राजस्थान, एमपी, छत्तीसगढ़ में भाजपा या कांग्रेस?

  • 7 अक्तूबर 2018
पांच राज्यों में चुनाव, कांग्रेस, बीजेपी इमेज कॉपीरइट AFP/Getty Images

चुनाव आयोग ने शनिवार को पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के लिए तारीख़ों की घोषणा कर दी है. छत्तीसगढ़ में दो चरण में चुनाव होगा. बाकी के चार राज्यों राजस्थान, मध्यप्रदेश, तेलंगाना और मिजोरम में एक ही चरण में चुनाव होगा. 11 दिसंबर को सभी राज्यों में एक साथ मतों की गणना होगी.

इन पांच राज्यों में से तीन राज्य ऐसे हैं जहां भाजपा सत्ता में है. मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में पद्रंह सालों से तो राजस्थान में पिछले पांच साल से भाजपा का शासन है.

यह कहना मुश्किल नहीं है कि विधानसभा चुनावों में न रास्ता कांग्रेस के लिए आसान है और ना ही भाजपा के लिए. ऐसे में इन राज्यों में चुनावी मुद्दे क्या होंगे?

वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा कहते हैं, "मैं मानता हूं कि भ्रष्टाचार से बड़ा मुद्दा महंगाई का होता है. लोगों के लिए घर चलाने और तेल (पेट्रोल-डीज़ल) ख़रीदने का मुद्दा महत्पूर्ण होता है. दूसरे मुद्दे जो भाजपा से सामने मुंह बाये खड़े हैं वो हैं कृषि संकट से जुड़े मुद्दे. किसान अपने क्षेत्रों से निकलकर राजधानी की तरफ़ आ रहे हैं, उन्हें अपनी फसल की सही कीमतें चाहिए."

वो कहते हैं, "सभी पार्टियां मुझे दो पाटों के बीच में फंसती नज़र आ रही हैं लेकिन नुकसान उनका ज़्यादा होता है जो सत्ता में होती हैं."

राजनीतिक विशेषज्ञ एंटी इनकंबेंसी की बात कर रहे हैं. वहीं कईयों का मानना है कि इन विधानसभा चुनाव में मुद्दे गौण हैं क्योंकि बातें राजनीतिक समीकरणों की हो रही है, गठबंधन की हो रही है.

चुनावी बिगुल फूंका जा चुका है. तो मुद्दों के साथ ही इन राज्यों में राजनीतिक समीकरण क्या दिख रहे हैं और राजनीतिक पार्टियों के सामने चुनौतियां क्या क्या हैं. चलिए इसी पर बात करते हैं क्योंकि आने वाले दिनों में ये अख़बारों की सुर्खियां बनने वाली हैं.

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सबसे पहले बात राजस्थान की...

राजस्थान में यह नारा आज जोर पकड़ रहा है कि "मोदी तुझसे बैर नहीं, वसुंधरा तेरी खैर नहीं." राजस्थान में वसुंधरा राजे के नेतृत्व पर सवाल उठ रहे हैं. ऐसे में विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र वसुंधरा के सामने चुनौतियां क्या क्या हैं?

वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश कहते हैं, "जहां तक सवाल राजस्थान का है तो वहां भाजपा के लोग भी मानते हैं कि वहां वसुंधरा राजे के ख़िलाफ़ बहुत असंतोष है. इन तीनों प्रदेशों में भारतीय जनता पार्टी का पहले की तरह जीत दर्ज़ करना आसान नहीं होगा."

वसुंधरा की नाकामियों को भुनाने के लिए कांग्रेस कितनी तैयार है?

इस पर उर्मिलेश कहते हैं, "राजस्थान में अशोक गहलोत अनुभवी तो सचिन पायलट कांग्रेस के युवा चेहरा हैं. दोनों में से किसी को भी मुख्यमंत्री के रूप में पेश नहीं किया जा रहा है जिसे कांग्रेस की अच्छी रणनीति कही जा सकती है. गहलोत की तो सभी जातियों में स्वीकार्यता रही है, वसुंधरा से नाराज़गी कांग्रेस को फ़ायदा पहुंचा सकती है."

मध्य प्रदेश में क्या हैं मुद्दे?

एससी-एसटी क़ानून में संशोधन के बाद मध्य प्रदेश में आंदोलन किए गए, सवर्णों में नाराज़गी है. लेकिन वो मध्य प्रदेश में केवल 7 फ़ीसदी ही हैं. ऐसे में भाजपा के लिए यह कितना अहम होगा. इसके अलावा सरकारी नौकरी में कोटे से भी सवर्णों में नाराज़गी है.

आरक्षण विरोधी सपाक्स कुछ वोट काट सकती है. वहीं तेल के दाम और महंगाई के साथ ही लगातार हो रहे किसान आंदोलन भी शिवराज सिंह के लिए मुश्किलें खड़ी करेंगे.

उर्मिलेश कहते हैं, "शिवराज सिंह व्यापम में मौत, किसानों, युवाओं में नाराज़गी, अल्पसंख्यक, दलित और आदिवासी तीनों में भाजपा सरकार के ख़िलाफ़ आक्रोश है."

लेकिन उर्मिलेश कहते हैं कि सवर्ण नाराज़गी के बावजूद भाजपा के पक्ष में जाएंगे.

एंटी इनकंबेंसी बड़ा फैक्टर

15 साल से सत्ता में बने हुए शिवराज सिंह के सामने एंटी इनकंबेंसी कितना बड़ा फैक्टर बनेगा? शिवराज सिंह के सामने और कौन कौन सी चुनौतियां हैं?

उर्मिलेश कहते हैं, "मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ तीनों राज्यों में भाजपा कई वर्षों से राज कर रही है. उसमें भाजपा के लिए सबसे बड़ी समस्या एंटी इनकंबेन्सी का होना है."

वहीं वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा कहते हैं, "मध्य प्रदेश में सरकार के साथ असंतोष यानी एंटी इनकंबेन्सी ज़रूर दिखता है. किसानों और सवर्णों की नाराज़गी बड़े मुद्दे हैं. सवर्ण भाजपा की नींव रहे हैं लिहाजा उनकी नाराज़गी शिवराज सिंह के लिए मुश्किलें पैदा कर सकती हैं."

दूसरी तरफ वो यह भी कहते हैं, "मध्य प्रदेश में कांग्रेस और बसपा का चुनावी समीकरण होना था जो अभी संभव नहीं लग रहा है. बसपा का मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में आधार है और वो अपनी ताक़त भी दिखाना चाहती है. उसे 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए अपनी दावेदारी बढ़ाने की चिंता ज़्यादा है."

लेकिन वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामाशेषन कहती हैं कि कांग्रेस के सामने यहां चुनौतियां बहुत हैं. वो कहती हैं कि उनके लीडर्स ज़्यादा और कार्यकर्ता कम हैं.

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Image caption दिग्विजय सिंह

नर्मदा आरती से मिलेगा फ़ायदा?

वोट के लिए कांग्रेस मध्य प्रदेश में नर्मदा आरती कर रही है. लेकिन वहां भक्ति भाव नहीं दिखता है. आरती के दौरान कांग्रेस के नेता, जिनमें राहुल, ज्योतिरादित्य आपस में बातचीत करते नज़र आते हैं और उसकी राष्ट्रीय मीडिया में आलोचना होती है. क्या कांग्रेस गुजरात के जैसा कारनामा यहां दोहरा पायेगी या फिर एक बार फिर से इन राज्यों में भाजपा की सरकार आएगी.

राधिका रामाशेषन कहती हैं, "कांग्रेस ने यह साबित करना चाहा है कि वो हिंदू पार्टी है. गुजरात में इसका सकारात्मक असर हुआ था. दिग्विजय सिंह ने भी मध्य प्रदेश में नर्मदा परिक्रमा किया था. उस दौरान वो जहां भी गए वहां कांग्रेस को फिर से खड़ा करने की कोशिश की गई."

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रम सिंह को थोड़ी राहत

छत्तीसगढ़ के किसान रमन सरकार से नाराज़ हैं. उनकी नाराज़गी धान पर बोनस नहीं मिलने से है. इसके बावजूद चुनाव में जा रहे बाकी राज्यों की तुलना में भाजपा छत्तीसगढ़ में अधिक मज़बूत है.

राधिका रामाशेषन कहती हैं कि एमएसपी लगातार बढ़ाए गए हैं लेकिन किसान संतुष्ट नहीं हैं. वो कहती हैं, "मध्य प्रदेश में तो कृषि के क्षेत्र में 12 फ़ीसदी वृद्धि हुई है लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि किसान रातोंरात अमीर बन गए हैं."

राधिका कहती हैं कि अमित शाह जिस तरह से संगठन को बहुत मज़बूती से चला रहे हैं और यह भाजपा के लिए लाभ की स्थिति है.

छत्तीसगढ़ में रमन सिंह के सामने चुनौती क्या क्या हैं? यहां एंटी इनकंबेंसी फैक्टर कितना काम करेगा? साथ ही मायावती और जोगी का गठबंधन भाजपा के लिए कितनी बड़ी चुनौती बनेगा?

एंटी इनकंबेंसी के मुद्दे पर राधिका रामाशेषन कहती हैं कि छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में पंद्रह सालों से भाजपा है, राजस्थान में पांच सालों से है और वहां हमेशा सत्ता पलटती रहती है. भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती है छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश को अपने पास बनाए रखना. इन दोनों ही राज्यों में किसान सरकार से नाराज़ हैं.

वहीं उर्मिलेश कहते हैं, "छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है लेकिन वहां के किसान आज कटोरे लेकर घूम रहे हैं. वहां किसानों की मौतें हो रही हैं."

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Image caption अजित जोगी के साथ मायावती

छत्तीसगढ़ में किसानों के मुद्दे बड़े लेकिन यहां इस बार एक तीसरा खेमा तैयार हो रहा है.

राधिका कहती हैं, "राहुल गांधी ने अजित जोगी को वापस लाने की कोशिश भी नहीं किया. इसका नतीजा यह हुआ कि मायावती जोगी के साथ समझौता कर लीं. यह थर्ड फ्रंट बन गया है. मायावती का वहां आधार है और जोगी की दलितों में पकड़ है."

वो कहती हैं कि छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी और बसपा का मेल जहां कांग्रेस का सिरदर्द बनेगा वहीं भाजपा के लिए कांग्रेस का बंटा हुआ होना राहत की बात होगी.

कुल मिलाकर देखा जाए तो इस आने वाले चुनावों में इन तीन राज्यों में जहां सत्तापक्ष के लिए खुद को बनाए रखना बड़ी चुनौती है. वहीं विपक्ष के सामने सत्ता से नाराज़ तबकों को वोट में कैसे तब्दील करें यह चुनौती है.

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