1.79 लाख करोड़ साफ़, क्यों मचा है शेयर बाज़ार में हाहाकार?

  • 4 अक्तूबर 2018
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बुधवार को शेयर बाज़ार में ऐसी तबाही मची कि 1.79 लाख करोड़ रुपए साफ़ हो गए. बीएसई में लिस्टेड सभी कंपनियों का मार्केट कैपिटलाइजेशन 145.43 लाख करोड़ रुपए से घटकर 143.64 लाख करोड़ रुपए पर आ गया.

जो शेयर बाज़ार हाल तक उछल रहे थे, अब दर्द से कराह रहे हैं. बेंचमार्क इंडेक्स क़रीब डेढ़ फ़ीसदी गिरकर बंद हुआ. दूसरी तरफ़ रुपए की पिटाई भी जारी है, जो डॉलर की तुलना में 73.34 पर पहुंच गया है.

सोमवार को अच्छी-ख़ासी पिटाई के बाद बुधवार को एक बार फिर कच्चे तेल के बढ़ते दाम और कमज़ोर होते रुपए ने बेंचमार्क इक्विटी इंडेक्स पर ख़ासा दबाव बनाया.

30 शेयरों वाला सेंसेक्स 550.51 अंक या 1.51 फ़ीसदी घटकर 35975.63 पर बंद हुआ जबकि निफ़्टी 150.05 अंक या 1.36 फ़ीसदी गिरकर 10858.25 पर बंद हुआ.

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क्या है वजह

वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल के दाम बढ़ने की वजह से आयातकों के बीच अमरीकी करेंसी की काफ़ी मांग देखने को मिली, जिसकी वजह से रुपया कमज़ोर होते हुए पहली बार डॉलर के ख़िलाफ़ 73 का आंकड़ा पार कर गया.

लेकिन बीते कई दिनों से जारी गिरावट वाले बाज़ार में इस हाहाकार की वजह क्या है. क्या ये वैश्विक बाज़ार में गिरावट का असर है या फिर भारतीय शेयर मार्केट घरेलू स्तर पर चुनौतियों का सामना कर रहा है? जानकारों का कहना है कि इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह कच्चा तेल या क्रूड और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में बढ़ते उसके दाम हैं.

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आर्थिक मामलों के जानकार सुदीप बंदोपाध्याय ने बीबीसी को बताया कि मंगलवार और बुधवार को क्रूड ऑयल के भाव में गज़ब का उछाल आया है और कुछ हद तक इसका रिश्ता रुपये की कमज़ोरी से भी है, इन दोनों वजह से भारत के शेयर बाज़ार में गिरावट आ रही है.

सुदीप बंदोपाध्याय ने कहा, ''कच्चा तेल 85 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया है. क्रूड के दाम बढ़ने की वजह से रुपया भी कमज़ोर हो रहा हैऔर इन दोनों कारणों से बाज़ार नर्वस है.''

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उनका कहना है कि इन दोनों वजहों से भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव आएगा क्योंकि भारत सरकार और रिज़र्व बैंक, दोनों के बजटीय प्रावधान 65 से 70 डॉलर प्रति बैरल के हिसाब से होते हैं.

लेकिन अब ब्रेंट क्रूड 85 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया है और हालात नाज़ुक बन गए हैं.

हालत कैसे सुधरेगी

क्या कच्चा तेल आगे भी इतना ही महंगा रहेगा? जानकारों का कहना है कि जब अमरीका से ज़्यादा शेल ऑयल बाज़ार में आना शुरू होगा, तो क्रूड के दाम भी कम होने लगेंगे.

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सुदीप ने कहा, ''क्रूड इतना ज़्यादा रहेगा, ऐसा नहीं लगता. मध्यम से लंबी अवधि में इसके दाम काबू में आ जाएंगे, लेकिन छोटी अवधि में मांग-आपूर्ति के बीच असंतुलन, ईरान जैसी भौगोलिक-राजनीतिक स्थितियों की वजह से छोटी अवधि में क्रूड की कीमतों पर दबाव रह सकता है.''

लीबिया में भी दिक्कतें जारी हैं. देश दो अलग-अलग सरकारों में बंटा हुआ है. एक हिस्से में तेल रिफ़ाइनरी हैं और दूसरे हिस्से में नहीं हैं, ऐसे में वहां के हालात अजीबोगरीब बने हुए हैं.

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कच्चा तेल और रुला सकता है

भारत को कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा ईरान से मिलता है और अमरीका की अगुवाई में इस देश पर आने वाले वक़्त में कई पाबंदियां लग सकती हैं, ऐसे में क्या भारत में पेट्रोल-डीज़ल के दाम और बढ़ जाएंगे?

सुदीप ने कहा, ''जी बिल्कुल, यही नहीं. बल्कि ऐसा हुआ तो दुनिया भर में कच्चे तेल के दाम बढ़ जाएंगे. इन्हीं सब शंकाओं की वजह से बाज़ार में दिक्कत है.''

इन हालात में छोटे निवेशकों को क्या करना चाहिए, उन्होंने कहा, ''ये बात सही है कि बड़ी गिरावट टेंशन बढ़ा देती है, लेकिन इस कमज़ोरी में भी कुछ मज़बूत शेयर ऐसे हैं, जो किफ़ायती दामों पर उपलब्ध हैं.''

रुपए की कमज़ोरी और तेल का उछलना, इन दोनों वजह के अलावा जिस तीसरे कारण ने बाज़ार को गिराया, वो इंफ्रा सेक्टर की ग्रोथ में कमी है. अगस्त में आठ इंफ़्रा सेक्टरों की ग्रोथ धीमी होकर 4.2 फ़ीसदी तक आ गई.

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इसकी वजह है क्रूड ऑयल और फ़र्टिलाइज़र के उत्पादन में गिरावट. कोर सेक्टर जुलाई में 7.3 फ़ीसदी बढ़े थे, लेकिन अगस्त में खेल बदल गया.

इसके अलावा एशियाई बाज़ारों में मंदी रही जिसका असर भारतीय शेयर मार्केट पर भी हुआ.

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