहते हैं आज के ब्रोकपा?

ब्रोकपाओं की मौजूदा पीढ़ी में पढ़ाई पर ख़ासा ज़ोर है. लड़कियों को पढ़ने और करियर बनाने के लिए बराबरी के मौके मिलते हैं लेकिन नौकरियां सीमित हैं.

कमाई का सबसे बड़ा ज़रिया या तो खुबानी की बाग़वानी या फिर सेना और बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन से मिलने वाली मज़दूरी है.

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बिजली अब भी सुबह-शाम सिर्फ एक घंटे रहती है. लेकिन जैसे-जैसे सैलानियों की आमद बढ़ रही है, तरक्की के नए रास्ते भी खुल रहे हैं.

मोबाइल की पैठ बढ़ने के साथ ब्रोकपा नौजवानों ने सरहद पार गिलगित के नौजवानों के साथ सोशल मीडिया के ज़रिए संपर्क भी कायम किया है.

ल्हामो बताती हैं, 'वो लोग भी हमारी भाषा में बात करते हैं और गर्व से कहते हैं कि वो आर्य हैं,'

आज की पीढ़ी के कई ब्रोकपाओं से हमने पूछा कि वो अपने गांवों में ही रोज़गार को प्राथमिकता देंगे या मौका मिलने पर किसी शहर में बसना पसंद करेंगे. हमें उत्तर मिला-जुला मिला.

गैलसन के लफ्ज़ों में 'रोज़ी-रोटी के साथ ही अपनी टपहचान' को बचाए रखना आज हमारे लिए सबसे बड़ा मसला है.'

21वीं सदी के इन शुद्ध आर्यों की जंग रियासतों के लिए नहीं, रोज़गार के लिए है. लेकिन अगर ये पहचान गंवाकर मिली तो इस जंग में जीत अधूरी ही रहेगी.

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