क्या डॉलर के बिना नहीं चल पाएगी भारत की अर्थव्यवस्था

  • 8 अक्तूबर 2018
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भारत की मुद्रा रुपया है, लेकिन अर्थव्यवस्था के लिए ज़्यादा डॉलर का होना बहुत ज़रूरी है. वैश्विक अर्थव्यवस्था में किस देश की आर्थिक सेहत सबसे मज़बूत है, इसका निर्धारण इससे भी होता है कि उस देश का विदेशी मुद्रा भंडार कितना भरा हुआ है.

दुनिया भर के विदेशी मुद्रा भंडार में प्रभुत्व डॉलर का ही है. आप बाज़ार जाते हैं तो जेब में रुपए लेकर जाते हैं. इसी तरह भारत को सऊदी अरब, इराक़ और रूस से तेल ख़रीदना होता है तो वहां रुपए नहीं डॉलर देने होते हैं.

जैसे भारत ने फ़्रांस से रफ़ाल लड़ाकू विमान ख़रीदा तो भुगतान डॉलर में करना पड़ा न कि रुपए में. मतलब रुपया राष्ट्रीय मुद्रा है, लेकिन भारत को अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए डॉलर की शरण में ही जाना पड़ता है.

मतलब अर्थव्यवस्था और देश को मज़बूत रखने के लिए बहुत ज़्यादा डॉलर का होना ज़रूरी है. डॉलर आएंगे कहां से? डॉलर निर्यात से आते हैं. जैसे भारत कोई सामान दूसरे देश से ख़रीदता है तो डॉलर में भुगतान करता है, वैसे ही जब कोई सामान बेचता है तो डॉलर में भुगतान लेता है. मतलब भारत के पास कितना डॉलर होगा ये इस बात पर निर्भर करता है कि भारत दुनिया भर में क्या-क्या बेचता है.

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भारत का विदेशी मुद्रा भंडार

अगर भारत बेचने की तुलना में ख़रीदता ज़्यादा है तो डॉलर का भंडार कमज़ोर होगा. डॉलर एक और तरीक़े से आता है. दुनिया भर के अलग-अलग देशों में काम करने वाले भारतवंशी अपनी कमाई का एक हिस्सा भारत में अपने परिजनों को भेजते हैं.

विदेशों में काम कर रहे अपने नागरिकों से डॉलर हासिल करने में भारत शीर्ष पर है. 2017 में भारतवंशियों ने कुल 69 अरब डॉलर भेजे जो 2018-19 में भारत के रक्षा बजट का डेढ़ गुना है. विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार यह रक़म पिछले साल से 9.5 फ़ीसदी ज़्यादा है.

1991 में विदेशों में काम कर रहे भारतीयों की कमाई से आने वाले डॉलर महज तीन अरब डॉलर थे जो 2018 में 22 गुना बढ़कर 69 अरब डॉलर हो गए. इस मामले में भारत के बाद चीन, फ़िलीपीन्स, मेक्सिको, नाइजीरिया और मिस्र हैं.

पिछले हफ़्ते भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में 1.265 अरब डॉलर की कमी आई है. इस कमी के साथ ही भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 400.52 अरब डॉलर पहुंच गया है.

विशेषज्ञों का कहना है कि 400 का आंकड़ा एक मनोवैज्ञानिक आंकड़ा है और इससे नीचे गया तो भारत के लिए चिंता की बात होगी. इसी साल अप्रैल में विदेशी मुद्रा भंडार 426.028 अरब डॉलर तक पहुंच गया था, लेकिन उसके बाद से गिरावट जारी है.

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क्यों चाहिए मज़बूत रुपया

भारत के पास कितना डॉलर है और कितना खर्च कर रहा है, इसका सीधा असर राष्ट्रीय मुद्रा रुपया पर पड़ता है. इसे एक उदाहरण से समझिए. आपको अमरीका पढ़ाई करने जाना है.

मान लीजिए एक साल में साठ हज़ार डॉलर खर्च होगा तो आप ये डॉलर कहां से लाएंगे? आपके पास जो रुपए हैं उससे डॉलर ख़रीदेंगे. मतलब साठ हज़ार डॉलर ख़रीदने के लिए आपको 74 की दर से क़रीब 45 लाख रुपए देने होंगे.

ज़ाहिर है किसी भी वस्तु या सेवा की क़ीमम उसकी मांग और आपूर्ति पर निर्भर करती है. अगर रुपए की मांग कम है तो उसकी क़ीमत भी कम होगी और डॉलर की मांग ज़्यादा है, लेकिन उसकी आपूर्ति कम है तो उसकी क़ीमत ज़्यादा होगी. आपूर्ति तब ही पर्याप्त होगी जब उस देश का विदेशी मुद्रा भंडार पर्याप्त होगा.

आरबीआई के अनुसार 2017-18 में विदेशों में पढ़ने जाने वाले भारतीयों ने 2.021 अरब डॉलर ख़र्च किए. अगर भारत में भी अच्छे कॉलेज और शिक्षण संस्थान होते तो विदेशों से लोग यहां पढ़ने आते और वो विदेशी मुद्रा देकर रुपया ख़रीदते. इसी तरह भारत की कंपनियां विदेशों से कोई सामान ख़रीदती हैं तो उन्हें भी इसी तरह से डॉलर देने होते हैं.

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आज की तारीख़ में एक डॉलर की क़ीमत 74 रुपए से ऊपर चली गई है. इसके कई मतलब हैं. पहला तो यह कि भारत निर्यात कम और आयात ज़्यादा कर रहा है. इसे व्यापार घाटा कहा जाता है.

आरबीआई के अनुसार जून 2018 में ख़त्म हुई तिमाही में व्यापार घाटा बढ़कर 45.7 अरब डॉलर हो गया जो पिछले साल 41.9 अरब डॉलर था. दूसरा यह कि लोगों को देश के सामान और सेवा पसंद नहीं आ रहे हैं इसलिए विदेशी सामान और सेवा ख़रीद रहे हैं. तीसरा यह कि विदेशी निवेशक अपना पैसा निकाल रहे हैं.

नेशनल सिक्यॉरिटीज डिपॉजिटरी के आंकड़ों के अनुसार सिंतबर में 15,366 करोड़ की एफ़पीआई (फॉरेन पोर्टफ़ोलियो इन्वेस्टमेंट) निकाली गई और 2018 में कुल 55,828 करोड़ रुपए की एफ़पीआई निकाल ली गई. ये इसलिए पैसे निकाल रहे हैं क्योंकि इन्हें लगता है कि भारत में निवेश करना फ़ायदे का सौदा नहीं है.

रुपया जब कमज़ोर होता है तो आयात बिल बढ़ जाता है. रुपया कमज़ोर होने का मतलब यह है कि डॉलर मज़बूत हुआ है. यानी एक आईफ़ोन की क़ीमत एक हज़ार डॉलर है और एक डॉलर की क़ीमत 74 रुपए हो गई है तो आपको 74 हज़ार रुपए देने होंगे.

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ज़ाहिर है अगर एक डॉलर की क़ीमत 45 रुपए होती तो कम पैसे देने होते. मतलब आप केवल आईफ़ोन ही नहीं ख़रीद रहे हैं बल्कि डॉलर भी ख़रीद रहे हैं. रुपए की कमज़ोरी के कारण भारत का तेल आयात बिल भी बढ़ गया है.

16 अगस्त को रुपया 70 के पार हुआ तो भारत सरकार ने कहा कि 2018-19 में इस वजह से तेल का आयात बिल 26 अरब डॉलर बढ़ सकता है. ऐसा रुपए की कमज़ोरी और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की बढ़ती क़ीमतों से होगा.

भारत अपनी ज़रूरत का 80 फ़ीसदी तेल आयात करता है. भारत ने 2017-18 में 22 करोड़ 43 लाख टन तेल ख़ीदने में 87.7 अरब डॉलर खर्च किया.

कहा जा रहा है कि रुपए की सेहत ठीक नहीं हुई और कच्चे तेल की क़ीमत अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कम नहीं हुई तो 2018-2019 में तेल का आयात बिल 108 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा.

इसे ऐसे सोचिए कि अगर अगले चार सालों तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 400 अरब डॉलर पर ही स्थिर रहा और इसी में से हर साल तेल के लिए 108 अरब डॉलर खर्च करता रहा तो कुछ भी नहीं बचेगा. मतलब डॉलर का होना कितना अनिवार्य है, इसका अंदाज़ा आप लगा सकते हैं.

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रुपये का अवमूल्यन

इसी को भुगतान संकट कहा जाता है. मतलब आपकी ज़रूरतें तो हैं, लेकिन ख़रीदने के लिए पैसे नहीं हैं. यानी डॉलर नहीं है तो भुगतान कहां से करेंगे. आज़ाद भारत में पहली बार 1966 में भुगतान संकट से सामना हुआ.

इसी संकट से निपटने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 52 साल पहले 6 जून 1966 को रुपए का अवमूल्यन किया था. यानी रुपए की क़ीमत को डॉलर की तुलना में जान-बूझकर कम किया था. 1950 और 1960 के दशक में भारत भयानक व्यापार घाटा से जूझ रहा था.

1965 में जब पाकिस्तान से युद्ध हुआ तो भारत की अर्थव्यवस्था और बुरी तरह से प्रभावित हुई थी. तब अमरीका भी पाकिस्तान का सहयोगी था और भारत के साथ उसकी कोई सहानुभूति नहीं थी. इंदिरा गांधी के पास बहुत सीमित विकल्प थे. तब इंदिरा गांधी ने रुपए के अवमूल्यन का फ़ैसला लिया था, जिसकी ख़ूब आलोचना भी हुई थी.

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1966 में इंदिरा गांधी की सरकार ने डॉलर की तुलना में रुपए में 4.76 से 7.50 तक का अवमूल्यन किया था. कहा जाता है कि इंदिरा गांधी ने कई एजेंसियों के दबाव में ऐसा किया था ताकि रुपए और डॉलर का रेट स्थिर रहे. यह अवमूल्यन 57.5 फ़ीसदी का था. सूखे और पाकिस्तान-चीन से युद्ध के बाद उपजे संकट के कारण इंदिरा गांधी ने यह फ़ैसला किया था.

1991 में नरसिम्हा राव की सरकार ने डॉलर की तुलना में रुपए का 18.5 फ़ीसदी से 25.95 फ़ीसदी तक अवमूल्यन किया था. ऐसा विदेशी मुद्रा के संकट से उबरने के लिए किया गया था. इसके बाद रुपए में गिरावट किसी भी सरकार में नहीं थमी. वो चाहे अटल बिहारी वाजपेयी पीएम रहे हों या अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह और अब मज़बूत मोदी सरकार में भी यह सिलसिला थम नहीं रहा.

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भारत रुपए से ही अंतरराष्ट्रीय व्यापार क्यों नहीं करता है?

ऐसा दो देशों में आपसी सहमति से किया जा सकता है. ईरान के साथ भारत रुपए देकर तेल का आयात करता है. रूस ने भी भारत से रुपए और रूबल में व्यापार की हामी भर दी है. इसका मतलब यह हुआ कि रूस और ईरान को वैसे सामान की ज़रूरत होनी चाहिए जो भारत में मिलते हों.

भारत की चाय दोनों देश ख़रीदते हैं उन रुपयों से ख़रीद सकते हैं. चीन भी कई देशों के साथ अपनी ही मुद्र में व्यापार करता है. इसमें दिक़्क़त यह है कि जिस देश से आपको कोई चीज़ ख़रीदनी हो वो रुपया लेने के लिए तैयार हो.

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