संथाली महिलाओं को ‘जाहेरथान’ में जाने की मनाही क्यों

  • 10 अक्तूबर 2018
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निर्मला पुतुल संथाली और हिंदी की जानी-मानी कवयित्री हैं. उन्हें साल 2001 में साहित्य अकादमी से साहित्य सम्मान मिल चुका है. उनकी कविताओं के पोस्टर बनाकर लोग आंदोलन करते हैं. वे देश-दुनिया के तमाम मुद्दों पर अपनी राय रखती हैं. इसके बावजूद वह अपने पूजा स्थल 'जाहेरथान' में पूजा नहीं कर सकतीं. क्योंकि वह एक स्त्री हैं.

संथाली समाज महिलाओं को अपने पूजन स्थल में पूजा की इज़ाज़त नहीं देता. वे साल में सिर्फ़ एक बार वहां की पूजा में शामिल होती हैं, जब 'बाहा परब' के मौके पर नाइके (पुजारी) उन्हें फूल देते हैं.

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Image caption संथाली और हिंदी की जानी-मानी कवयित्री हैं निर्मला पुतुल

क्या है इसकी वजह?

निर्मला पुतुल बीबीसी से कहती हैं, "संथाली महिलाओं ने कभी इसके ख़िलाफ़ आवाज़ नहीं उठायी. ग्रामीण स्तर पर महिलाएं अधिक जागरूक नहीं हैं. इसकी बड़ी वजह अशिक्षा है. अगर हमारे समाज में भी महिलाएं पढ़ी-लिखी होतीं, तो इस बात पर चर्चा ज़रूर होती कि पूजा स्थल पर जाने और उसमें शामिल होने की इजाज़त सिर्फ़ पुरुषों को ही क्यों है."

यह बात भी उठती कि नाइके पुरुष ही क्यों होते हैं. इसमें बेटियों की भागीदारी क्यों नहीं होती. यह दरअसल बहुत पुरानी रूढ़िवादी पंरपरा है.

निर्मला पुतुल ने कहा, "यह विडंबना है कि जाहेरथान की लिपाई-पुताई (साफ़-सफ़ाई) का काम तो महिलाओं के जिम्मे हैं लेकिन पूजा करने या कराने का अधिकार उन्हें नहीं मिला हुआ है. अव्वल तो यह कि पूजा के बाद मिलने वाला प्रसाद (सोड़े) भी सभी महिलाओं को नहीं मिलता."

वो कहती हैं, "अगर शादी के बाद किसी महिला की पहली संतान बेटा हुआ, तो वह प्रसाद पाने की अधिकारी होगी लेकिन अगर उन्हें बेटी हुई, तो प्रसाद नहीं मिलेगा. इसका विरोध होना चाहिए."

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महिला अधिकारों का हनन

आदिवासी सेंगेल अभियान के अध्यक्ष और पूर्व सांसद सालखन मुर्मू इस परंपरा को महिला अधिकारों का हनन बताते हैं.

उन्होंने कहा कि दक्षिण भारत के सबरीमाला मंदिर मे महिलाओं को प्रवेश का अधिकार देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि परंपरा के नाम पर महिलाओं को उनके संवैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं रखा जा सकता है. ऐसे में संथाली समाज को भी अपनी वैसी पंरपराओं पर पुनर्विचार करना चाहिए, जो महिलाओं को दोयम दर्जे की नागरिक बनाते हैं.

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Image caption सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक सुप्रीम कोर्ट ने हटा दी है

मुखाग्नि और हल चलाने की इजाज़त नहीं

सालखन मुर्मू ने बीबीसी से कहा, "मैं संथाली हूं और आदिवासियों में हमारा समुदाय बहुमत में माना है. हमलोग पांच-छह राज्यों में रहते हैं और हमारी बात का महत्व भी है. लेकिन, यह ग़लत है कि संथाली समाज महिलाओं को पूजा करने, मुखाग्नि देने, हल चलाने, घर की छत (छप्पड़) छाने की इज़ाज़त नहीं देता. हमारी बेटियों को संपत्ति में भी अधिकार नहीं है."

वो कहते हैं, "दरअसल, स्वशासन व्यवस्था के नाम पर आदिवासी समाज दूसरी तरह के राजतंत्र को ढो रहा है. हमारे कई पद वंशानुगत हैं, जो पुरुषों के लिए ही आरक्षित हैं. पुजारी (नाइके) बनना भी वंशानुगत है. यह न्यायोचित नहीं है."

हालांकि, संथाली बुद्धिजीवियों में इस बात को लेकर मतभिन्नता भी है.

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Image caption आदिवासी सेंगेल अभियान के अध्यक्ष और पूर्व सांसद सालखन मुर्मू

'यह परंपरा है'

झारखंड की उपराजधानी दुमका स्थित सिदो कान्हो मुर्मू विश्वविद्यालय की पूर्व प्रतिकुलपति डॉ. प्रमोदिनी हांसदाक कहती हैं कि यह धार्मिक रिचुअल है. इसमें महिलाओं के अधिकारों के हनन जैसी बात नहीं है."

उन्होंने बताया, ''संथाली समाज में कई ऐसी परंपराएं भी हैं, जिनमें पुरुषों को अलग रखा जाता है. उसे सिर्फ़ महिलाएं ही करती हैं. मसलन, बारात के स्वागत के वक़्त और शादी की कई रस्में केवल महिलाएं ही निभाती हैं. लेकिन, बलि देने या तीर-धनुष छूने आदि से महिलाओं को अलग रखने की परंपरा रही है. ऐसी कई परंपराएं हिंदू या मुस्लिम समाज में भी हैं. ऐसे में किसी परंपरा की आलोचना कैसे कर सकते हैं.''

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Image caption झारखंड राज्य महिला आयोग की सदस्य और संथाल परगना कॉलेज दुमका में संथाली भाषा की विभागाध्यक्ष डॉ. शर्मिला सोरेन

समाज करे पुनर्विचार

झारखंड राज्य महिला आयोग की सदस्य और संथाल परगना कॉलेज दुमका में संथाली भाषा की विभागाध्यक्ष डॉ. शर्मिला सोरेन कहती हैं कि उन्होंने मांझीथान और जाहेरथान (पूजा स्थल) में महिलाओं को प्रवेश देने की पहल सबसे पहले की थी.

वो कहती हैं, "इस पर संथाली समाज के लोगों को विचार करना चाहिए क्योंकि यह क़ानूनी मसला न होकर सामाजिक मसला है. इसका रास्ता समाज के लोग ही निकालेंगे."

डॉ. शर्मिला सोरेन ने बीबीसी से कहा, "महिलाओं के लिए भी एक जगह होनी चाहिए, जहां वे अपनी आस्था प्रकट कर सकें."

वो कहती हैं, "मैंने कई मौकों पर यह बात उठायी है. महिलाएं अब पहाड़ बाबा और लुगु बाबा की पूजा करने लगी हैं. उन्हें मांझीथान में भी जाने की इजाज़त मिले, इसपर भी विचार चल रहा है."

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Image caption सिदो कान्हो मुर्मू विश्वविद्यालय की पूर्व प्रतिकुलपति डॉ. प्रमोदिनी हांसदाक

प्रकृति के उपासक हैं आदिवासी

दुमका निवासी वरिष्ठ पत्रकार आर के नीरद कहते हैं कि आदिवासी समाज मूर्ति पूजक न होकर प्रकृति का उपासक है. ऐसे में इनकी पूजा की परंपरा को हमें हिंदूओं की परंपराओं के समानांतर नहीं देखना चाहिए.

वो कहते हैं, "संथाली समाज सेंगल बोंगा (सूरज), पृथ्वी, आकाश आदि की पूजा करता है. इनके सबसे बड़े देवता 'मारांग बुरु' हैं, तो देवी हैं 'जाहेर एरा'. इनका महत्व हिंदुओं के भगवान शंकर और पार्वती की तरह है. यह समाज नारी प्रधान है लेकिन पूजा का सारा काम पुरुषों के जिम्मे है. पूजा स्थल पर बलि देने का काम भी पुरुष ही करते हैं."

आर के नीरद ने बताया कि सालों पहले एक संथाली महिला द्वारा हल चलाए जाने के बाद बड़ा विवाद हुआ था. तब यह बात भी उठी थी कि संथाली समाज को महिला अधिकारों के प्रति उदार होना चाहिए.

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'संथाल एक्सप्रेस' के संपादक चुंडा सोरेन सिपाही कहते हैं कि आदिवासी समाज अपनी परंपराओं को लेकर हमेशा से सजग रहा है.

वो कहते हैं, "हमारे समाज में परंपराओं की समीक्षा का रिवाज नहीं है. महिलाओं के पूजा स्थलों पर जाने की इजाज़त को लेकर न तो कभी बड़ा विरोध हुआ और न इसपर पुनर्विचार की स्थिति बनी. इसलिए यह परंपरा चलती आ रही है लेकिन परंपराएं अटूट नहीं होतीं."

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