MSP में बढ़ोतरीः किसानों की चिंता या चुनावों में जीत है बीजेपी का इरादा?

  • 5 अक्तूबर 2018
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केंद्र सरकार ने किसान क्रांति यात्रा रैली ख़त्म होने के ठीक एक दिन बाद यानि बुधवार को रबी फ़सलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य को बढ़ाने का एलान किया है.

सरकार ने गेंहूं सहित सभी छह रबी की फ़सलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 21 फ़ीसदी तक बढ़ाया है. सिर्फ़ गेंहू की बात करें तो इसकी एमएसपी में 6.05 फ़ीसदी का इज़ाफा करते हुए 1840 प्रति क्विंटल कर दिया है.

केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए कहा, ''ये फ़ैसला किसानों की आय दोगुनी करने की हमारी कोशिशों का हिस्सा है. किसानों को रबी पर 50 प्रतिशत ऊंचा मूल्य दिलाने की हमारी कोशिश है.''

सरकार का दावा है कि इससे किसानों की आय में 62,635 करोड़ की अतिरिक्त वृद्धि होगी.

ये नया न्यूनतम समर्थन मूल्य इस साल नवंबर महीने में बोयी जाने वाली फ़सलों से लागू होगा. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता वाली आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडल समिति (सीसीईए) में ये फ़ैसला लिया गया.

केंद्र की मोदी सरकार के किसानों को लुभाने वाले इस फ़ैसले के कई मायने निकाले जा रहे हैं. इस साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव और दिल्ली में रैली करते किसानों पर आंसू गैस, रबर की गोलियां बरसाने से घिरी सरकार के इस फ़ैसले को जानकार चुनावी क़दम बता रहे हैं. दरअसल मध्यप्रदेश देश का बड़ा गेहूं और चना उत्पादक राज्य है. वहीं दूसरी ओर राजस्थान सरसों और जौ का बड़ा उत्पादक है. ऐसे में इस एलान के वक़्त को सियासी बताया जा रहा है.

मध्य प्रदेश में फ़ायदा है बीजेपी की मंशा?

चुनाव विश्लेषक और सी वोटर के प्रबंधन निदेशक यशवंत देशमुख ने बीबीसी हिंदी से सरकार के इस फ़ैसले को लेकर बात की.

यशवंत देशमुख कहते हैं, ''हर चुनाव से पहले राजनीतिक पार्टियां अपने फ़ायदे के लिए फ़ैसले लेती हैं, कुछ घोषणाएं करती हैं. हो सकता है कि ये लॉन्ग टर्म को देखते हुए लिया गया हो.''

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''चुनाव में नफ़ा-नुक़सान की बात करें तो मुझे लगता है कि इसका तत्कालिक लाभ तो नहीं होगा. हां अगर तीन चार महीने में इसपर काम हो और ये सही दिशा में जाए. तो हो सकता है कि इसका 2019 लोकसभा चुनाव में इसका फ़ायदा इन राज्यों में बीजेपी को मिले.

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''हां सी वोटर के पिछले महीने के सर्वे के मुताबिक तीनों ही राज्यों में कांग्रेस आगे दिखाई दे रही थी. जिसमें राजस्थान में कांग्रेस बीजेपी से काफ़ी आगे थी, लेकिन मध्यप्रदेश में दोनों के बीच कांटे की टक्कर है. ऐसे में अगर इस एलान से यहां बीजेपी के खाते में एक-डेढ़ फ़ीसदी किसान वोट भी आते हैं तो उसे फ़ायदा होगा. मध्यप्रदेश में इस एलान से अगर थोड़े भी किसान प्रभावित होते हैं तो राज्य में बीजेपी एकबार फिर कड़े मुकाबले में आ सकती है.''

''लेकिन राजस्थान में अंतर इतना बड़ा है कि इस एलान के बाद भी कोई असर राज्य में बीजेपी के समीकरण को लेकर नहीं पड़ेगा. अगर ये एलान विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखकर किया गया है तो मुझे नहीं लगता कि यहां इतने फ़ौरी तौर पर इन्हें कोई लाभ होगा.''

यशवंत तीन अक्तूबर को दिल्ली में हुई किसानों की रैली का ज़िक्र करते हुए कहते हैं, ''दिल्ली में जो बीते दिनों हुआ है दरअसल सरकार उससे बचने के लिए फ़ायरफाइटिंग मोड में आ गई है ताकि वह कह सके कि हमने तुरंत ये क़दम उठाया.''

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Image caption तीन अक्तूबर की किसान रैली

''चुनावी मौसम में इस फ़ैसले का किया जाना इसे चुनावी फ़ायदे वाला बना रहा है. मेरा स्पष्ट तौर पर मानना है कि इस तरह के लोक-लुभावन एलान का प्रभाव देखना होगा. केवल घोषणा मात्र से किसान लाइन लगाकर वोट दे देगा, इसकी संभावना मुझे नहीं लगती. अगर इस एलान के बाद चुनाव से पहले लोगों को इसका फ़ायदा हो जाए तब तो माना भी जा सकता है.''

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''लेकिन ये समझना होगा कि जब भी कोई फ़सल बोयी जाती है तो उसके उगने में वक़्त लगता है. ठीक उसी तरह जब निर्णय लिए जाते हैं तो उसके प्रभाव जनता तक पहुंचने में वक्त लगता है. तो अब क्या इतना समय सरकार के पास है? लोकसभा चुनाव के पहले छह महीने का समय है तो ऐसे में 2019 में इन राज्यों में सरकार को फ़ायदा होगा ये माना जा सकता है.''

''मीडिल क्लास को इस सरकार ने काफ़ी हल्के में लिया है. 2014 में सबसे मज़बूत समर्थन पार्टी को इस मीडिल क्लास से ही मिला था. अब अमित शाह की परेशानी ये नहीं है कि ये लोग कांग्रेस को वोट देंगे बल्कि ये है कि अगर ये लोग घर से वोट के लिए ना निकले तो क्या होगा?''

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Image caption तमिलनाडु के किसानों का प्रदर्शन

'किसानों की आय के दावे ग़लत'

आउटलुक के एडिटर हरवीर सिंह सरकार के किसानों की अतिरिक्त आय बढ़ने को लेकर किए गए दावे पर कहते हैं, ''किसानों की आय को लेकर इस तरह के दावे और कैलकुलेशन के कोई मायने नहीं हैं. सरकार को लगता है कि जो एमएसपी में बढ़ोतरी हुई सारा उत्पादन उस मूल्य पर ही ख़रीदा जाएगा, लेकिन ऐसा होता नहीं है. फ़सलों के कुछ हिस्से की खरीदारी ही न्यूनतम समर्थन मूल्य पर हो पाती है. अबतक तय समर्थन मूल्य से कम कीमत पर किसानों को फ़सल बेचनी पड़ रही है. ऐसे में इस तरह के नोशनल कैलकुलेशन के कोई मायने नहीं हैं.''

''किसान सरकार के खिलाफ़ प्रदर्शन करते रहे हैं. इस बार ये प्रदर्शन और भी ज़्यादा मुखर था. मुंबई में किसानों का मार्च देखें, मंदसौर में किसानों के प्रदर्शन पर फ़ायरिंग, तमिलनाडु के किसानों का दिल्ली में प्रदर्शन भी हुआ है. लेकिन किसान क्रांति यात्रा रैली का असर इसलिए हुआ है क्योंकि ये काफ़ी प्रभावशाली था. किसानों के आंदोलन का इतिहास देखें तो जब भी आंदोलन दिल्ली के आस-पास से खड़ा हुआ है तो सरकारें दबाव में आई हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि ये आंदोलन लंबे वक़्त तक चल सकते हैं. इसीलिए सरकार ने एक दिन के भीतर आंदोलन को ख़त्म कराया.''

किसानों की मांग से ये एमएसपी अलग कैसे?

हरवीर सिंह कहते हैं, '' इस एलान के पीछे राजनीतिक वजह है. पांच राज्यों में चुनाव होने वाले हैं और इन राज्यों में चुनावी अधिसूचना जारी होने वाली है जिसके बाद आदर्श आचार संहिता राज्यों में लग जाएगी. तो इन लोगों ने सोचा कि अगर उससे पहले रबी फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ा दिया जाए तो इसके चुनावी फ़ायदे उठाए जा सकते हैं. ''

''किसान जिस एमएसपी की बात करते हैं वह इस एमएसपी से अलग है. किसान सी2 लागत पर एमएसपी की बात करते हैं जैसा कि स्वामीनाथन रिपोर्ट में कहा गया है. लेकिन सरकार ने जो एमएसपी बढ़ाई है वह ए2+ फैमिली लेबर पर बढ़ाया है. सी2 लागत में किसानों की ज़मीन का किराया भी जुड़ा होता है, लेकिन ए2+ फैमिली लेबर में ज़मीन के किराये को नहीं जोड़ा जाता.''

''सरकार सी2 को यह कहकर नकारती है कि ज़मीन का किराया जगहों के मुताबिक अलग-अलग होगा और ऐसे में एमएसपी भी बदलेगी. सरकार किसानों के इस फॉर्मूले को नहीं मानती. किसानों की सबसे बड़ी मांग एमएसपी तो थी ही साथ ही वे एनजीटी के उस फ़ैसले का भी विरोध कर रहे थे जिसमें 10 साल पुराने डीज़ल वाहनों के संचालन पर रोक लगा दी गई थी. डीज़ल के बेतहाशा बढ़ते दाम किसानों की बड़ी समस्या है.''

यूपी सरकार के किसानों की कर्ज़माफी के बयान पर हरवीर सिंह कहते हैं ,''इसमें सबसे पेचीदा है गन्ना किसानों का रुका हुआ भुगतान. केवल यूपी में ही गन्ना किसानों का 10 हज़ार करोड़ का बकाया है और गन्ने का अगला सीज़न शुरू होने वाला है.''

देशभर में किसानों के बीच बढ़ते ग़ुस्से के कारण न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर एनडीए सरकार पिछले दो साल से एक्टिव मोड में आई है. इस साल जुलाई में केंद्र सरकार ने 14 खरीफ़ की फसलों का समर्थन मूल्य बढ़ाया था.

किन फ़सलों पर कितनी बढ़ी एमएसपी?

  • गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य पिछले साल के मुकाबले 105 रुपये बढ़ाकर 1,840 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया गया है.
  • चना के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य 4,400 रुपये से बढ़ाकर 4,620 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया गया है.
  • सरसों का न्यूनतम समर्थन मूल्य 4000 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़ाकर 4200 प्रति क्विंटल कर दिया गया है.
  • मसूर की दाल का न्यूनतम समर्थन मूल्य 4,250 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़ाकर 4,475 प्रति क्विंटल कर दिया गया है.
  • जौ पर अब न्यूनतम समर्थन मूल्य 1410 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़कर 1440 प्रति क्विंटल मिलेगा.
  • कुसुम पर मिलने वाला न्यूनतम समर्थन मूल्य 4100 रुपये से बढ़ाकर 4,945 प्रति क्विंटल कर दिया गया है.

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