नौकरी मिलने पर गांव के 22 बुज़ुर्गों को हवाई यात्रा कराने वाला पायलट

  • 9 अक्तूबर 2018
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हरियाणा के हिसार के सारंगपुर में एक ऐसा वाकया देखने को मिला है, जिस पर आज के दौर में यक़ीन करना मुश्किल है.

हिसार के शहरी क्षेत्र से 15 किलोमीटर दूर इस गांव के युवा विकास बिश्नोई पायलट बने हैं और उन्हें इंडिगो एयरलाइंस में नौकरी मिली.

अपनी नौकरी को सेलिब्रेट करने के लिए विकास ने 22 बुजुर्गों को दिल्ली से अमृतसर की तक की हवाई यात्रा कराई, ताकि ये बुजुर्ग स्वर्ण मंदिर, वाघा बॉर्डर और जलियांवाला बाग देख सकें.

ये वे लोग हैं जो कभी अपने गांव की सीमा से बाहर नहीं निकले हैं. इनमें 80 साल की जैता देवी भी शामिल थीं.

उन्हें पहली बार विमान में चढ़ने का मौका मिला था. छह बच्चों की मां जैता देवी बताती हैं कि तीन अक्टूबर से पांच अक्टूबर के बीच उन्होंने एक तरह से तीन-तीन जीवन जी लिया.

वह बताती हैं, "पहली बार हवाई जहाज में बैठी थी, पहली बार सोने का मंदिर गई, वाघा सीमा पर भी गई जहां लोग भारत माता की जय के नारे लगा रहे थे."

पारंपरिक घाघरा-कुर्ती-चुन्नी पहनी जैता कहती हैं, "अगर मैं आज मर भी जाती हूं तो मुझे जीवन में किसी इच्छा के बाक़ी रहने का अफ़सोस नहीं होगा."

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70 साल की ककरी देवी कहती हैं, "मेरे खेतों से हवाई जहाज चिड़िया जैसा दिखता है लेकिन असली में वह 1000 हाथियों जितना बड़ा होता है."

वह ये भी बताती हैं कि जब पारंपरिक कपड़ों में इनका समूह विमान के अंदर पहुंचा तो दूसरे यात्री इन्हें अजीब नजरों से देख रहे थे.

वह हंसते हुए कहती हैं, "वे लोग हमें घूर रहे थे, मैंने उनसे कहा कि हम लोग हरियाणा से हैं, हम अनाज और सैनिक उगाते हैं."

ऐसी दिलचस्प कहानियां दूसरी महिलाओं के पास भी है. सब फोटो फ्रेम में आने के लिए अपने हाथों में बोर्डिंग पास लहरा रही हैं.

दूसरी दुनिया की सैर

इस यात्रा में शामिल सबसे कम उम्र वाली 65 साल की बिमला देवी कहती हैं, "जब 45 दिन पहले विकास ने हम 22 लोगों को चलने को कहा था कि तब गांव वालों ने हमें डराया था कि मुश्किल होगी, हार्ट फेल हो जाएगा लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ."

स्थानीय बोली में ये महिलाएं सामूहिक रूप से कहती हैं, "हमने तो घर, खेत, भैंस ही देखा था. हवाई जहाज़, स्वर्ण मंदिर, जलियांवाला बाग, वाघा बॉर्डर जब देखा तो लगा दूसरी दुनिया में आए गए हैं."

78 साल के अमर सिंह बताते हैं कि उनमें से ज़्यादातर लोग विंडो सीट के पास बैठे थे, ताकि वे विंडो से नीचे देख पाएं.

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चार बच्चों के दादा बन चुके अमर सिंह कहते हैं, "जब जहाज़ ऊंचाई पर पहुंचा तो कान में थोड़ी मुश्किल हुई थी लेकिन कोई समस्या नहीं हुई थी. बादलों को देखकर मैं तो दस साल के बच्चे की तरह आनंद उठा रहा था."

71 साल के आत्मा राम अपने छाती से बोर्डिंग पास चिपकाए हैं, वे कहते हैं कि जब वे गांव वालों को हवा में उड़ने की बात सुनाते हैं तो अभी भी कुछ लोग यक़ीन नहीं करते.

छह बच्चों के दादा बन चुके आत्माराम कहते हैं, "मैं तो हर वक्त बोर्डिंग पास अपने पास रखता हूं ताकि ज़रूरत से पड़ने पर उन्हें सबूत के तौर पर दिखा सकूं."

पिता से मिली सीख

गांव के बड़े बुजुर्गों के लिए इस हवाई यात्रा का ख़र्च विकास बिश्नोई ने उठाया है. वे 2010 में व्यवसायिक पायलट बनने का कोर्स कैलिफ़ोर्निया से करके आए तब से ये बात उनके मन में थी.

गांव की बुर्जुग महिलाएं विकास से कहती थीं, "बेटा, अब तो यमराज से मिलने का टाइम आने वाला है, एक बार जहाज़ मैं तो बिठा दे."

विकास विश्नोई बताते हैं, "उनके लिए कामर्शियल पायलट का कोर्स पूरा करने का मतलब ये था कि मैं अगले दिन से जहाज़ उड़ाने लगा हूं. जब मुझे 2017 में नौकरी मिली, तब मैंने तय किया कि इन लोगों का सपना पूरा करना है."

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इसके बाद विकास ने 40 दिन पहले इन लोगों के लिए टिकट लिए, ताकि सस्ती दर पर टिकट मिले.

विकास बिश्नोई के पिता महेंद्र बिश्नोई हिसार में बैंक मैनेजर हैं. उन्होंने बताया, "इन लोगों ने युद्ध पर जाने जैसी तैयारी की है."

विकास बिश्नोई के मुताबिक जब ये बुजुर्ग अमृतसर पहुंचे तो इन लोगों ने पायलट से कॉकपिट दिखाने का अनुरोध किया.

विकास बिश्नोई कहते हैं, "इन लोगों की उत्सुकता को देखकर उन्हें कॉकपिट देखने की इजाजत दी गई और वे सबकुछ देखकर आश्चर्य में भर उठे."

विकास बताते हैं कि जब तीन दशक पहले उनके पिता को नौकरी मिली, तो वे उस वक्त अपने गांव के बुजुर्गों को बस से धार्मिक स्थल पर ले गए थे.

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वे कहते हैं, "तब बस की व्यवस्था करना बड़ी बात थी, मैं ने भी वैसा ही करने की कोशिश की क्योंकि बड़े बुजुर्गों के आशीर्वाद के बिना कुछ भी संभव नहीं है."

वैसे विकास के इस काम से उस गांव में थोड़ी खुशी का माहौल बना है जो पिछले महीने बारिश के चलते बाजरे और कपास की खेती के नुकसान से गम में डूबा था.

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