'माहवारी में महिलाओं के अधिकार कैसे छीन सकते हैं'

  • 7 अक्तूबर 2018
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"क्या आप एक लड़की के हाथ से पानी या खाना लेने से मर जाएंगे यदि उसे माहवारी हो रही है तो? अगर नहीं, तो हम क्यों ज़ोर देते हैं कि वह इस दौरान सबसे अलग रहे? आप मासिक धर्म के दौरान उस औरत के पूजा करने के अधिकार को कैसे छीन सकते हैं?"

कलाकार अनिकेत मित्रा ने इस तरह अपनी बात रखी. उन्होंने अपने परिवार में देखा है कि मासिक धर्म के दौरान महिलाओं के लिए अलग नियम होते हैं.

इस मुद्दे पर उनका बनाया ग्राफ़िक सोशल मीडिया पर भी काफ़ी वायरल हुआ. ग्राफ़िक में उन्होंने सैनेटरी पैड पर लाल रंग से कमल का फूल बनाया है जिसका मतलब ज़िंदगी से है और नीचे बंगाली में लिखा है - शक्ति रूपेण जिसका मतलब नारी शक्ति है.

अनिकेत कहते हैं, "मैंने देखा है कि मेरी पत्नी और बहन की तरह बहुत सी महिलाएं हैं जो त्यौहार या दूसरे शुभ कार्यों में शामिल नहीं हो सकती थीं. माहवारी के दौरान उन्होंने धार्मिक कार्यों में शामिल नहीं होने दिया जाता. उन्हें पूजा स्थल या किचन के नज़दीक भी नहीं जाने दिया जाता. उन्होंने कोने में कर दिया जाता है. इसी चीज़ ने मुझे मेरे ग्राफिक के लिए प्रेरणा दी."

"वो भी घर की खुशियों में हिस्सा लेना चाहती हैं और पूजा करना चाहती हैं लेकिन अचानक उन्हें पता चलता है कि वो इस शारीरिक स्थिति में आ गई हैं कि दूसरे उन्हें दूर भगाने लगते हैं. वो प्रार्थना करना चाहती हैं लेकिन उसे ऐसा करने से रोका जाता है. इस दौरान उस पर ऐसी पाबंदियां क्यों?

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माहवारी और मिथक

अनिकेत मानते हैं कि अब भी माहवारी को लेकर लोगों में जागरूकता लाए जाने की ज़रूरत है.

वे कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमला केस में महिलाओं के पक्ष में फैसला दिया है लेकिन परिवार के लोग बदलना नहीं चाहते हैं. आज भी उनके लिए ये एक वर्जित काम है. इन मिथकों की वजह से लोग समाज को पीछे धकेलने पर तुले हुए हैं."

"असम में कामाख्या देवी का मंदिर है जहां एक देवी की माहवारी को त्यौहार की तरह मनाया जाता है. इस त्यौहार के दौरान मंदिर के दरवाज़े तीन-चार दिन के लिए बंद रखे जाते हैं."

"हम देवियों को पूजते हैं लेकिन अपने आस-पास की महिलाओं की स्थिति पर चिंता नहीं करते हैं जो कि असल में देवियों का ही रूप हैं."

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ट्रोलिंग की वजह से की पोस्ट डिलीट

अनिकेत ने बताया, "जब लोगों ने मेरी पोस्ट देखी तो मुझे ट्रोल करना शुरू कर दिया. कुछ ने मुझे अधर्मी कहा, किसी ने गद्दार कहा. मैं कहना चाहता हूं कि मैं धार्मिक हूं और भगवान में विश्नास करता हूं."

"हम अपने घर में रोज़ पूजा करते हैं. मैं गणेश चतुर्थी भी मनाता हूं और दुर्गा पूजा भी. तो मैं कैसे अधर्मी या एंटी-हिंदू हो गया? इतना दबाव बनाया गया कि मैंने हार कर पोस्ट हटा दिया."

"मुझे ट्विटर पर ट्रोल किया गया, गालियां दी गईं. क्या उन्हे लगता है कि ऐसा करके वे महिलाओं की मदद कर रहे हैं? क्या इससे महिलाओं की दिक्कतें खत्म हो जाएंगी? आप मुझे एक-दो दिन गाली देंगे और फिर किसी और मुद्दे पर चले जाएंगे."

वे कहते हैं, "मैं सोचता हूं कि जो मुझे गाली दे रहे हैं, वे बुरे लोग नहीं हैं. लेकिन वे समझदार नहीं है और इसलिए वे ऐसा कर रहे हैं."

"एक तरफ़ तो लोग मुझे ट्रोल कर रहे हैं लेकिन बहुत से लोग हैं जो मेरा साथ भी दे रहे हैं. बहुत से लोगों ने मुझे फ़ोन किया और मुझे हौसला दिया. कई लोगों ने समर्थन में मैसेज किए और कई लोगों ने पोस्ट भी लिखे. मैं कहना चाहता हूं कि अगर एक भी लड़की को मेरे ग्राफ़िक से फ़ायदा हुआ तो मैं सभी गालियां सहने को तैयार हूं."

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पत्नी ने दिया साथ

अनिकेत ने कहा कि इस सबके दौरान उनकी पत्नी प्रियम उनके साथ खड़ी रही, "एक वक्त था जब कोई हम लोगों के लिए नहीं बोल रहा था."

"अब जब आप हमारा समर्थन कर रहे हैं, मुझे पता है कि आपको भी विरोध झेलना पड़ेगा. लेकिन डरिए मत, आप कोई ग़लत काम नहीं कर रहे हैं."

प्रियम कहती हैं, "बहुत कम लोग हैं जो महिलाओं के मुद्दों को उठाते हैं. पुरूषों को बस एक दिन इसका अनुभव करना चाहिए जो हम हर महीने चार दिन झेलते हैं. शायद इसके बाद ही उन्हें महसूस हो कि किसी महिला के साथ कैसा बर्ताव करना चाहिए."

"माहवारी के दौरान हम दफ़्तर भी जाते हैं, घर का काम करते हैं और सब ज़िम्मेदारियां निभाते हैं लेकिन कोई इसे मानने को तैयार नहीं."

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सच और सिर्फ़ सच

अनिकेत कहते हैं, "डर का माहौल है और मैं भी डरता हूं. मैं कोई हीरो नहीं हूं. मैं सिर्फ़ सच ही कह रहा हूं. अगर कोई महिला मेरी वजह से अपने त्यौहारों में शामिल हो सके तो हर कोशिश कामयाब समझूंगा."

"मैं कहना चाहता हूं कि हमारे घर की महिलाएं हमारी शक्ति हैं. उनकी इज़्जत करिए, प्यार दें और उनका साथ दें.

सेक्शुअल मेडिसिन के प्रोफेसर और लेखक डॉक्टर प्रकाश कोठारी इस विषय पर कहते हैं, "जैसे हर पवित्र चीज़ को कमल से जोड़ा जाता है, सेक्स और इससे जुड़ी चीज़ें हिंदू धर्म में अपवित्र नहीं हैं. ये कोई पाप नहीं है."

खजुराहो और बेलूर जैसे मंदिरों में भी आप देखेंगे कि कई चीज़ें सेक्स को दर्शाती हैं. हो सकता है कि वह सेक्स एजुकेशन का हिस्सा था क्योंकि उन दिनों सेक्स को सामान्य समझा जाता था.

जब आप पुराना साहित्य और किताबें पढ़ेंगे तो जानेंगे कि सेक्स मानव जीवन का आधार माना जाता था. इसलिए मुझे नहीं लगता कि इस ग्राफ़िक में कोई आपत्तिजनक बात है."

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डॉक्टर कोठारी कहते हैं, "पहले के वक्त में मासिक धर्म से जुड़े कई मिथक थे. तब ये संस्कृति का हिस्सा था और उन हालात में प्रासंगिक था. महिलाओं को कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी और ऐसा इसलिए किया जाता था ताकि वे चार दिन आराम कर सकें. अब हम अलग वक्त में रह रहे हैं जहां पुरूष और महिलाएं बराबर काम करते हैं."

"हमारा समाज अभी भी साक्षर नहीं है और ऐसे कई मुद्दों पर अब भी ग़लतफ़हमियां बनी हुई हैं. अगर हम ब्रह्मचर्य के बारे में बात करते हैं तो इसे समझा जाता है कि वीर्य न खोएं और शादी ना करें. जबकि ये सच नहीं है. ब्रह्मचर्य संस्कृत का शब्द नहीं है और इसका अर्थ है - ब्रह्मा के पास होना, सर्वोच्च के पास होना."

"अब जागरूकता आ रही है और धीरे-धीरे बदलाव हो रहा है. आप एक दिन में सब बदल जाने की उम्मीद नहीं कर सकते. ये संभव ही नहीं है."

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पहली बार देखने पर लगा अजीब

जब बीबीसी ने एडवांस स्टडी की प्रोफेसर डॉक्टर विभूति पटेल से इन मुद्दों पर पूछा तो उन्होंने कहा, "पहली बार जब मैंने ये ग्राफ़िक देखा तो मुझे थोड़ा अजीब लगा."

"कमल का हमारी संस्कृति में एक विशेष स्थान है और इसलिए जब आप इसे एक सैनेटरी पैड पर चित्रित देखते हैं तो थोड़ा अजीब लगता है."

"लेकिन यह ठीक है कि कलाकार इस तरह के ग्राफ़िक के ज़रिए मासिक धर्म के बारे में जागरूकता फैलाने की कोशिश कर रहा है. इस विषय पर कई फ़िल्में भी ऐसा करने की कोशिश कर रही हैं."

इस विषय पर समाज में प्रचलित धारणाओं पर वह कहती हैं कि ये इस बात पर निर्भर करता है कि लोग इसके बारे में कैसे जानते हैं.

वह कहती हैं, "मेरे परिवार में हमने ऐसी सभी चीज़ों पर कभी विश्वास नहीं किया. लेकिन ये भी सच है कि अब भी बड़ी संख्या में ऐसे परिवार हैं जहां मासिक धर्म से संबंधित मिथक प्रचलित हैं."

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