नए चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई हैं पारदर्शिता के मुरीद

  • 3 अक्तूबर 2018
जस्टिस गोगोई, RanjanGogoi, Ranjan Gogoi, 46th Chief Justice of India इमेज कॉपीरइट Getty Images

भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने जब अपना पद छोड़ते हुए सुप्रीम कोर्ट के सबसे वरिष्ठ जज रंजन गोगोई को अपने उत्तराधिकारी के रूप में नामांकित किया तब भारत के उदारवादी तबकों में लोगों ने राहत की सांस ली होगी.

क्योंकि कई लोग ये मानते थे कि जस्टिस गोगोई को दरकिनार कर दिया जाएगा.

हाल ही में गोगोई ने तीन अन्य वरिष्ठतम जजों के साथ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी. यह कहा गया था कि सुप्रीम कोर्ट में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है क्योंकि चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा कुछ ख़ास मामलों की सुनवाई के लिए चुने हुए लोगों को नियुक्त कर रहे थे. इन लोगों ने ये चेतावनी दी कि लोकतंत्र ख़तरे में है.

दीपक मिश्रा ने क्यों नहीं तोड़ी परंपरा?

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के समय एक डर छाया हुआ था कि सरकार किसी ऐसे व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में स्वीकार नहीं करेगी जिसकी छवि स्पष्ट तौर पर आज़ाद हो और राजनीतिक दबाव के सामने झुकने वाले शख्स की ना हो.

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लेकिन वर्तमान केंद्र सरकार इस समय तमाम आलोचनाओं में घिरी हुई है. ऐसे में मोदी सरकार सुप्रीम कोर्ट में सबसे वरिष्ठतम जस्टिस को मुख्य न्यायाधीश बनाए जाने की परंपरा तोड़ने के बाद पैदा होने वाली समस्याओं से बच सकती है. विशेषकर उस समय में जब देश में आम चुनाव आने वाले हों.

पर्यवेक्षकों का कहना है कि संभवत: इसी वजह से नियुक्तियों में अपनाई गई परंपरा को एक जीत के रूप में देखा गया.

मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने भी परंपरा के हिसाब से सबसे वरिष्ठतम जज को मुख्य न्यायाधीश के पद के लिए नामांकित किया.

ऐसे में उन्होंने और सरकार ने ज़रूर ही ये समझ लिया होगा कि अगर ये परंपरा टूटती है तो इसके बाद भारी आलोचना का सामना करना पड़ेगा.

क्योंकि गोगोई साल 2018 के जनवरी महीने में ही सार्वजनिक रूप से न्याय व्यवस्था के कामकाज की आलोचना कर चुके हैं.

कार्यकारिणी हमेशा से न्याय व्यवस्था को नियंत्रित करना चाहती थी. लेकिन भारतीय न्याय व्यवस्था के इतिहास में तमाम ऐसे जज रहे हैं जिनकी निरपेक्ष छवि के चलते ये करना कभी आसान नहीं रहा है.

जब नेहरू ने की ऐसी ही कोशिश

साल 1951 के नवंबर महीने में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू नहीं चाहते थे कि सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम न्यायाधीश पतंजलि शास्त्री मुख्य न्यायाधीश के पद पर आसीन हों.

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लेकिन उनके सहयोगियों ने उन्हें सलाह दी कि अगर किसी जूनियर जज़ को मुख्य न्यायाधीश बनाया गया तो सुप्रीम कोर्ट के छह न्यायाधीश अपने पदों से इस्तीफ़ा दे देंगे. तब जवाहर लाल नेहरू ने अपना फ़ैसला बदल दिया.

लेकिन साल 1973 में जज एएन रे को तीन वरिष्ठतम न्यायाधीशों को दरकिनार करके मुख्य न्यायाधीश बनाया गया.

तब जवाहरलाल नेहरू की बेटी इंदिरा प्रधानमंत्री थीं और इमरजेंसी के दौरान न्याय व्यवस्था पर नियंत्रण रखने के नाम पर उन्होंने जस्टिस एच आर खन्ना को दरकिनार करके जस्टिस एम एच बेग को मुख्य न्यायाधीश बना दिया.

जब गोगोई के पिता ने की भविष्यवाणी

हाल ही में रिलीज़ हुई एक किताब 'गुवाहाटी हाईकोर्ट, इतिहास और विरासत' में जस्टिस गोगोई के बारे में ख़ास जानकारी दी गई है.

ये किताब उस किस्से का ज़िक्र करती है जब एक बार जस्टिस गोगोई के पिता केशब चंद्र गोगोई (असम के पूर्व मुख्यमंत्री) से उनके एक दोस्त ने पूछा कि क्या उनका बेटा भी उनकी ही तरह राजनीति में आएगा?

इस सवाल पर जस्टिस गोगोई के पिता ने कहा कि उनका बेटा एक शानदार वकील है और उसके अंदर इस देश के मुख्य न्यायाधीश बनने की क्षमता है.

पारदर्शिता के पक्षधर हैं जस्टिस गोगोई

जस्टिस गोगोई इस समय सुप्रीम कोर्ट के उन 11 न्यायाधीशों में शामिल हैं जिन्होंने अपनी संपत्ति से जुड़ी जानकारी को सार्वजनिक कर दिया है.

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उनकी संपत्ति, जेवर और नकदी से जुड़ी जानकारी बताती है कि वह कितना साधारण जीवन जीते हैं. उनके पास एक कार भी नहीं है. उनकी मां और असम की मशहूर समाजसेवी शांति गोगोई ने उन्हें कुछ संपत्ति मिली है जो कि उनके पास मौजूद हैं.

इसके साथ ही संपत्ति से जुड़ी जानकारी में कोई भी बदलाव आने के बाद वे उसे घोषित भी करते हैं.

हालांकि, आज भी कई न्यायाधीशों ने अपनी संपत्तियों की घोषणा नहीं की है.

जबकि साल 1997 में एक फुल कोर्ट मीटिंग के दौरान सर्वसम्मति से ये प्रस्ताव पास हुआ था कि सभी न्यायाधीशों को सुप्रीम कोर्ट में पारदर्शिता को बनाए रखने के लिए अपनी संपत्ति से जुड़ी जानकारियों को उजागर करना चाहिए.

कई वकील याद करते हैं कि वह क़ानूनी मामलों का अध्ययन करने में लंबा समय बिताया करते थे. उनके साथ काम करने वाले लोग काम को लेकर उनकी बारीक समझ और समर्पण के लिए उनका सम्मान करते हैं.

इतिहास के छात्र रहे हैं जस्टिस गोगोई

बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य कार्यकारी न्यायाधीश के रूप में सेवानिवृत्त होने वाले जस्टिस चंद्रशेखर धर्माधिकारी बीबीसी को बताते हैं कि वह जस्टिस गोगोई को इस रूप में देखकर खुश हुए क्योंकि वह इस पद के लिए सबसे सक्षम व्यक्ति थे.

साल 2001 में, जस्टिस गोगोई को गुवाहाटी उच्च न्यायालय में एक न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया. इसके बाद 2010 में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया गया था.

एक साल बाद, उन्हें वहां मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया और 2012 में सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में लाया गया था.

वह उत्तर-पूर्व से आने वाले भारत के पहले मुख्य न्यायाधीश होंगे.

डिब्रूगढ़ में बड़े होने वाले जस्टिस गोगोई ने दिल्ली विश्वविद्यालय से जुड़े प्रतिष्ठित सेंट स्टीफंस कॉलेज में इतिहास में स्नातक की उपाधि प्राप्त की. उसके बाद उन्होंने क़ानून के संकाय में अध्ययन किया.

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जस्टिस गोगोई इस समय के सबसे ज़्यादा खुलकर बोलने वाले न्यायाधीशों में से एक हैं. हाल ही में उन्होंने चार जजों के साथ मिलकर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी जिससे विवाद पैदा हुआ था.

खुलकर बोलने वाले जज

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में गोगोई के साथ जस्टिस जे. चेलमेश्वर, मदन लोकुर और कुरियन जोसेफ़ ने हिस्सा लिया और कहा कि सुप्रीम कोर्ट के संचालन से जुड़ी उनकी अपीलों को इग्नोर किया जा रहा है.

मामला था रोस्टर को लेकर. इनका आरोप था कि मुख्य न्यायाधीश संवेदनशील मामलों को चुन-चुनकर कुछ ख़ास जजों को दे रहे हैं क्योंकि इसका फ़ैसला मुख्य न्यायाधीश ही करते हैं कि कौन सा जज़ किस केस की सुनवाई करेगी.

इस दौरान जज बीएच लोया की संदिग्ध मौत से जुड़े मामले का उदाहरण दिया गया.

लोया एक फेक एनकाउंटर में मारे गए सोहराबुद्दीन शेख के मामले की सुनवाई कर रहे थे.

सोहराबुद्दीन शेख के मामले में कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का नाम शामिल किया गया था.

जज लोया की मौत भी संदिग्ध हालात में हुई थी. मौत से पहले उन्होंने कथित रूप से अपने घर वालों से कहा था कि वे काफ़ी दबाव में जी रहे हैं.

इसके अलावा जज के पदों को खाली रखने पर भी बात की गई क्योंकि सरकार उन नामों को रोककर बैठी हुई है जिन्हें वरिष्ठ जजों वाली कॉलेजियम ने आगे बढ़ाया था.

जजों की कमी के चलते भारतीय न्यायालयों में कई मामले लंबित हैं.

जस्टिस गोगोई के सामने चुनौतियां

मुख्य न्यायाधीश के लिए अपना नाम घोषित होने से पहले गोयनका मेमोरियल लेक्चर के दौरान उन्होने कहा कि न्याय व्यवस्था उम्मीद की आख़िरी किरण है और इसे निष्पक्ष रहते हुए संस्थागत गरिमा को बनाए रखना चाहिए.

उन्होंने कहा, "इस समय न्याय व्यवस्था एक ऐसा मजदूर नहीं है जो अपने औज़ारों को दोष देता है. बल्कि ये एक ऐसा मजदूर है जिसके पास औज़ार ही नहीं हैं."

मुख्य न्यायाधीश बनने पर वो जजों की नियुक्ति करने और न्याय व्यवस्था के ढांचे में सुधार जैसे ज्वलंत मुद्दों पर काम करेंगे.

बीते कुछ समय से भारत में जाति और संप्रदाय आधारित हिंसा देखने को मिल रही है.

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एक धारणा बनती जा रही है कि शोषित जातियों का शोषण करने वालों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं होगी.

कई बार ऐसे मौके भी सामने आए हैं कि ऐसे हिंसक कृत्यों को अंजाम देने वाले लोगों का सार्वजनिक रूप से सम्मान किया गया. ऐसे में अनुसूचित जातियों और अल्पसंख्यकों में अकेलेपन का भाव देखा जा सकता है.

जस्टिस गोगोई ने जोरदार अंदाज में कहा, "लोकतंत्र की असली परीक्षा इस बात में है कि एक अल्पसंख्यक सुमदाय देश में अपना वजूद तलाश सके. बीते कुछ समय में सांप्रदायिकता और राजनीति के मिलन से जो नुकसान हुआ है उसकी भरपाई नहीं की जा सकती है. न्याय व्यवस्था कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे बाकी व्यवस्थाओं से अलग रख सकें. बल्कि ये दूसरे कई आदर्शों जैसे समाजवाद, लोकतंत्र, उदारवाद, साम्यवाद और भाईचारे जैसे आदर्शों का मिश्रण है. ये कोई अलग-थलग पड़ी हुई चीज़ें नहीं हैं बल्कि एक समावेशी समाज को स्थापित करने वाले आदर्श हैं."

लोकतंत्र में न्याय व्यवस्था की भूमिका भारत के लिए काफ़ी अहम है क्योंकि शासन व्यवस्था बेहद ख़राब है और अदालतों को अक्सर हस्तक्षेप करके वो काम करने पड़ते हैं जिसे विधायिका और चुने हुए प्रतिनिधियों को करना चाहिए था.

लोकतंत्र पर नज़र रखे वाली संस्था पत्रकारिता भी संदेहों के घेरे में है क्योंकि यह भी बेशर्मी से पेड न्यूज़ को प्रमोट करती है.

विज्ञापन सामग्री को अक्सर चालाकी से असली न्यूज़ की शक्ल दी जाती है.

जिस तरह लोकतांत्रिक संस्थाएं राजनीतिक दबाव में कमज़ोर हो रही हैं, उस स्थिति में न्याय व्यवस्था का रोल लोकतंत्र के रक्षक के रूप में है, ये वो आख़िरी उम्मीद है जिस पर एक आम आदमी भरोसा कर सकता है.

जस्टिस गोगोई मुख्य न्यायाधीश के रूप में एक साल से कुछ कम समय के लिए ही रहेंगे लेकिन जब 18 नवंबर, 2019 को वह सेवानिवृत्ति लेंगे तो वह अपनी पहचान छोड़ जाएंगे.

उनके कार्यकाल में कई चुनौतियां होंगी जिनका सामना करने के लिए लचीलेपन और साहस की ज़रूरत होगी.

लेकिन शायद ये वही चुनौतियां होंगी जिसकी भारत के नए मुख्य न्यायाधीश अपेक्षा कर रहे होंगे.

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